व्यंग्य | Satire
क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो। - डॉ. श्यामसुंदर दास।

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हिंदी व्यंग्य. Hindi Satire.

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ठिठुरता हुआ गणतंत्र  - हरिशंकर परसाई | Harishankar Parsai

चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र-समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता। छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ पड़ जाती है। शीत-लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूँदाबाँदी होती है और सूर्य छिप जाता है। जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति जैसे डॉलर, पौंड, रुपया, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा-कोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं।
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मजबूरी और कमजोरी - नरेन्द्र कोहली

मैं रामलुभाया के घर पहुँचा तो देख कर चकित रह गया कि वह बोतल खोल कर बैठा हुआ था।

"यह क्या रामलुभाया !''  मैंने कहा, "तुम तो मदिरा के बहुत विरोधी थे।'"

"विरोधी तो अब भी हूँ; किंतु क्या करूं । इस वर्ष भी आचार्य ने मुझे पुरस्कार नहीं दिया।"

"तो तुम मदिरा पीने बैठ गए ?''

‘‘गम तो गलत करना ही था।'' वह बोला।

"मिल गया होता तो तुम अपनी विजय का समारोह कर रहे होते; और तब भी मित्रों के साथ बैठ कर पी रहे होते।'' मैंने कहा।

‘‘नहीं ऐसी बात नहीं है।'' वह बोला, ‘‘यह तो मैं पूर्णतः हताश होके कर रहा हूँ। समझ लो कि जीवन में प्रगति के सारे मार्ग बंद हो जाने के कारण विष पीने का साहस नहीं कर सकता तो मदिरा ले कर बैठ गया।''

‘‘साहित्य का पुरस्कार नहीं मिला तो प्रगति के सारे मार्ग ही बंद हो गए ?''

‘‘और क्या। पैंतालीस वर्ष हो गए लिखते और पुरस्कार फिर भी नहीं मिला।'' वह रो दिया, ‘‘ कल के बच्चे भी अपने घर में कई कई पुरस्कार सजाए बैठे हैं।''

‘‘धैर्य रखो। संभव है कि अगले वर्ष मिल जाए।'' मैंने कहा।

‘‘नहीं ! मुझे नहीं मिल सकता।'' वह बोला, ‘‘अगले वर्ष चकोरी को मिलेगा।''

‘‘क्यों चकोरी तुम से अच्छा लिखती है ?''

‘‘नहीं ! किंतु पुरस्कार देने वाले आचार्य की मजबूरी साहित्य नहीं, स्त्री है।''

‘‘ उस से क्या ?'' मैंने कहा।

‘‘और चकोरी की कमजोरी पुरस्कार है।'' रामलुभाया बोला, ‘‘वह पुरस्कार के लिए अपना सौदा कर लेगी।''

‘‘तुम एक भली स्त्री को बदनाम कर रहे हो। कोई स्त्री इस प्रकार का कुत्सित व्यापार नहीं करेगी। ऐसे व्यापार में उस की उपलब्धि क्या है, हानि ही हानि है।'' मैं ने उसे डांट दिया,
‘‘और आचार्य भी पचहत्तर को पार कर गए हैं, उन पर इस प्रकार के आक्षेप उचित नहीं हैं।''

‘‘क्या करें पचहत्तर पार वाले ही यह सब कर रहे हैं।'' वह बोला, ‘‘और चकोरी जैसियों की कोई मर्यादा नहीं है।''

‘‘तो तुम मदिरा पी-पी कर अपना स्वास्थ्य खराब करोगे, पुरस्कार तो तुम्हें तब भी नहीं मिलेगा।'' मैंने कहा।

‘‘तो क्या करूं ? विष खा लूं क्या ?''

‘‘नहीं विष क्यों खाओगे ?'' मैं ने कहा, ‘‘आचार्य की मजबूरी मदिरा नहीं है क्या ?''

‘‘नहीं ! ये तो बिल्कुल शुद्ध संतरे के रस वाले हैं, पर दूसरे संप्रदाय के हैं, जो पेग नहीं भांड के हिसाब से पीते हैं।''
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अतिथि! तुम कब जाओगे  - शरद जोशी | Sharad Joshi

तुम्हारे आने के चौथे दिन, बार-बार यह प्रश्न मेरे मन में उमड़ रहा है, तुम कब जाओगे अतिथि! तुम कब घर से निकलोगे मेरे मेहमान!
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