ग़ज़लें
देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है। - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।

Find Us On:

English Hindi
Loading
ग़ज़लें
ग़ज़ल क्या है? यह आलेख उनके लिये विशेष रूप से सहायक होगा जिनका ग़ज़ल से परिचय सिर्फ पढ़ने सुनने तक ही रहा है, इसकी विधा से नहीं। इस आधार आलेख में जो शब्‍द आपको नये लगें उनके लिये आप ई-मेल अथवा टिप्‍पणी के माध्‍यम से पृथक से प्रश्‍न कर सकते हैं लेकिन उचित होगा कि उसके पहले पूरा आलेख पढ़ लें; अधिकाँश उत्‍तर यहीं मिल जायेंगे। एक अच्‍छी परिपूर्ण ग़ज़ल कहने के लिये ग़ज़ल की कुछ आधार बातें समझना जरूरी है। जो संक्षिप्‍त में निम्‍नानुसार हैं: ग़ज़ल- एक पूर्ण ग़ज़ल में मत्‍ला, मक्‍ता और 5 से 11 शेर (बहुवचन अशआर) प्रचलन में ही हैं। यहॉं यह भी समझ लेना जरूरी है कि यदि किसी ग़ज़ल में सभी शेर एक ही विषय की निरंतरता रखते हों तो एक विशेष प्रकार की ग़ज़ल बनती है जिसे मुसल्‍सल ग़ज़ल कहते हैं हालॉंकि प्रचलन गैर-मुसल्‍सल ग़ज़ल का ही अधिक है जिसमें हर शेर स्‍वतंत्र विषय पर होता है। ग़ज़ल का एक वर्गीकरण और होता है मुरद्दफ़ या गैर मुरद्दफ़। जिस ग़ज़ल में रदीफ़ हो उसे मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं अन्‍यथा गैर मुरद्दफ़।

Articles Under this Category

अपना जीवन.... | ग़ज़ल - कुँअर बेचैन

अपना जीवन निहाल कर लेते
औरों का भी ख़याल कर लेते
...

मैंने लिखा कुछ भी नहीं | ग़ज़ल - डॉ सुधेश

मैंने लिखा कुछ भी नहीं
तुम ने पढ़ा कुछ भी नहीं ।

...

सामने गुलशन नज़र आया | ग़ज़ल - डॉ सुधेश

सामने गुलशन नज़र आया
गीत भँवरे ने मधुर गाया ।

फूल के संग मिले काँटे भी
ज़िन्दगी का यही सरमाया ।

उन की महफ़िल में क़दम मेरा
मैं बडी गुस्ताखी कर आया ।

आँख में भर कर उसे देखा
फिर रहा हूँ तब से भरमाया ।

चोट ऐसी वक्त ने मारी
गीत होंठों ने मधुर गाया ।

धुंध ऐसी सुबह को छाई
शाम का मन्जर नज़र आया ।

आँख टेढ़ी जब हुई उन की
ज़िन्दगी ने बस क़हर ढाया ।

...

मैं रहूँ या न रहूँ | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह

मैं रहूँ या न रहूँ, मेरा पता रह जाएगा
शाख़ पर यदि एक भी पत्ता हरा रह जाएगा

...

कोई फिर कैसे.... | ग़ज़ल - कुँअर बेचैन

कोई फिर कैसे किसी शख़्स की पहचान करे
सूरतें सारी नकाबों में सफ़र करती हैं
...

जी रहे हैं लोग कैसे | ग़ज़ल - उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

जी रहे हैं लोग कैसे आज के वातावरण में,
नींद में दु:स्वप्न आते, भय सताता जागरण में।

...

बदलीं जो उनकी आँखें - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

बदलीं जो उनकी आँखें, इरादा बदल गया ।
गुल जैसे चमचमाया कि बुलबुल मसल गया ।

...

किनारा वह हमसे  - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

किनारा वह हमसे किये जा रहे हैं।
दिखाने को दर्शन दिये जा रहे हैं।

...

बग़ैर बात कोई | ग़ज़ल - राजगोपाल सिंह

बग़ैर बात कोई किसका दुख बँटाता है
वो जानता है मुझे इसलिए रुलाता है

...

आप क्यों दिल को बचाते हैं यों टकराने से | ग़ज़ल - गुलाब खंडेलवाल

आप क्यों दिल को बचाते हैं यों टकराने से
ये वो प्याला है जो भरता है छलक जाने से

...

कभी दो क़दम.. | ग़ज़ल - गुलाब खंडेलवाल

कभी दो क़दम, कभी दस क़दम, कभी सौ क़दम भी निकल सके
मेरे साथ उठके चले तो वे, मेरे साथ-साथ न चल सके

...

उग बबूल आया, चन्दन चला गया | ग़ज़ल - संजय तन्हा


...

ना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है | ग़ज़ल - डा अदिति कैलाश

ना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है
दीवार-दर हो के भी घर सुनसान क्यूँ है

मुश्किल है अब तो जीना एक पल भी तेरे बिन
ये जान कर भी तू मुझसे यूँ अनजान क्यूँ है

कमी नहीं है प्यार की इस जहाँ में देख लो
पर हर शख्स यहाँ इतना परेशान क्यूँ है

दोस्ती से हसीं कुछ नहीं है इस जहाँ में यारों
हर दिल में यहाँ दुश्मनी का सामान क्यूँ है

नहीं सोचा था रह जाउंगी मै भी कभी यूँ तन्हा
सपनों के रास्तें में ये बड़ा शमशान क्यूँ है

ना जाने मेरी जिंदगी यूँ वीरान क्यूँ है
दीवार-दर हो के भी घर सुनसान क्यूँ है

...

दो ग़ज़लें - प्रगीत कुँअर

सबने बस एक नज़र भर देखा
हमने मंज़र वो ठहर कर देखा

फिर से दुनिया में लौट आये हम
हमने सौ बार भी मर कर देखा

...

रुख से उनके हमें - सुभाष श्याम सहर्ष

रुख से उनके हमें पर्दा करना ना आया
बेदर्द हम के अदा पे उनके हमें मरना ना आया

...

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश