जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।
हमको फिर छुट्टी (बाल-साहित्य )  Click to print this content  
Author:तोनिया मुकर्जी

सोम, सोम, सोम
हमारी टीचर गई रोम
हमको फिर छुट्टी

मंगल, मंगल, मंगल
हमारी टीचर गई जंगल
हमको फिर छुट्टी

बुध, बुध, बुध
हमारे टीचर का हो गया युद्ध
हमको फिर छुट्टी

वीर, वीर, वीर
हमारी टीचर ने बनाई खीर
हमको फिर छुट्टी

शुक्रवार, शुक्रवार, शुक्रवार
हमारी टीचर पड़ गई बीमार
हमको फिर छुट्टी

रवि, रवि, रवि
हमारी टीचर बन गई कवि
हमको फिर छुट्टी

-तोनिया मुकर्जी (10 वर्ष)
[ चकमक, मई 1989]

[मूल कविता में 10 वर्षीय बालिका से कविता में शनिवार छूट गया है लेकिन तुकबंदी सराहनीय है।] 

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page
 
 
Post Comment
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश