देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है। - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।

बड़ी नाज़ुक है डोरी | ग़ज़ल 

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'

बड़ी नाज़ुक है डोरी साँस की यह 
कहीं टूटी तो बाकी क्या रहेगा

रखो तुम बंद चाहे अपनी घड़ियां
समय तो रात दिन चलता रहेगा

न जाने क्यों हमें यह लग रहा है
हमारे बाद सन्नाटा रहेगा

वृथा है आज, कल की फिक्र 'राणा'
जो कुछ होना है वह होता रहेगा

-डॉ राणा प्रताप सिंह 'राणा' गन्नौरी 

 

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