हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

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कमल (काव्य)

Author: मयंक गुप्ता

दलदल के भीतर अपने अंशों को पिरोए हुए,
शायद वंशावली की धरोहर को संजोए हुए,
एक कमल दल तैरता रहता,
कभी इस छोर-कभी उस छोर।
नहीं था ज्ञान अपने होने का उसको,
समझ बैठा कीचड़ को घर ।

घिरकर दलदल में शायद,
वह नहीं सकता था कुछ कर ।

फिर भी बचाने को गंदगी से, अपने वंश रत्न को,
करता प्रयास नित सांझ सबेरे ।
कभी छुपा दलदल में, कभी झकझोरा निर्मम ठंडी पवन ने,
कर प्रयास, बांधी सपनों की आस, होगा सबेरा खिलेगा नवप्रकाश ।

आया समय पुलकित हुई वैभवशाली कली,
उठ खड़ा हुआ दलदल से विरत ,
बन उजला उज्जवल निर्मल कमल ।

- मयंक गुप्ता
वंशी नगर शिकोहाबाद (उत्तर प्रदेश), भारत
मोबाइल: 09359288275
ई-मेल: mayankpansy@gmail.com

 

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