वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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विकसित करो हमारा अंतर | गीतांजलि (काव्य) 
   
Author:रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

विकसित करो हमारा अंतर
           अंतरतर हे !

उज्ज्वल करो, करो निर्मल, कर दो सुन्दर हे !
जाग्रत करो, करो उद्यत, निर्भय कर दो हे !
मंगल करो, करो निरलस, निसंशय कर हे !

     विकसित करो हमारा अंतर
                   अंतरतर हे !

युक्त करो हे सबसे मुझको, बाधामुक्त करो,
सकल कर्म में सौम्य शांतिमय अपने छंद भरो
चरण-कमल में इस चित को दो निस्पंदित कर हे !
नंदित करो, करो प्रभु नंदित, दो नंदित कर हे !

           विकसित करो हमारा अंतर
                        अंतरतर हे !

 

-रवीन्द्रनाथ टैगोर

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साभार - गीतांजलि, भारती भाषा प्रकाशन (1979 संस्करण), दिल्ली

अनुवादक - हंसकुमार तिवारी


Rabindranath Tagore Ki Geetanjli

 

 

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