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 (विविध) 
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रचनाकार:

 नरेन्द्र कोहली

"हुजूर! ख़बर आई है कि हमारे लोगों ने भारतीय कश्मीर में पच्चीस हिंदू तो मार ही दिए हैं। ज़्यादा हों तो भी कुछ कहा नहीं जा सकता। उन्होंने दो-दो साल के बच्चे भी मार गिराए हैं।”

मुशर्रफ ने सिर उठा कर समाचारवाहक की ओर देखा। उसकी आंखों में प्रशंसा और चेहरे पर मुस्कान थी। कुछ देर तक अपनी सफलता के हर्षातिरेक से उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला और फिर जैसे उसे दीवानगी का दौरा पड़ गया, "भेजो भाई! भेजो। जल्दी भेजो। ऐसी खबर लेकर आए हो और यहां ऐसे खड़े हो, जैसे एक मामूली फाइल लाए हो।" 

"क्या भेजें सरकार? लड्डुओं के लिए कहूं या फिर इस वक्त भी व्हिस्की का ही दौर चलेगा?"

"गधे हो।" मुशर्रफ ने चिल्ला कर कहा, "भेजो! सबसे पहले तो उस अटलबिहारी वाजपेयी को हमदर्दी का एक पैगाम भेजो। लिखो कि यह बेहद कायराना हरकत है। ऐसा करने वालों को शर्म से डूब मरना चाहिए। हमें इस दरिंदगी पर बेहद गमोगुस्सा है। ऐसी हरकत करने वालों को पकड़ कर सख्त से सख्त सज़ा दी जानी चाहिए।"

"हुजूर हम अपने ही लोगों के बारे में ऐसी बातें कैसे कह सकते हैं?" 

"कहने में क्या हर्ज है। दिल्ली से भी तो यही सब कहा जाएगा। हम उनसे आगे रहना चाहते हैं। इसलिए उनसे पहले कह देते हैं।" मुशर्रफ ने कहा, "और अपने जांबाजों को शाबाशी भेजो। कमाल है उनकी बहादुरी का। दो-दो साल के बच्चों को मारने में भी उनका कलेजा नहीं कांपा। उन्हें हथियार और गोलाचारूद भेजो। रुपया भेजो। शराब भेजो। कहो, कि हम उनसे बेहद खुश हैं। जिस दिन वे छह महीनों के बच्चों को गोलियों से भून देंगे, उस दिन हम उनको निशाने पाकिस्तान देंगे।"

"हुजूर! भारत वाले कह रहे हैं कि हमने आतंक खत्म करने के लिए कुछ नहीं किया।"

"तो उन्होंने ही क्या किया है?" मुशर्रफ तड़प कर बोला, "सिवाय निन्दा करने के, और क्या किया है उन्होंने? वह हमने भी कर दी। करते रहें शब्दों की बमवारी। कायर कहीं के।"

"हुजूर! पर हमने वादा किया था कि हम दहशतगर्दी को खत्म करेंगे।"

"उन्होंने भी तो कहा था कि आर-पार की लड़ाई लड़ेंगे।" मुशर्रफ बोला, "निभाया उन्होंने अपना वादा? की लड़ाई? उन्होंने कहा था ये आतंकवाद को जड़ से खत्म कर देंगे, पर किया क्या?"

"क्या किया हुजूर?"

"आतंकवाद की जड़ को कश्मीर का बज़ीरेआला बना कर गद्दी पर बैठा दिया।" मुशर्रफ हँसा, "उन्होंने आतंकवाद को एक नए सिरे से कश्मीर में दावत दी है। अब उस दावत का मज़ा चखें।"

"और क्या भेजूं हुजूर?"

"अमरीका को पैगाम भेजो।" मुशर्रफ बोला।

"क्या सरकार?"

"पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए भारत की फ़ौजें अपने ही लोगों को मार रही हैं और हम पर हमला करने का बहाना खोज रही हैं।" मुशर्रफ बोला, "बुश से कहो कि हमें हथियार दे, ताकि हम भारत के हमले का सामना कर सकें।"

"सरकार अगर अमरीका ने हमसे इस बात का सबूत मांगा तो... " 

"सबूत तो है न!" मुशर्रफ ने कहा, "जिस वक्त उन पंडितों को मारा गया, उस वक्त उनकी हिफाज़त के लिए वहां न पुलिस थी, न फौज। भारत सरकार ने जानबूझ कर वहां से अपनी पुलिस हटा ली थी। वे चाहते तो उनकी पुलिस उनके उन फौजियों को रोक सकती थी, जिन्होंने यह कत्लेआम किया है।"

"सरकार! ऐसी बात का यकीन कौन करेगा?"

"अमरीका।" मुशर्रफ ने पूर्ण आश्वस्त भाव से कहा, "वह आज तक हमारी सारी बकवास का यकीन करता आया है। इसका भी करेगा।"

"मुझे तो ऐसा कोई वाक्या याद नहीं पड़ता।"

"तुम्हारी याददाश्त कमजोर है।" मुशर्रफ हँसा, "तुम्हें याद नहीं कि अफगानिस्तान में हमारी फौज तालिबान के साथ कंधे से कंधा मिल कर लड़ रही थी और अमरीका यकीन कर रहा था कि हम उसके साथ हैं..."

"यह तो आपने बेजा फरमाया।"

"और जब तालिबान हथियार डाल रहे थे, हमने अमरीकी कमांडर से पूछ कर उनकी मदद से अपने फौजियों को हवाई जहाजों में बैठा कर बाहर निकाल लिया। ...और अमरीका यकीन करता रहा कि न वहां हमारे हवाई जहाज गए, न हमारे सिपाही वहां से निकाले गए।"

"पर अमरीका ऐसी बातों का यकीन कैसे कर लेता है, हुजूर?"

"उसके खून में भारतमुखालिफ जरासीम घुल गए हैं। वह भारत व खिलाफ पाकिस्तान की हर बात का यकीन करेगा और भारत की पाकिस्तान के खिलाफ किसी बात का यकीन नहीं करेगा।"

"यह तो अजब बात है।"

"अजब हो या गजब।" मुशर्रफ बोला, "अमरीका को गुहार भेजो उनसे हवाई जहाज मांगो। तोपखाना मांगो। कहो कि भारत हम पर हमला करने वाला है।"

"अच्छा हुजूर। आपके हुक्म की तामील की जाएगी।"

-नरेन्द्र कोहली

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