जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।
मनीऑर्डर (कथा-कहानी)    Print this  
Author:डॉ रमेश पोखरियाल निशंक

'सुन्दरू के पिता का मनीऑर्डर नहीं आया, इस बार न जाने क्यों इतनी देर हो गयी? वैसे महीने की दस से पन्द्रह तारीख के बीच उनके रुपये आ ही जाते थे। उनकी ड्यूटी आजकल लेह में है। पिछले महीने तक बे सुदूर आईजॉल मिजोरम में तैनात थे, तब भी पैसे समय पर आ गये थे, किन्तु इस बार तो हद हो गयी थी। आज महीने की सत्ताईस तारीख हो गयी और सुन्दरू के पिता के रुपये तो दूर, लेह लदाख जाने के बाद से कोई चिट्ठी तक नहीं आयी। समझ में नहीं आता कि कहाँ से बच्चों की फीस व घर की राशन पानी के लिए पैसों का इन्तजाम करूँगी?'

रंजू के मन में जहाँ कई तरह की आशंकाओं के बादल मंडरा रहे थे, वहीं वह इस बात को लेकर कुछ ज्यादा ही परेशान थी कि अगले दो-एक दिनों में मनीऑर्डर न आने पर पैसों की व्यवस्था करेगी तो करेगी कहाँ से? आखिर मनीऑर्डर की प्रतीक्षा में कितने दिनों से वह बच्चों को उनकी फीस सहित हल लगाने वाले, घराट की मरम्मत कर रहे मिस्त्री सहित न जाने कितने लोगों से वायदा जो कर चुकी थी।

मोहन लाल ने टोलका व पलडुंगा के खेतों का हल तो पहले ही आधे-अधूरे में ही छोड़ दिया है। उसके पास गाँव के तीन-चार और लोगों के खेतों में हल चलाने का जिम्मा है। अगले दो-तीन दिनों में यदि उसे रुपये नहीं मिले, तो हमारे खेतों में उसकी दिलचस्पी बिल्कुल ही खत्म हो जायेगी। मिस्त्री भी तब से तीन चार बार आ चुका है रुपये लेने। बच्चों को भी तो पन्द्रह तारीख तक स्कूल की फीस जमा करनी थी। आज तक तो वह बच्चों को किसी तरह मनाकर बेमन से स्कूल भेजे जा रही थी, लेकिन आजकल में यदि मनीऑर्डर नहीं आता तो बड़ी मुश्किल में कहाँ जायेगी वह। इसी उधेड़ बुन में आज का आधा दिन भी बीत चुका था।

जब सुन्दरू के पिता घर आते, तो मोहन लाल से जो भी काम करवाओ, वह हर पल तैयार रहता। पिछली बार की होली में मोहन लाल ज्यूठांण के खेतों के पुस्ते से नीचे गिर गया था, तो सुन्दरू के पिता ने अकेले ही उसे कन्धे पर लादकर चार मील दूर अस्पताल तक पहुँचाया था।

यद्यपि मामला हल्की-फुल्की चोट में ही टल गया, क्योंकि नीचे गोबर का ढेर . लगा था, जिसमें गिरने से वह और अधिक चोटिल होने से बच गया। कुछ दिन बाद मोहन लाल जब हमारे चौक में आया, तो टोपी उतार कर सुन्दरू के पिता के पाँवों में रखकर कह रहा था कि 'काका नहीं होते तो उस दिन मर ही जाता मैं। काकी, ये अहसान जिन्दगी भर नहीं भूल पाऊँगा। काका के मेरे ऊपर पहले भी इतने अहसान हैं कि अब मैं आपके खेतों में बिना रुपये लिए हल जोतूंगा। उस दिन मोहन लाल की बातें सुनकर रंजू खूब हँसी थी।

सुन्दरू के पापा घर आते तो मोहन लाल उनके ही इर्द-गिर्द मंडराता रहता। वह जब भी घर आते तो एक पेटी फौजी रम लेकर आते और घर का कामकाज करने वालों को पिलाते रहते। हल लगाने वाले से लेकर लकड़ी फाड़ने वाले तक सबके सब दोगुना उत्साह के साथ काम करते और इसके साथ ही घर में यकायक चहलकदमी बढ़ जाती। रंजू को भी अच्छा लगता। लोग कम से कम उन दिनों तो उसकी व उसके परिवार की खैर खबर पूछते हैं। किन्तु आज घर के चौक की मुंडेर पर अकेली बैठी रंजू ये नहीं समझ पा रही थी कि उसकी दुविधा का अन्त कैसे होगा वह इतनी गहरी सोच में डूबी हुई थी कि उसे अहसास ही नहीं हुआ कि कब शाम के पाँच बज गये और स्कूल से बच्चों के लौट आने का समय हो गया। बच्चों की चहल-पहल के बाद ही उसकी एकाग्रता टूटी।

आज का पूरा दिन भी मनीऑर्डर की प्रतीक्षा में पोस्टमैन की राह ताकते ही व्यतीत हो गया, तो रंजू अत्यधिक हताश हो गयी थी, साथ ही तरह तरह की आशंकाओं व अनहोनी के ख़यालों से ही उसका पूरा बदन सिहर उठता था।

स्कूल से लौटने के बाद तीनों ही बच्चों ने कल फीस के पैसे न देने पर स्कूल न जाने की जिद पकड़ ली। मिस्त्री ने भी कल से घराट की मरम्मत का काम बीच में ही छोड़ देने का रैबार भिजवा दिया। शंकाओं, आशंकाओं के बीच उसने बुझे मन से किसी तरह हिम्मत जुटाकर बच्चों के लिए खाना बनाया और खाना खिलाकर तीनों को सुला दिया, किन्तु स्वयं उसकी तो भूख व नींद दोनों ही न जाने कहाँ लुप्त हो चुकी थी।

रात गहराती जा रही थी, किन्तु रंजू के कानों में तो आज शाम को कलावती सासूजी के कहे शब्द बार बार गूँज रहे थे कि 'ब्बारी! रवासन के गधेरे से लेकर तुम्हारे घराट के कोने तक पूरी की पूरी सार में कब की हल जुताई हो गयी है, केवल तुम्हारे खेत ही बीच-बीच में बदरंग लग रहे हैं। मोहन लाल से कहकर कल सुबह ही सारे खेतों में हल लगवा लो। इस बार क्या हो गया इस मोहन लाल को? पहले तो सबका काम छोड़कर सबसे पहले लगा दिया करता था तुम्हारा हल।'

रंजू सोचे जा रही थी कि ऐसी जग हँसाई तो पहले कभी नहीं हुई। हमारे खेतों में बुआई न होगी तो मैं किस तरह दुनिया को मुँह दिखाऊँगी? सारे लोग क्या कहेंगे? सुन्दरू के पिता की साख भी तो मिट्टी में मिल जायेगी। नहीं, नहीं मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूँगी।

बीच-बीच में हिम्मत जुटाकर रंजू सोचती कि कल सुबह मधवा ससुर जी से हल जोतने के लिए विनती कर लेती हूँ, परन्तु पिछले महीने बच्चों की कॉपी किताब व स्कूल की पोशाक के लिए एक हजार रुपये भी तो उन्हीं से उधार लिए हैं। अब हल लगाने के लिए भी उन्हीं से कहूँगी तो वे क्या सोचेगें? सुबह उठकर रंजू गौशाला की तरफ जा रही थी कि तब तक मधवा ससुर जी स्वयं ही रास्ते में मिल गये।

'ब्बारी! हवलदार की चिट्ठी पत्री आयी कि नहीं? अरे उसका मनीऑर्डर नहीं आया, तो इस मोहन लाल के भरोसे खेत बंजर ही छोड़ दोगी क्या? थोड़ी देर में बिजुन्डा (बीज का थैला) लेकर आ जाना, मैं अपने बैलों को लेकर बुआई करने टोलका व पलडुंगा के खेतों में पहुँच जाऊँगा। मधवा ससुर की बातों से रंजू की आँखें छलछला आयी थी। उसे लगा कि कोई तो है गाँव में, जो उसकी चिन्ताओं में शामिल है!

आज सुबह उसने खिलानधार में पोस्ट मास्टर जी के पास सुन्दरू को ये पूछवाने के लिए भेजा कि उनके पैसे आये क्या? तो सुन्दरू मायूस होकर लौटकर बताने लगा, 'माँ! बिसनू दादा मुझे डांटते हुए बोले कि हमने खा लिए तुम्हारे पैसे? अरे! तेरे बाप ने मनीऑर्डर भेजा ही नहीं, तो मैं तुम्हें पैसे कहाँ से दूँ? हमारे यहाँ रुपयों के पेड़ लगे हैं, जो सारे गाँव में बँटवाता फिरूँ? वहाँ कश्मीर जाकर पूछो, कहीं तेरे बाप ने दूसरी शादी तो नहीं कर ली?'

बिसनू की फटकार से मर्माहत सुन्दरू हताश मन से घर लौटा, तो रंजू ने उसे गले लगा लिया और बहुत देर तक उसका सिर सहलाते हुए उसे सान्त्वना देती रही ताकि बाल-मन पर बिसनू के कड़वे बोलों का कुप्रभाव न पड़े। पोस्टमास्टर द्वारा कहे गये एक-एक शब्द यद्यपि जहरीले तीर की तरह उसके शरीर में चुभ रहे थे और मन करता था कि अभी खिलानधार जाकर पोस्टमास्टर की खबर ले, किन्तु दूसरे ही पल समाज तथा परिवार की प्रतिष्ठा का खयाल आते ही रंजू खुद ही फफक-फफक कर रो पड़ी।

कई रोज बीत गये किन्तु सुन्दरू के पिता का मनीऑर्डर नहीं आया। मनीआर्डर की प्रतीक्षा करते-करते वह थक गयी। मनीऑर्डर की आस में घर से लेकर खेत खलिहान तक आते-जाते वह पोस्टमैन को टकटकी लगाये देखती रहती, लेकिन अब तो पोस्टमैन ने उनके चौक से जाने का रास्ता ही बदल दिया। मोहन लाल, मिस्त्री, लकड़ी फाड़ने वाले यहाँ तक कि गाँव के अधिकांश लोगों ने भी रंजू के घर की तरफ झाँकना भी बन्द कर दिया था। हाँ, संकट की इस घड़ी में मधवा ससुर जी और कलावती सासूजी जैसे दो-एक लोगों ने रंजू का हौसला बनाए रखा।

आर्थिक तंगी के बीच बड़ी बेचारगी व लाचारी में रंजू ने एक डेढ माह और गुजार दिये, लेकिन अब तक भी न तो कोई चिट्ठी आयी और न ही मनीआर्डर मिला, तो तरह-तरह की अनिष्ट की आशंकाओं ने उसके मन-मस्तिष्क को झकझोर कर रख दिया। अब तो उसकी आशाएँ एकदम ही धूमिल हो गयीं। बच्चे नमक में मंडवे की रोटी खाते, और बिना मीठे का दूध पीते। 'मम्मी!, पापा कब आयेंगे? उनके मासूम किन्तु बोझिल सवालों का रंजू के पास कोई जबाव नहीं था। वह निरुत्तर हो, आकाश को ताकते शून्य में निहारती रह जाती और अतीत की परछाइयों में डूबती-तैरती सोचती कि काश! उसने मायके में पिता का कहना मानकर उस समय बी.टी.सी. कर लिया होता, तो आज उसे कदापि यह दिन न देखना पड़ता।

रंजू को याद आ रहा था कि आज से लगभग बीस वर्ष पूर्व प्रथम श्रेणी में बारहवीं पास करते ही उसे और उसकी सहेली प्रभा को पौड़ी से बी.टी.सी. में प्रवेश हेतु आमन्त्रण पत्र एक साथ प्राप्त हुआ था। कितनी मिन्नतें की थी प्रभा ने उससे, बी.टी.सी. ज्वाइन करने हेतु। पिता ने भी फौज से चिट्ठी में बी.टी.सी. ज्वाईन करने की सलाह दी थी, किन्तु उसने किसी की एक नहीं सुनी थी और बी.टी.सी. करने से साफ इंकार कर दिया था। प्रभा की तो प्रशिक्षण समाप्त होते ही तुरन्त नौकरी भी लग गयी थी और वर्तमान में वह उसी गाँव के समीपवर्ती हाईस्कूल में प्राध्यापक पद पर थी। वह सोचती रह गयी थी कि काश! आज उसने भी सहेली व परिवार वालों का आग्रह मानते हुए स्वावलम्बन की प्रेरणा ली होती, तो वह भी अवश्य किसी स्कूल में शिक्षिका के पद पर होती और आज उसे तथा उसके परिवार को ये दुर्दिन न देखने पड़ते।

अपनी परिस्थितियों से सबक लेते हुए रंजू ने सुन्दरू के साथ-साथ अपनी दोनों ही पुत्रियों को स्वावलम्बी बनाने का प्रण कर लिया था, ताकि जो गलती उसने स्वयं की है, उसके बच्चों के साथ उसकी पुनरावृत्ति न हो।

शाम को बच्चों के साथ चौक में बैठी रंजू सोच में डूबी थी कि अचानक सुन्दरू के पिता के बूटों की पदचाप सुनाई दी। बूटों की आहट सुन रंजू की ठहरी हुई जिन्दगी में यकायक जैसे नवजीवन का संचार हो गया था। सामने उसने सुन्दरू के पिता को खड़ा पाया, तो निढाल होकर उनकी बाहों में गिर पड़ी। सुन्दरू ने माँ को सहारा दिया और सुन्दरू के पिता ने उसे गले से लगा लिया। एक मूक संवाद और उसका अनोखा अहसास, मानो रंजू के दुःखों के पहाड़ एक ही झटके में भर-भराकर गिर पड़े हों।

'मैं पिछले महीने मनीआर्डर नहीं भेज सका। तुझे दुःख उठाने पड़े होंगे।' सुन्दरू के पिता बोले।

'किसने कहा मुझे दुःख उठाने पड़े? मनीआर्डर नहीं आया, न सही। भुम्याल देवता की कृपा से आप सकुशल आ गये, इससे बड़ी बात क्या है मेरे लिए। रंजू शान्त स्वर में पति की बाहों में झूलती हुई बोली।

माता-पिता के प्रेमालाप से बेखबर सुन्दरू और उसकी बहिने पापा का बैग खोलकर उसमें कुछ ढूँढ़ने की कोशिश कर रही थी।

अभी कुछ क्षण पूर्व तक वीरान पड़े रंजू के घर और चौक में फिर से चहल-पहल प्रारम्भ हो चुकी थी, जिनमें बिसनू पोस्टमास्टर से लेकर पोस्टमैन, गाँववाले, मोहन लाल, मिस्त्री, लकड़ी फाड़नेवाले सभी सम्मिलित थे, कोई नहीं थे तो सिर्फ मधवा ससुर जी और कलावती सास जी।

-रमेश पोखरियाल 'निशंक'
[कथाएँ पहाड़ों की, वाणी प्रकाशन ]

Previous Page  |   Next Page
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश