जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।
विपदाओं से मुझे बचाओ, यह न प्रार्थना | गीतांजलि (काव्य)    Print this  
Author:रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

विपदाओं से मुझे बचाओ, यह न प्रार्थना,
विपदाओं का मुझे न होवे भय ।
दुःख से दुखे हृदय को चाहे न दो सांत्वना,
दुःखों जिसमें कर पाऊँ जय ।

जो सहाय का जुटे न संबल
टूट न जाये पर अपना बल
क्षति जो घटे जगत् में केवल मिले वंचना,
अपने मन में मानूं किन्तु न क्षय ।

मेरा त्राण करो तुम मेरी यह न प्रार्थना,
तरने का बल  कर पाऊँ संचय ।
मेरा भार घटा कर चाहे न दो सांत्वना,
ढो पाऊँ इतना तो हो निश्चय ।

शीश झुकाये जब आये सुख
लँ मैं चीन्ह तुम्हारा ही मुख
निखिल धरा जिस दिन दुख-निशि में करे वंचना
तुम पर करूँ न मैं कोई संशय ।

 

-रवीन्द्रनाथ टैगोर

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साभार - गीतांजलि, भारती भाषा प्रकाशन (1979 संस्करण), दिल्ली

अनुवादक - हंसकुमार तिवारी


Hindi Geetanjli by Rabindranath Tagore

 

 

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