जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।
निदा फ़ाज़ली के दोहे  (काव्य)    Print this  
Author:निदा फ़ाज़ली

बच्चा बोला देख कर मस्जिद आली-शान ।
अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान ।।

मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार ।
दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार ।।

घर को खोजें रात दिन घर से निकले पाँव ।
वो रस्ता ही खो गया जिस रस्ते था गाँव ।।

नक़्शा ले कर हाथ में बच्चा है हैरान ।
कैसे दीमक खा गई उस का हिन्दोस्तान ।।

सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान ।
एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान ।।

वो सूफ़ी का क़ौल हो या पंडित का ज्ञान ।
जितनी बीते आप पर उतना ही सच मान ।।

मैं भी तू भी यात्री चलती रुकती रेल ।
अपने अपने गाँव तक सब का सब से मेल ।।

पंछी, मानव, फूल, जल, अलग-अलग आकार ।
माटी का घर एक ही, सारे रिश्तेदार ।।

अन्दर मूरत पर चढ़े घी, पूरी, मिष्टान ।
मंदिर के बाहर खड़ा, ईश्वर माँगे दान ।।

- निदा फ़ाज़ली

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