भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

Find Us On:

English Hindi
Loading

मुक्तक (काव्य)

Author: ताराचंद पाल 'बेकल'

समय देख कर आदमी यदि संभलता,
नया युग धरा पर ज़हर क्यों उगलता!
तरसती न चाहें, भटकती न साधें,
अगर आदमी, आदमी को न छलता।

अगर कुछ मुहब्बत नहीं आदमी में,
अगर नेक नीयत नहीं आदमी में,
उसे आदमी किस तरह फिर कहूँ मैं--
अगर आदमीयत नहीं आदमी में।

ध्यान रक्खे अगर आदमी आदमी का,
किसी को नहीं डर रहेगा किसी का,
धरा पर अमन हो, गगन पर उजाला,
नया सिलसिला हो शुरू ज़िंदगी का।

- ताराचंद पाल 'बेकल'

Back

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.