जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

फ़िजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष

 (कथा-कहानी) 
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रचनाकार:

 तोताराम सनाढ्य | फीजी

मेरा जन्म सन 1876 ई० में हिरनगो (फिरोजाबाद) में सनाढ्य कुल में हुआ था। मेरे पिता पं० रेवतीरामजी का देहांत सन 1887 ई० में हो गया, और मैं, मेरी माँ व मेरे भाई रामलाल और दुर्गा प्रसाद अनाथ रह गए। पिताजी ने हम लोगों के लिए कोई चार हजार रुपये के गहने, इत्यदि की संपत्ति छोड़ी थी, परंतु वह कुल एक ही वर्ष में उड़ गयी। कारण यह था कि जिन महाजनों के यहाँ गहने रख कर रुपये उधार लिए गए, उन्होंने बहुत कम मूल्य में ही गहने रख लिए। इस कारण चार हजार रुपये का गहना थोड़े ही दिनों में व्यय हो गया। वे दरिद्रता के दिन मुझे आज तक स्मरण हैं और जब मैं उन दिनों की कल्पना अपने मस्तिष्क में करता हूँ तो मेरे हृदयाकाश में एक दुःख की घटा छा जाती है।/p>

मेरा बड़ा भाई रामलाल इन दुखों से पीड़ित हो कर कलकत्ता चला गया और वहाँ रेली ब्रदर्स के यहाँ आठ रुपये महीने की मुनीमगिरी की नौकरी कर ली। मेरी माता इस निर्धनता से बड़ी पीड़ित थी। आठ रुपये महीने में मेरा भाई स्वयं अपना व्यय चलाता था और थोड़ा बहुत घर भी भेज दिया करता था। मैं हिरनगौ की एक पाठशला में तीसरे दर्जे में पंडित कल्याण प्रसाद के पास पढ़ता था। मेरी माता मुझसे कहा करती थीं- "बेटा! जिस तरह हो, अब तो अपने पेट-पालन का उपाय सोचो।" माता का दुःख मुझसे देखा न गया, अतएव सन 1893 ई० में नौकरी के लिए मैं घर से निकल कर पैदल चल दिया। मेरे पास कुल सात आने पैसे थे। मार्ग में अनेक कठिनाईयों का सामना करता हुआ कोई सोलह दिन में प्रयाग पहुँचा। बस, इसी स्थान से मेरी तुच्छ जीवनी की दु:खजनक रामकहानी प्रारंभ होती है।

प्रयाग पहुँच कर मैंने भागीरथी के तट पर स्नान किए, तदनंतर दारागंज के बच्चा नामक एक अहीर से मेरी भेंट हो गयी। उस अहीर ने मेरा सब हाल सुन कमुझ पर दया की और अपने घर ले गया। मैं लगभग दो महीने उस अहीर के यहाँ रहा। उस अहीर ने जिस कृपा का बर्ताव मेरे साथ किया उसे मै जन्म-पर्यंत नहीं भूलूँगा। जब तीर्थराज में रहते-रहते मुझे बहुत दिन हो गए और कोई नौकरी नहीं मिली, तो मैंने विचार किया कि चलो अपने घर लौट चलें, परंतु फिर मेरे मेरे मन में यही विचार आया कि अब घर चल कर माता के वे कष्ट मुझसे देखें नहीं जाएंगे, उसे कुछ भी सहायता न देते हुए उसके ऊपर भार-स्वरूप होना ठीक नहीं। कभी माता का प्रेम मुझे घर की ओर खींचे लाता था और कभी माता के दुखों की स्मृति मुझे इस बात के लिए बाध्य कर रही थी कि मैं कहीं कोई नौकरी कर लूँ और घर न जाऊँ। इस प्रकार मैं दुविधा में पड़ा हुआ था।

एक दिन मैं कोतवाली के पास चौक में इसी चिंता में निमग्न था कि इतने में मेरे पास एक अपरिचित व्यक्ति आया और उसने मुझसे कहा, "क्या तुम नौकरी करना चाहते हो?" मैंने कहा 'हाँ'। तब उसने कहा 'अच्छा हम तुम्हें बहुत अच्छी नौकरी दिलवायेंगे। ऐसी नौकरी कि तुम्हारा दिल खुश हो जाय।' इस पर मैंने कहा, 'मैं नौकरी तो करूँगा लेकिन छह महीने या साल-भर से अधिक दिन के लिए नहीं कर सकता।' उसने कहा, 'अच्छा! आओ तो सही, जब तुम्हारी इच्छा हो तब नौकरी छोड़ देना, कोई हर्ज नहीं, चलो जगन्नाथजी के दर्शन तो कर लेना।' मेरी बुद्धि परिपक्व तो थी नहीं, मैं बातों में आ गया। इसी तरह धोखे में आ कर सहस्रों भारतवासी आजन्म कष्ट उठाते हैं। हे मेरे सुशिक्षित देशबंधुओं! क्या आपने इन भाइयों के विषय में कभी विचार किया है? क्या आपके हृदय में इन दुखित भाइयों के लिए कुछ कष्ट हुआ है? क्या कभी सजला सफला मातृभूमि के उन पुत्रों के विषय में आपने सुना है जो डिपोवालों की दुष्टता से दूसरे देशों में भेजे जाते हैं? क्या इन लोगों के आर्तनाद को सुन कर आप के कान पर जूँ भी नही रेंगेगी?

वह आरकाटी मुझे बहका कर अपने घर ले गया वहाँ जा कर मैंने देखा कि एक दालान में लगभग एक सौ पुरुष और दूसरे में करीब साठ स्त्रियाँ बैठी हुई हैं। कुछ लोग गीली लकड़ियों से रसोई कर रहे थे और चूल्हा फूँकते-फूँकते हैरान हो रहे थे। उस आरकाटी ने मुझे एक मूढ़े पर बैठा दिया। उन स्त्रियों को देख कर मैंने सोचा कि ये पुरुष तो नौकरी करने के लिए जा रहे हैं परंतु ये बेचारी स्त्रियाँ कहाँ जा रही हैं। लेकिन उस समय उन स्त्रियों से बातचीत करने की उस आरकाटी ने बिलकुल मनाही कर रखथी। वहाँ से न तो कोई बाहर आ सकता था और न कोई बाहर से भीतर जा सकता था। आरकाटी ने मुझसे कहा- 'तुम यहीं चावलों का भात बना लो, मैं अभी चावल तुम्हें देता हूँ। मैंने कहा- मैं भात बनाना नहीं जानता। इसी ब्राह्मण के साथ जो रसोई बना रहा है, मैं भी खा लूँगा। आरकाटी उन लोगों को समझाता था, "देखो भाई, जहाँ तुम नौकरी करोगे वहाँ तुम्हें ये दुःख वहाँ नहीं सहने पड़ेंगे। तुम्हें वहाँ किसी बात की तकलीफ नहीं होगी। खूब पेट-भर गन्ने और केले खाना और चैन की बंशी बजाना।"

तदनंतर तीसरे दिन यह वह आरकाटी हम सब को मजिस्ट्रेट के पास ले जाने की तैयारियाँ करने लगा। कुल 165 स्त्री-पुरुष थे। सब गाड़ियों में बंद किए गए और कोई आध घंटे में हम लोग कचहरी पहुँचे। उस आरकाटी ने हम लोगों से पहले ही कह रखा था कि साहब जब तुम लोगों से कोई बात पूछे तो 'हाँ' कहना, अगर तुमने नाहीं कर दी तो बस तुम पर नालिश कर दी जाएगी और तुम्हें जेल काटनी पड़ेगी। सब लोग एक-एक करके मजिस्ट्रेट के सामने लाये गए। वह प्रत्येक से पूछता था, "कहो तुम फिजी जाने को राजी हो?" मजिस्ट्रेट यह नहीं बताता था कि फिजी कहाँ है, वहाँ क्या काम करना पड़ेगा तथा काम न करने पर क्या दंड दिया जाएगा। उस मजिस्ट्रेट ने 165 आदमियों की रजिस्ट्री कोई 20 मिनट में कर दी। इस बात से पाठक अनुमान लगा सकते हैं कि मजिस्ट्रेट साहब भी अपना पिंड छुड़ाना चाहते थे, नहीं तो यह काम इतनी जल्दी कैसे हो सकता है।

वहाँ से चल कर हम सब रेल में लादे गए। न तो गाड़ी में बैठे हुए मनुष्यों से और न बाहर के आदमियों से बातचीत करने पाते थे, यदि कोई आपस में बातचीत करते तो उठा दिए जाते थे। हाँ, यह कहना भूल गया कि वह ट्रेन स्पेशल थी और सीधी हावड़ा पहुँची, बीच में कहीं नहीं रुकी। हावड़ा स्टेशन से सब लोग बंद गाड़ी में बिठाए जा कर डिपो में पहुँचाये गए। यहाँ इमीग्रेशन अफसर ने हम सब को एक पंक्ति में खड़ा किया और कहा, "तुम फिजी जाते हो, वहाँ तुम्हें 12 आना रोज मिलेंगे और 5 वर्ष तक खेती का काम करना होगा। अगर तुम वहाँ से पाँच वर्ष बाद लौटोगे तो अपने पास से किराया देना होगा और अगर 10 वर्ष बाद लौटोगे तो सरकार अपने पास से भाड़ा देगी। तुम लोग वहाँ से बहुत रुपये ला सकते हो। केवल 12 आना नहीं, बल्कि और भी उपर कमा सकते हो। वहाँ बड़े आनंद से रहोगे। फिजी क्या है स्वर्ग है।" इस प्रकार उसने बहुत कुछ चिकनी-चुपड़ी बातें कहीं। हम अशिक्षित लोग कुछ तो पहले ही से बहकाहुए थे और रहे-सहे उस अफसर ने बहका दिए। इमिग्रेशन अफसर ने भी यह पूछा, "तुम्हारा किसी के पास धन तो नहीं है?" उस आरकाटी ने, जो साहब के पीछे खड़ा हुआ था, हम लोगों से हाथ से इशारा कर दिया की कुछ मत कहो, हम तुम्हारी चीजें अभी दे देंगे। लेकिन साहब के जाते ही वह आरकाटी भी चला गया। फिर कौन देता है और कौन लेता है। कितने ही आदमियों के बर्तन, वस्त्र, रुपये-पैसे इत्यादि उस आरकाटी के पास रह गए।

जब वह अफसर हम लोगों को समझा रहा था तो मेरे दिल में एक शंका उत्पन्न हुई। मैंने सोचा, पाँच वर्ष बहुत होते हैं, न जाने फिजी जा कर कैसा कठिन काम करना पड़ेगा और काम न कर सका तो कैसी मार पड़ेगी। यही विचार कर मैंने कहा, "मैं फिजी नहीं जाना चाहता, मैंने खेती का काम कभी नहीं किया, मेरे हाथ देखिए, ये खेती कभी नहीं कर सकते, मैं फिजी न जाऊँगा। यह सुन कर उस अफसर ने मुझे दो बंगाली बाबुओं के हवाले किया और उनसे कहा, "इसे समझा कर ठीक करो।" मैंने उनसे भी इंकार किया और कहा "मेरे भाई कलकत्ते में यहीं किसी मुहल्ले में है, मुझे उससे मिल लेने दो, फिर देखा जाएगा।" पर कौन सुनता है। मेरे साथ-साथ दरबान रहता था। जब मैं समझाए जाने पर किसी तरह राजी न हुआ, तो एक कोठरी में बंद कर दिया गया। एक दिन एक रात मैं भूखा-प्यासा उसी कोठरी में रहा। अंत में लाचार हो कर मुझे कहना पड़ा कि मैं फिजी जाने को राजी हूँ। क्या करता। वहाँ कोई अपना आदमी तो था नहीं जिसे यह दुख-वृतांत सुनाता।

जब मैं कोठरी से बाहर लाया गया तो मैंने देखा कि जबरदस्ती चमार, कोली, ब्राह्मण इत्यादि सबको एक ही जगह बैठ कर भोजन कराया जाता है। लगभग सबको मिट्टी के जूठे बर्तनों में भोजन कराया गया और पानी पिलाया गया। जहाँ कोई कुछ बोला, बस फिर क्या है खूब पीटा गया। मैंने यह व्यवस्था देख कर कहा, "मैं इनके साथ भोजन नहीं करूँगा चाहे भूखों मार जाऊँ।" उस अफसर ने कहा "मर जाओ कोई डर नहीं, तुम्हें नदी में फ़ेंक देंगे।" अंत में मुझे आज्ञा दी गयी कि तुम भंडारी के साथ भोजन कर लिया करो। कपड़े जो हम लोगों के पास अच्छे-अच्छे थे, धोने के बहाने सब ले लिए गए और एक भंगी स्नान कराने के लिए हम सबको घाट पर ले गया। हम सबको साबुन दिया गया। बेचारे बहुत से भोले-भाले लोगों ने यह समझा कि हम दूर से आये हैं, हमें जल-पान के लिए बर्फी मिली है! कुछ लोगों ने तो उसे कलाकंद जान कर खा भी लिया और फिर हरे राम हरे राम, थू थू थू करने लगे। देखिए किस तरह के सीधे-सादे लोगों को आरकाटी बहका कर ले जाते हैं। ये विचारे साबुन को भी बर्फी समझते हैं! क्या हमारे धर्मोपदेशकों ने जो कि धर्म की धुरी बने हुए हैं और शहरों में ही प्लेटफार्म को व्याख्यान देते-देते घिसा करते हैं, कभी उन ग्रामीण बुद्धि के रंकों के ऊपर भी दया की है? क्या कभी ग्रामों में आ कर किसी ने इनके उद्धार के विषय में भी व्याख्यान देना कर्तव्य समझा है? शहरों में तो नित्य नये उपदेशक बने रहते हैं पर बेचारे ग्रामीणों को ऐसे उपदेश दुर्लभ हैं, इसी से यह साबुन को बर्फी समझ बैठे।

डाक्टरी परीक्षा- जब जहाज पर चढ़ने के दो या तीन दिन शेष रहे, तब हम सब की डाक्टरी परीक्षा हुई। पुरुषों और स्त्रियों तक की परीक्षा पुरुष डाक्टरों ने ही ली। तत्पश्चात पहनने के लिए कैदियों के से कुर्ते, टोपी और पजामा दिए गए। पानी के लिए टिन का लोटा, भोजन रखने के लिए टिन की थाली और सामान रखने के लिय एक छोटा-सा थैला दिया गया।

[ तोताराम सनाढ्य की फ़िजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष ]

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