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ज़ालिम भूख (कथा-कहानी)

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Author: खेमराज श्रीबंधु आदर्श

सूरज की प्रथम किरण के साथ चिड़िया चहचहाने लगी थी। परिंदे अपने घोसलों को छोड़कर वन की ओर निकल पड़े थे, किंतु सेठ धनपत की नींद, शायद अभी तक पूरी नहीं हुई थी। फिर भी वे अपनी खुली तोंद पर हाथ फेरते हुए, बंगले के सामने पार्क में टहल रहे थे। इसमें उनका शेरू भी उनका पूर्ण ईमानदारी से साथ दे रहा था। बीच-बीच में वे बड़े प्यार से अपने शेरू के कानों में उंगलियॉं चलाने में पीछे नहीं रहते। शायद, उनको ऐसा करने में एक असीम आनंद प्राप्त हो रहा था। स्वाभाविक भी है कि उनके अंदर से एक आत्मविश्वास की आवाज निकल रही थी। वे मन ही मन कहते,"मेरी सम्पूर्ण करोडों की सम्पति का रक्षक, तो यह एक वफ़ादार कुत्ता शेरू ही तो है। जो सुबह से शाम तक किसी को बगंले के आस-पास फटकने नहीं देता। किसी की मजाल है, जो उसके सामने आ जाए! 'भौं-भौं'करके, जैसे कानों के पर्दे फाड़ देता।"

अचानक एक जानी-पहचानी आवाज़ कानों से टकराई। "मालिक, मालिक!"

"कौन है? कौन है?"

"जी, मालिक! मैं लक्ष्मी।" 

"अच्छा! लक्ष्मी तुम। तुमको अब जाकर दिन निकला? इतने दिनों से तू कहाँ मर गई थी?" तीखे स्वर में सेठजी चिल्लाए।

"जी...जी! मैं बीमार थी। बुखार से तप रही थी, इसलिए काम पर नहीं आ पाई।"

"अब किस लिए आई हो? नालायक! बेवकूफ!"

"जी! मुझे थोड़ा सा अनाज और सौ रूपये चाहिए। मैं और मेरे बच्चें दो दिनों से भूखे हैं। घर में अन्न का एक दाना तक नहीं है। हुजूर! थोड़ा सा दो-चार पाई अनाज मिल जाता, तो बड़ी दया होती। मैं डॉक्टर को भी अपनी तबीयत दिखा दूँगी।"

सेठ धनपत दहाड़ा,"बेहया! बेशर्म! तुझे शर्म नहीं आती। एक तो चार दिनों से काम पर नहीं आई। ऊपर से अनाज और पैसे मांग रही है। यहाँ क्या बिरद बॅंट रही हैं? या हराम का भरा पड़ा है? जो तुझे दे दें! पुराना दो सौ रूपया भी तो तेरी तरफ है।"

 

बेचारी लक्ष्मी रुआंसी, होकर गिड़गिड़ाने लगी लेकिन पत्थर दिल सेठजी का हृदय नहीं पसीजा। वह किसी जल्लाद की तरह कठोर आवाज़ में गरजा, "अरे! रामू कहाँ मर गया रे? इस कलमुँहीं को निकाल, जरा, बाहर! सुबह-सुबह कहाँ से चले आते हैं।"

रामू दौड़कर आया और उसने धक्के देकर लक्ष्मी को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

बेचारी धड़ाम से चक्कर खाकर जमीन पर गिर पड़ी।

आँखों से आँसू टपकने लगे। वह बेचारी बड़ी आस लिए आई थी। उसे मांगने का अधिकार भी था चूँकि वह दस वर्षों से सेठजी के घर में झाडू-पोंछा एवं बर्तन का काम जो करती थी । अब अनायास उसकी तबीयत खराब हो गई, तो उसमें भला उसका क्या दोष? बच्चें भी अभी छोटे-छोटे थे। उनके पढ़ाई-लिखाई का खर्च भी उसी के कंधों पर था। उसका पति सेवकराम भी इन्ही के घर कमर तोड़ मेहनत करते-करते क्षय रोग से पीड़ित होकर, दो वर्षों पूर्व चल बसा था। आखि़र क्या करती बेचारी! उसकी तरफ से बोलने वाला कौन था? आखिर चक्कर खाकर गिर जाती है। अपने फूटी किस्मत पर आँसू बहाते हुए, भूख के मारे बिलखती रहती है। सारा बदन सूरज की तीव्र रोशनी में और भी तीव्रता से तपने लगा था।

"अरे! रामू, जा शेरू के लिए बिस्कुट तो ले आ।"

"जी, मालिक! कल ही लाया था। उन पर कुत्ते ने पेशाब कर दी थी, तो पूरे खराब हो गए।"

‘‘अरे, मूर्ख ! बात करने की तमीज नहीं है। क्या तेरी अक्ल मारी गई? मेरे शेरू को कुत्ता कहता है!" सेठजी जैसे बौखला गए। 

"जी, मालिक! गलती हो गई जी।"

वह बेचारा स्तब्ध हो गया। विचार करने लगा।

"कुत्ते को कुत्ता कहे और नहीं तो क्या कहें? क्या कुत्ते को कुत्ता कहना भी गुनाह है? इस कुत्ते पर इनका इतना प्रेम। ...और वह अभागन लक्ष्मी! जो इनके घर में हाड़-मांस का पानी बनाती रही। सबकी सेवा करती रही। कुत्ते को हर दिन नहलाती-धुलाती थी। उसके प्रति इनके मन में कोई दया नहीं।

ये इनसान नहीं, हैवान है। सही में यह इस कुत्ते से बड़ा कुत्ता है।"

"क्या साँप सूंघ गया? मैंने तीन बार आवाज़ लगाई। ले सौ रूपये और मेरे शेरू के लिए बिस्कुट ले आ।"

"जी, सेठजी।"

सेठ-सेठानी द्वारा कुत्ते का बड़ा ध्यान रखा जाता था। उसकी देख-रेख और सेवा के लिए नौकर-चाकर थे। उसके सोने के लिए मखमली गद्दें। यहाँ तक कि खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। काजू-किशमिश, दूध-रोटी,ब्रेड तथा ताजा मटन दिया जाता था।

अचानक, मुनिम कांतिभाई कमरे में दाखिल हुआ और बोला, "मालिक! पूना से खान साहब की गाडी आई है। 200 बोरे गेहूं लदा है। कहाँ खाली करवाए?"

"अरे, भाई! ये भी पूछने की बात है? पीली कोठी में रखवा दो।"

"वो कोठी तो फुल भरी हुई है, मालिक! हाँ...लेकिन उसमें का पचास बोरा गेहूं खराब हो चुका है। उनको खाली करवाकर जैसे-तैसे बात बन सकती है।" कांति भाई ने सुझाव दिया।

"ठीक है, ऐसा ही करो।"

"...लेकिन मालिक! इनका क्या करें? कहाँ गिरवाएँ?

"अरे ! क्या छोटी-मोटी बातें पूछते हो। जाओ, किसी नाले या दरिया में फेंकवा दो।"

सेठजी की नजर जैसे ही बाहर पड़ी तो देखा, पाँच-दस लोग हाथ में काग़ज-पत्तर लिए खडे थे। वे आपस में कुछ कानाफूसी कर रहे थे जैसे किसी बड़ी योजना का ताना-बाना बुन रहे हों।                                                                                

सेठजी ने पुकारा, "अरे, रामू! रामू!"

"जी मालिक!"

"जरा, बाहर देखना, कौन लोग खडे़ हैं? अभी तो चुनाव को शायद, चार माह शेष है। फिर ये लोग कौन हैं? कैसे आए हैं? क्या बात है?"

रामू लौटकर आया और कहने लगा, "मालिक! ये लोग किसी समिति से हैं। वे आपसे मिलना चाहते हैं।"

"अच्छा, भेज दो।"

कुछ सभ्रांत, सफ़ेद पोशधारियों ने कमरे में प्रवेश किया।

"नमस्कार, सेठजी! नमस्कार, सेठजी।" सभी ने एक ही स्वर में अभिवादन किया।

सेठजी ने प्रत्युत्तर में नमस्कार कर, उन्हें बैठने का आग्रह किया।

सेठजी ने कहा, "और कैसे?"

"जी! हम 'अन्नपूर्णा महिला उत्थान समिति' से हैं। हम हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी नव-रात्रि में दुर्गा उत्सव कार्यक्रम एवं भंडारा करना चाहते हैं। जिसके लिए आपका सहयोग चाहते हैं।"

"ये भला, कोई पूछने की बात है। ये धर्म कार्य है और इसमें माँ दुर्गा की भक्ति समाहित है। उसी माँ की कृपा से हम सभी अच्छे भले हैं। आगे सरपंच का चुनाव भी है, उसका चुनाव जो लड़ना है। यदि इसमे तन-मन से सहयोग नहीं देंगे, तो माँ का आशीर्वाद और कृपा कैसी बरसेगी?"

"जी! आप तो दानशील हैं, सेठजी! आपके नाम की तो सारे क्षेत्र मे जय-जयकार हेाती है। आपकी तो सभी प्रशंसा करते हैं, फिर आप चुनाव कैसे नहीं जीत पाएंगे! दानदाताओं की सूची में आपका नाम प्रथम क्रमांक पर रहेगा और वो सूची नगर के चौराहे पर लगाई जाएगी।"

"हाँ-हाँ, ये बात तो जरूर है। वैसे भी हम ऐसे कामों में पीछे नहीं रहते। मुनिमजी! जरा, इन्हें दस हजार रूपये का चैक और दस बोरा गेहूॅं दे दीजिएगा।"

"जी, सेठजी!"

आसमान साफ हो चुका था। नगर की गलियाँ दुल्हन की तरह सजाई गई थी। चारों तरफ रोशनी जगमगा रही थी। नगर के बच्चे, बूढ़े, नवयुवक एवं युवतियाँ सज-सँवरकर, नाचते-गाते जुलूस में चल रही थी। कोई माँ दुर्गा के, तो कोई माँ काली के गीत गुनगुना रहे थे।

ऐसा लग रहा था, जैसे नगर में एक साथ कई बारातें ढोल-धमाके के साथ चल पड़ी हो। नगाड़ो की आवाज कानों के पर्दे फाड़े जा रही थी।

पटाखों की आवाज से सारा गगन गूँज उठा था। लोग एक दूसरे को गुलाल लगा रहे थे और खुशी-खुशी गले मिल रहे थे। सेठजी इस जुलूस में ऐसे प्रसन्नचित्त चले जा रहे थे जैसे कोई योध्दा, युद्ध जीतकर खुशी-खुशी चला जा रहा हो।

माँ दुर्गा की मनमोहक प्रतिमा सुंदर रथ पर सवार थी। ऊपर सुंदर छत्र बना हुआ था। जो रंग-बिरंगे वस्त्रों से तैयार किया गया था। आकाश में उड़ता हुआ गुलाल, जैसे नीले आसमान का रंग परिवर्तित करने में आमादा हो चुका था। मंद-मंद हवा बह रही थी। रथ चला जा रहा था। माँदुर्गा के हाथों में  सुशोभित त्रिशूल सम्पूर्ण साज-सज्जा को चार चाँद लगा रहा था। माता के सामने निर्जीव दानव एक हाथ में गदा, तो दूसरे हाथ में कृपाण लिए भौंए दिखाते हुए, जीभ बाहर की ओर निकालता हुआ, विकराल रूप में खड़ा था। सिंहवाहिनी माँ दुर्गा की छवि बड़ी ही अनुपम एवं निराली प्रतीत हो रही थी। भक्त गण माँ दुर्गा का जयकारा लगा रहे थे तो कुछ लोग सेठ धनपत की जय-जयकार कर रहे थे।

भीड़ चली जा रही थी कि अचानक रथ के पहिये थम गए। लोग इधर-उधर से भागा-दौड़ी कर रथ के सम्मुख इकट्ठे होने लगे थे। नगाड़ो की थाप थम चुकी थी। जयकारों ने विराम ले लिया था। रथ के पहिये के नीचे खून से लथपथ एक फटे-पुराने वस्त्रो में लिपटी अधेड़ उम्र की महिला कुचल गई थी।

उसके शरीर से खून बह रहा था। उस बेचारी की माँ काली की भाँति जीभ बाहर आ गई थी। उसके एक हाथ में पत्तल थी जिसमें आधी रोटी पड़ी हुई थी और आधा निवाला उसके मुँह में था, जो शायद उसकी दरिद्रता और बेबसी की दास्तां ब्याँ कर रहा था। वस्त्र बिखर चुके थे... चिथड़ों में लिपटा अर्धनग्न शरीर! उसके दायें हाथ पर एक नाम गुदा हुआ था,‘लक्ष्मी’। वही लक्ष्मी...!

हे ईश्वर! आज, भूख की ज्वाला ने शक्ति रूपी देवी के पैरों तले उसे रौंद दिया था। वाह भगवान! क्या उसकी काया पावन हो गई थी या उसे इस नारकीय जीवन से मुक्ति मिल चुकी थी।               

खेमराज श्रीबंधु 'आदर्श'
मु.पो.रामाकोना तहसील-सौसर
जिला-छिन्दवाड़ा, म.प्र.  

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