जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।

Find Us On:

English Hindi
Loading

पेट महिमा (काव्य)

Author: बालमुकुंद गुप्त

साधु पेट बड़ा जाना।
यह तो पागल किये जमाना।।
मात पिता दादा दादी घरवाली नानी नाना।
सारे बने पेट की खातिर बाकी फकत बहाना।।
पेट हमारा हुंडी पुर्जो पेट हि माल खजाना।
जबसे जन्मे सिवा पेट के और न कुछ पहचाना।।
लड्डू पेड़ा पूरी बरफ़ी रोटी साबूदाना।
सब जाता है इसी पेट में हलवा दाल मखाना ।।
बाहर धर्म्म भवन शिव मंदिर क्या ढूंढे दीवाना।
ढूंढो इसी पेट में प्यारो तब कुछ मिले ठिकाना।।

- बालमुकुंद गुप्त

 

Back

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश