राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।

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न्यूजीलैंड : जहाँ सबसे पहले मनता है नया-वर्ष  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

अंतर्राष्ट्रीय दिनांक रेखा के करीब अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण, न्यूजीलैंड नए साल का स्वागत करने वाले दुनिया के पहले देशों में से एक है। अंत: न्यूजीलैंड में नया वर्ष दूसरे देशों से पहले मनाया जाता है। न्यूजीलैंड में नव-वर्ष और उससे अगले दिन सार्वजनिक अवकाश रहता है।
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भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra

आज बड़े आनंद का दिन है कि छोटे से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को एक बड़े उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं। इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत है। बनारस ऐसे-ऐसे बड़े नगरों में जब कुछ नहीं होता तो हम यह न कहेंगे कि बलिया में जो कुछ हमने देखा वह बहुत ही प्रशंसा के योग्य है। इस उत्साह का मूल कारण जो हमने खोजा तो प्रगट हो गया कि इस देश के भाग्य से आजकल यहाँ सारा समाज ही एकत्र है। राबर्ट साहब बहादुर ऐसे कलेक्टर जहाँ हो वहाँ क्यों न ऐसा समाज हो। जिस देश और काल में ईश्वर ने अकबर को उत्पन्न किया था उसी में अबुलफजल, बीरबल,टोडरमल को भी उत्पन्न किया। यहाँ राबर्ट साहब अकबर हैं जो मुंशी चतुर्भुज सहाय, मुंशी बिहारीलाल साहब आदि अबुलफजल और टोडरमल हैं। हमारे हिंदुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी है। यद्यपि फर्स्ट क्लास, सैकेंड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी-अच्छी और बड़े-बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी है पर बिना इंजिन सब नहीं चल सकती वैसी ही हिंदुस्तानी लोगों को कोई चलाने वाला हो तो ये क्या नहीं कर सकते। इनसे इतना कह दीजिए 'का चुप साधि रहा बलवाना' फिर देखिए हनुमानजी को अपना बल कैसा याद आता है। सो बल कौन याद दिलावे। हिंदुस्तानी राजे-महाराजे, नवाब, रईस या हाकिम। राजे-महाराजों को अपनी पूजा, भोजन, झूठी गप से छुट्टी नहीं। हाकिमों को कुछ तो सरकारी काम घेरे रहता है कुछ बाल-घुड़दौड़, थियेटर में समय लगा। कुछ समय बचा भी तो उनको क्या गरह है कि हम गरीब, गंदे, काले आदमियों से मिल कर अपना अनमोल समय खोवें। बस यही मसल रही -
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ठिठुरता हुआ गणतंत्र  - हरिशंकर परसाई | Harishankar Parsai

चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र-समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता। छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ पड़ जाती है। शीत-लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूँदाबाँदी होती है और सूर्य छिप जाता है। जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति जैसे डॉलर, पौंड, रुपया, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा-कोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं।
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स्वामी विवेकानंद का विश्व धर्म सम्मेलन संबोधन - भारत-दर्शन संकलन

स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893 को शिकागो (अमेरिका) में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में एक बेहद चर्चित भाषण दिया था। विवेकानंद का जब भी जि़क्र आता है उनके इस भाषण की चर्चा जरूर होती है। पढ़ें विवेकानंद का यह भाषण...

अमेरिका के बहनो और भाइयो
आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।

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करूणा और दुख के कवि ग़ालिब - फ़िरोज़ बख़्त अहमद

रंजिश ही सही ग़म को भुलाने के लिए आज!
करूणा और दुख के कवि ग़ालिब

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महीनों का नामकरण कैसे हुआ? - भारत-दर्शन संकलन

महीने के नामों से तो हम सब परिचित हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि महीनों का नामकरण कैसे हुआ? आइए, महीनों के नामकरण व इनकी पृष्ठभूमि को जानें।

जनवरी : रोमन देवता 'जेनस' के नाम पर वर्ष के पहले महीने जनवरी का नामकरण हुआ। जेनस के दो चेहरे बताए गए हैं। वह एक से आगे तथा दूसरे से पीछे देखता है।  जनवरी के भी दो चेहरे हैं। एक से वह बीते हुए वर्ष को देखता है तथा दूसरे से अगले वर्ष को। जेनस को लैटिन में जैनअरिस कहा गया। जेनस जो बाद में जेनुअरी बना और हिन्दी में जनवरी कहा जाने लगा।

फरवरी : इस महीने का संबंध लेटिन के फैबरा से है। इसका अर्थ है 'शुद्धि की दावत।' पहले इसी माह में 15 तारीख को लोग शुद्धि की दावत दिया करते थे।  फरवरी नाम का संबंध रोम की एक देवी फेबरुएरिया से भी माना जाता है। जो संतानोत्पत्ति की देवी मानी गई है इसलिए महिलाएँ इस महीने इस देवी की पूजा करती थीं ताकि वे प्रसन्न होकर उन्हें संतान का आशीर्वाद दे।

मार्च : रोमन देवता 'मार्स' के नाम पर मार्च महीने का नामकरण हुआ। रोमन वर्ष का प्रारंभ इसी महीने से होता था। मार्स मार्टिअस का अपभ्रंश है जो आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। सर्दियाँ समाप्त होने पर लोग शत्रु देश पर आक्रमण करते थे इसलिए इस महीने को मार्च नाम से पुकारा गया।

अप्रैल : इस महीने की उत्पत्ति लैटिन शब्द 'एस्पेरायर' से हुई। इसका अर्थ है खुलना। रोम में इसी माह कलियाँ खिलकर फूल बनती थीं अर्थात बसंत का आगमन होता था इसलिए प्रारंभ में इस माह का नाम एप्रिलिस रखा गया। इसके पश्चात वर्ष के केवल दस माह होने के कारण यह बसंत से काफी दूर होता चला गया। वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के सही भ्रमण की जानकारी से दुनिया को अवगत कराया तब वर्ष में दो महीने और जोड़कर एप्रिलिस का नाम पुनः सार्थक किया गया।

मई : रोमन देवता मरकरी की माता 'मइया' के नाम पर मई नामकरण हुआ। मई का तात्पर्य 'बड़े-बुजुर्ग रईस' हैं। मई नाम की उत्पत्ति लैटिन के मेजोरेस से भी मानी जाती है।

जून : इस महीने लोग शादी करके घर बसाते थे। इसलिए परिवार के लिए उपयोग होने वाले लैटिन शब्द जेन्स के आधार पर जून का नामकरण हुआ।
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हिंदी और राष्ट्रीय एकता - सुभाषचन्द्र बोस

यह काम बड़ा दूरदर्शितापूर्ण है और इसका परिणाम बहुत दूर आगे चल कर निकलेगा। प्रांतीय ईर्ष्या-द्वेश को दूर करने में जितनी सहायता हमें हिंदी-प्रचार से मिलेगी, उतनी दूसरी किसी चीज़ से नहीं मिल सकती। अपनी प्रांतीय भाषाओं की भरपूर उन्नति कीजिए। उसमें कोई बाधा नहीं डालना चाहता और न हम किसी की बाधा को सहन ही कर सकते हैं; पर सारे प्रांतो की सार्वजनिक भाषा का पद हिंदी या हिंदुस्तानी ही को मिला। नेहरू-रिपोर्ट में भी इसी की सिफारिश की गई है। यदि हम लोगों ने तन मन से प्रयत्न किया, तो वह दिन दूर नहीं है, जब भारत स्वाधीन होगा और उसकी राष्ट्रभाषा होगी हिंदी।

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चॉकलेट स्वाद से सौंदर्य तक - प्रीता व्यास

चॉकलेट का नाम आता है तो बच्चा हो या बड़ा एक मीठा सा स्वाद उसके मुँह में तैर जाता है। शायद ही कोई हो जिसे चॉकलेट पसंद न हो। चॉकलेट तो चॉकलेट है, चाहे किसी भी रूप में हो- सादा हो या नट्स के साथ, ठोस हो या पेय के रूप में। लेकिन चॉकलेट के सफ़र की हदें इन रसीली सरहदों के आगे हैं। अब चॉकलेट का नाम आने से केवल स्वाद तक बात नहीं रह जाती बल्कि एक और भी तस्वीर उभरती है जिसके सरोकार सौन्दर्य से हैं। अमूमन सौन्दर्य की बात हो तो तरह-तरह के उबटन जहन में उतर आते हैं। क्या कोई सोच सकता है कि ये उबटन चॉकलेट का हो सकता है? हल्दी- चन्दन के उबटन वाले दिन लद गए, अब तो चेहरे को चमकता है चॉकलेट का उबटन।
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क्या बन सकेगा भारत एक सुपर- पावर ? - प्रीता व्यास

भारत में मई 2014 के चुनावों के बाद जब नरेंद्र मोदी प्रधानमन्त्री बने तो कुछ एक शिकायती सुर थे लेकिन एक बड़ा तबका था देश में जिसने पूरे जोश में, ना जाने कितनी आशाओं और उम्मीदों को नए प्रधानमंत्री से जोड़ दिया था। सिर्फ देश में ही नहीं, विदेशों में भी जहाँ-जहाँ भारतीय थे मोदी को लेकर एक नई उम्मीद उन सबने जताई। मोदी जैसे एक नाम नहीं था, एक जादू था जो सर चढ़ कर बोल रहा था। वक़्त बीतने के साथ जादू ख़त्म तो नहीं हुआ फीका सा ज़रूर कहा जा सकता है।
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क्यों डरें महर्षि वेलेन्टाइन से?  - डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Dr Ved Pratap Vaidik

‘सेंट वेलेन्टाइन डे’ का विरोध अगर इसलिए किया जाता है कि वह प्रेम-दिवस है तो इससे बढ़कर अभारतीयता क्या हो सकती है?  प्रेम का, यौन का, काम का जो मुक़ाम भारत में है, हिन्दू धर्म में है, हमारी परम्परा में है, वह दुनिया में कहीं नहीं है। धर्मशास्त्रों में जो पुरुषार्थ-चतुष्टय बताया गया है--धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-- उसमें काम का महत्व स्वयंसिद्ध है। काम ही सृष्टि का मूल है। अगर काम न हो तो सृष्टि कैसे होगी? काम के बिना धर्म का पालन नहीं हो सकता। इसीलिए काम पर रचे गए ग्रन्थ को कामशास्त्र कहा गया?  शास्त्र किसे कहा जाता है?  क्या किसी अश्लील ग्रन्थ को कोई शास्त्र कहेगा? शास्त्रकार भी कौन है? महर्षि है! महर्षि वात्स्यायन! वैसे ही जैसे कि महर्षि वेलेन्टाइन जो पैदा हुए, तीसरी सदी में। वे भारत में नहीं, इटली में पैदा हुए।

वात्स्यायन को किसी सम्राट से टक्कर लेनी पड़ी या नहीं, कुछ पता नहीं लेकिन कहा जाता है कि तीसरी सदी के रोमन सम्राट क्लॉडियस द्वितीय और वेलेन्टाइन के बीच तलवारें खिंच गई थीं। क्लॉडियस ने विवाह वर्जित कर दिए थे। उसे नौजवान फ़ौजियों की जरूरत थी। कुँवारे रणबाँकुरों की जरूरत थी। सम्राट के चंगुल से निकल भागनेवाले युवक और युवतियाँ, जिस ईसाई सन्त की शरण में जाते थे, उसका नाम ही वेलेन्टाइन है। वेलेन्टाइन उनका विवाह करवा देता था, उन्हें प्रेम करने की सीख देता था और जो सम्राट की कारागार  में पड़े होते थे, उन्हें छुड़वाने की गुपचुप कोशिश करता था। कहते हैं कि इस प्रेम के पुजारी सन्त को सम्राट क्लॉडियस ने आखिरकार मौत के घाट उतार दिया। किंवदन्ती यह भी है कि मौत के घाट उतरने के पहले वेलेन्टाइन ने प्रेम की नदी में स्नान किया। वे क्लॉडियस की जेल में रहे और जेल से ही उन्होंने जेलर की बेटी को अपना प्रेम-सन्देसा पठाया- कार्ड के जरिए, जिसके अन्त में लिखा हुआ था ‘तुम्हारे वेलेन्टाइन की ओर से’। यह वह पंक्ति है, जो यूरोप के प्रेमी-प्रेमिका अब 1700 साल बाद भी एक-दूसरे को लिखना पसंद करते हैं !

ऐसे सन्त वेलेन्टाइन से भारतीयता का भला क्या विरोध हो सकता है?  वेलेन्टाइन नाम का कोई सन्त सचमुच हुआ या नहीं, इस पर यूरोपीय इतिहासकारों में मतभेद है। अगर यह मान भी लें कि वेलेन्टाइन सिर्फ कपोल-कल्पना है तो भी इसमें त्याज्य क्या है? वेलेन्टाइन का दिन आखिर कब मनाया जाता है? फरवरी में, 14 तारीख को!  फरवरी तक, मध्य फरवरी तक प्रकृति में, पुरूष में, नारी में, पशु-पक्षी में चराचर जगत में क्या कोई परिवर्तन नहीं होता?  आया वसन्त, जाड़ा उड़न्त! वसन्त के परिवर्तनों का जैसा कालिदास ने ऋतुसंहार में, श्रीहर्ष ने रत्नावली में, भास ने स्वप्नवासवदत्तम् में और विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस में अंकन किया है, क्या किसी पश्चिमी नाटककार या कवि ने किया है? सौन्दर्य का, प्रेम का, श्रृंगार का, रति का, मौसम की मजबूरियों का इतना सूक्ष्म चित्रण इतना गहन और स्पष्ट है कि उसे यहाँ लिखने की बजाय वहाँ पढ़ने की सलाह दी जा रही है। प्रेम के इस व्यापार में हजार वेलन्टाइनों को पछाड़ने के लिए एक कालिदास ही काफी है। अगर प्रेम की पूजा के लिए वेलेन्टाइन की भर्त्सना करेंगे तो कालिदास का क्या करेंगे? श्रीहर्ष का क्या करेंगे? बाणभट्ट का क्या करेंगे? संस्कृत के इन महान कवियों के लिए तो बाक़ायदा कोई बूचड़खाना ही खोलना पड़ेगा। खजुराहो और  कोणार्क के मंदिरों को ढहाने के लिए तो गज़नियों और गोरियों को बुलाना पड़ेगा।

‘वेलेन्टाइन डे’ के पीछे लट्ठ लेकर पड़े हमारे नौजवानों को शायद पता नहीं कि भारत में मदनोत्सव, वसन्तोत्सव और कौमुदी महोत्सव की शानदार परम्पराएँ रही हैं। इन उत्सवों के आगे ‘वेलेन्टाइन डे’ पानी भरता नज़र आता है। यदि मदनोत्सवों के सम्भाषणों की तुलना ‘वेलेन्टाइन डे’ कार्डों से की जाए तो लगेगा कि किसी सर्चलाइट के आगे लालटेन रख दी गई है, शेर के आगे बकरी खड़ी कर दी गई है और मन भर को कन भर से तौला जा रहा है। कौमुदी महोत्सवों में युवक और युवतियाँ बेजान कार्डों का लेन-देन नहीं करते, प्रमत्त होकर वन-विहार करते हैं, गाते-बजाते हैं, रंगरलियाँ करते हैं, गुलाल-अबीर उड़ाते हैं, एक-दूसरे को रंगों से सरोबार करते हैं और उनके साथ चराचर जगत भी मदमस्त होकर झूमता है। मस्ती का वह संगीत पेड़-पौधों, लता-गुल्मों, पशु-पक्षियों, नदी-झरनों--प्रकृति के चप्पे-चप्पे में फूट पड़ता है। सम्पूर्ण सृष्टि प्रेम के स्पर्श के लिए आतुर दिखाई पड़ती है। सुन्दरियों के पदाघात से अशोक के वृक्ष खिल उठते हैं। सृष्टि अपना मुक्ति-पर्व मनाती है। इस मुक्ति से मनुष्य क्यों वंचित रहे? मुक्ति-पर्व की पराकाष्ठा होली में होती है। सारे बन्धन टूटते हैं। मान-मर्यादा ताक पर चली जाती है। चेतन में अचेतन और अचेतन में चेतन का मुक्त-प्रवाह होता है। राधा कृष्ण और कृष्ण राधामय हो जाते हैं। सम्पूर्ण अस्तित्व दोलायमान हो जाता है, रस में भीग जाता है, प्रेम में डूब जाता है। पद्माकर ने क्या खूब कहा है -”बीथिन में, ब्रज में, नवेलिन में, बेलिन में। बनन में, बागन में बगरौ बसंत है।“ ब्रज की गोरी, कन्हैया की जैसी दुर्गति करती है, क्या वेलेन्टाइन के प्रेमी उतनी दूर तक जा सकते हैं? अगर वे जाना चाहें तो जरूर जाएँ लेकिन जाएँगे कैसे? काठ के पाँवों पर आखिर वे कितनी देर नाच पाएँगे? वेलेन्टाइन के भारतीय प्रेमी वह ऊर्जा कहाँ से लाएँगे, जो अपनी ज़मीन से जुड़ने पर पैदा होती है?

काम का भारतीय अट्टहास यूरोप को मूर्छित कर देने के लिए काफी है। अगर वेलेन्टाइन के यूरोपीय समाज में आज कोई होली उतार दे तो वहाँ एक बड़ा सामाजिक भूकम्प हो जाएगा। ऐसे अधमरे-से वेलेन्टाइन को भारत का जो भद्रलोक अपनी छाती से चिपकाए रखना चाहता है,  जिसकी जड़ें उखड़ चुकी हैं। उसके रस के स्रोत सूख चुके हैं। उसे अपनी परम्परा का पता नहीं। वह नकल पर जिन्दा है। उसकी अपनी कोई भाषा नहीं, साहित्य नहीं, संस्कृति नहीं। वह अंधेरे में राह टटोल रहा हैं। अपने भोजन, भजन, भेषज, भूषा और भाषा-- हर क्षेत्र में पश्चिम की नकल को ही अकल मानता है। इसीलिए शुभ्रा, धवला प्रेम दिवानी मीरा उसकी नज़र से ओझल हो जाती है और किंवदन्तियों के कुहरे में लिपटे हुए वेलेन्टाइन उसके कण्ठहार बन जाते हैं। मीरा और राधा के देश का आदमी अगर वेलेन्टाइन की खोज में इटली जाता है तो उसे क्या कहा जाएगा? वाटिका में बैठा आदमी कागज के फूल सूंघ रहा हो तो उसे क्या कहा जाएगा? हवाई जहाज में उड़ता हुआ आदमी बैलगाड़ी की गति पर गीत लिख रहा हो तो उसे क्या कहा जाएगा?

भारत का आधुनिक भद्रलोक भी बड़ा विचित्र है! सयाना कौआ है। उससे चतुर दुनिया में कौन है? चतुराई इतनी कि अमेरिकियों को उनकी ज़मीन पर ही उसने दे मारा लेकिन वह जितना सयाना है, उतनी ही गलत जगह पर जा बैठता है ! मल्टीनेशनल कम्पनियों के जाल में सबसे ज्यादा वही फँसता है, उपभोक्तावाद की तोप का भूसा वही बनता है, नकलची  की भूमिका वही सहर्ष निभाता है। ‘वेलेन्टाइन डे’ के नाम पर करोड़ों डॉलर के कार्ड, उपहार और विज्ञापन का धंधा होता है। जैसे क्रिसमस आनन्द का पर्व कम, धंधे का पर्व ज्यादा बन गया है, वैसे ही ‘वेलेन्टाइन डे’ पर तीसरी दुनिया में फिजूलखर्ची की एक नई लहर उठ खड़ी हुई है। इसका विरोध जरूरी है। विरोध इसलिए भी जरूरी है कि नुक्सान आखिरकार नकलची का ही होता है। नकलची की जेब कटती है और असलची की जेब भरती है। तीसरी दुनिया का पैसा, उसके खून-पसीने की कमाई आखिरकार मालदार देशों में चली जाती है, चाहे वह कार्डों के रास्ते जाए, चाहे जीन्स और टाइयों के रास्ते जाए और चाहे पीज़ा और चिकन के ज़रिए जाए! इस रास्ते को बंद करने के लिए यदि कोई शोर मचाए तो बात समझ में आती है लेकिन बेचारे वेलेन्टाइन ने आपका क्या बिगाड़ा है? 

वेलेन्टाइन ने रोम के नौजवानों को न अनैतिकता सिखाई, न अनाचार का मार्ग दिखाया और न ही दुश्चारित्र्य को प्रोत्साहित किया। वह तो डूबतों का तिनका था, अंधेरे का दीपक था। जैसे हिन्दू समाज के बागी युवक-युवतियों के लिए आर्य समाज सहारा बनता है, वैसे ही रोम के प्रेमी-प्रेमिकाओं का सहारा वेलेन्टाइन था। वेलेन्टाइन की आड़ में अगर पश्चिमी कम्पनियाँ अपना शिकार खेल रही हैं तो बेचारा वेलेन्टाइन क्या करे? वेलेन्टाइन तो किसी मल्टीनेशनल का मालिक नहीं था! देने के लिए उसके पास कोई उपहार भी क्या रहा होगा? अगर जेलर की बेटी को कोई कार्ड उसने भेजा भी होगा तो वह हाथ से ही लिखा होगा और डाक टिकिट चिपकाकर नहीं, किसी की मिन्नतें करके ही भिजवाया होगा। सम्राट क्लॉडियस जिस पर दाँत पीस रहा हो, वह वेलेन्टाइन अपने प्रेम की अभिव्यक्ति भला विज्ञापन के ज़रिए कैसे कर सकता था। 

इसीलिए वेलेन्टाइन को नायक बनाना जितना हास्यास्पद है, उतना ही खलनायक बनाना भी है। वास्तव में ये दोनों कर्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो वेलेन्टाइन को नायक बनाते हैं, वे अपनी परम्परा से उतने ही बेगाने हैं जितने कि वे जो उसे खलनायक बनाते हैं। वेलेन्टाइन का विरोध करनेवाले क्या भारत को एक बन्द गोभी बनाना चाहते हैं? क्या वे भारत को मध्यकालीन यूरोप की पोपलीला में फँसाना चाहते हैं? क्या वे आधुनिक भारत को किसी शेखडम में परिणत करना चाहते हैं? क्या वेलेन्टाइन की आड़ में वे भारत की मुक्त संस्कृति का गला घोटना चाहते हैं? क्या वे वेलेन्टाइन की आड़ में कालिदास पर प्रहार करना चाहते हैं? जो भारत चार्वाकों को चर्वण करता रहा है, क्या वह वेलेन्टाइन को नहीं पचा सकता?

प्रतिबन्धों, प्रताड़नाओं, वर्जनाओं का भारत कभी हिन्दू भारत तो हो ही नहीं सकता। जिसे हिन्दू भारत कहा जाता है, वह ग्रन्थियों से ग्रस्त कभी नहीं रहा। वह भारत मानव-मात्र की मुक्ति का सगुण सन्देश है। उस भारत को वेलेन्टाइन से क्या डर है? उसके हर पहलू में हजारों वेलेन्टाइन बसे हुए हैं। उसे वेलेन्टाइन के आयात नहीं, होली के निर्यात की जरूरत है। चीन, जापान, थाईलैंड, सिंगापुर आदि देशों के दमित यौन के लिए वेलेन्टाइन  निकास-गली बन सकते हैं लेकिन जिस देश में गोपियाँ कृष्ण की बाहें मरोड़ देती हैं, पीताम्बर छीन लेती हैं, गालों पर गुलाल रगड़ देती हैं, और नैन नचाकर कहती हैं ‘लला, फिर आइयो खेलन होरी,’ उस देश में वेलेन्टाइन को लाया जाएगा तो वह बेचारा बगले झाँकने के अलावा क्या करेगा? कृष्ण के मुकाबले वेलेन्टाइन क्या है? कहाँ कृष्ण और कहाँ वेलेन्टाइन?

भारत को असली खतरा वेलेन्टाइन से नहीं, उस पिलपिले भद्रलोक से है, जो पिछले पचास साल में उग आया है। वेलेन्टाइन-विरोध के नाम पर जो वितण्डा हुआ, वह इस पिलपिले भद्रलोक और सिरफरे भद्रलोक के बीच हुआ है। वेलेन्टाइन को ये दोनों जानते हैं लेकिन जनता उसे नहीं जानती। वह तो उसके नाम का उच्चारण भी नहीं कर सकती। उसे वेलेन्टाइन से क्या लेना-देना है? जैसे आम जनता को वेलेन्टाइन से कुछ लेना-देना नहीं, वैसे ही इन दोनों भद्रलोकों को आम-जनता से कुछ लेना-देना नहीं है। अगर होता तो पहला भद्रलोक समतामूलक समाज की जरूरत के प्रति थोड़ा सचेत दिखाई पड़ता और दूसरा भद्रलोक उन मुद्दों पर लड़ाई छेड़ता, जिनके उठने पर धन, धरती, अवसर आदि समाज में समान रूप से बँटते। ‘वेलेन्टाइन डे’ का विरोध करके माँ-बहनों की इज़्ज़त बचाने का दावा करने की बजाय यह कहीं बेहतर होता कि ये ही स्वयंसेवक दहेज और बहू-दहन आदि के विरूद्ध मोर्चे लगाते। क्या यह विडम्बना नहीं कि ‘वेलेन्टाइन डे’ के प्रेमी और विरोधी, दोनों ही स्त्री-शक्ति को दृढ़तर बनाने के बारे में बेख़बर हैं?

(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत’ से)

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लोहड़ी - लुप्त होते अर्थ - रोहित कुमार 'हैप्पी'

यह सच है कि आज कोई भी त्यौहार चाहे वह लोहड़ी हो, होली हो या दिवाली हो - भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी धूम-धाम से मनाया जाता है। यह भी सत्य है कि अधिकतर आयोजक व आगंतुक इनके अर्थ, आधार व पृष्ठभूमि से अनभिज्ञ होते हैं। आयोजक एक-दो पृष्ठ के भाषण रट कर अपने ज्ञान का दिखावा कर देते हैं और इस तोता रटंत भाषण से हट कर यदि कोई प्रश्न कर लिया जाए तो उनकी बत्ती चली जाती है और आगंतुक/दर्शक वर्ग तो मौज-मस्ती के लिए आता है। आज लोहड़ी है - लेकिन अब कितने बच्चों को लोहड़ी के गीत आते हैं? कौन मां-बाप लोहड़ी के गीत गा अपने बच्चों को पड़ोसियों के घर लोहड़ी मांगने जाने की अनुमति देते हैं? और भूल-चूक से यदि कोई बच्चा आ ही जाए आपके द्वार तो आपके घर में न लकड़ी होगी, न खील और न मक्का तो पारंपरिक तौर पर उन्हें देंगे क्या? त्यौहार के नाम पर बस बालीवुड का हो-हल्ला सुनाई देता है! अच्छे भले गीतों का संगीत बदल कर उनका सत्यानाश करके उसे 'रिमिक्स' कह दिया जाता है। कुछ दिन पहले एक परिचित का फोन आया, "13 को आ जाओ! मेरे बेटे की पहली लोहड़ी है!" मैंने अनभिज्ञता जताते हुए पूछ लिया, "इसके बारे में कुछ बताइए कि लोहड़ी क्या है, क्यों मनाई जाती है?"
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तिरंगे का इतिहास - राष्ट्रीय पोर्टल

प्रत्‍येक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र का अपना एक ध्‍वज होता है। यह एक स्‍वतंत्र देश होने का संकेत है। भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज की अभिकल्‍पना पिंगली वैंकैयानन्‍द ने की थी और इसे इसके वर्तमान स्‍वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो 15 अगस्‍त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्‍त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्‍चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ''तिरंगे'' का अर्थ भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज है।
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अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस - डॉ० राधेश्याम द्विवेदी

1991 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र से शुरुआत :- तरह-तरह के दिवस शायद इसीलिए मनाए जाते हैं कि लोग उस दिन किसी ख़ास मुद्दे पर अच्छी-अच्छी बातें करें, आदर्श-नीति-सिद्धांत वग़ैरह पर ज़ोर दिया जाए। अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस (अंग्रेज़ी: World Press Freedom Day) प्रत्येक वर्ष '3 मई को मनाया जाता है। प्रेस किसी भी समाज का आइना होता है। प्रेस की आज़ादी से यह बात साबित होती है कि उस देश में अभिव्यक्ति की कितनी स्वतंत्रता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता एक मौलिक जरूरत है। आज हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ अपनी दुनिया से बाहर निकल कर आसपास घटित होने वाली घटनाओं के बारे में जानने का अधिक वक्त हमारे पास नहीं होता। ऐसे में प्रेस और मीडिया हमारे लिए एक खबर वाहक का काम करती हैं, जो हर सवेरे हमारी टेबल पर गरमा गर्म खबरें परोसती हैं। यही खबरें हमें दुनिया से जोड़े रखती हैं। आज प्रेस दुनिया में खबरें पहुंचाने का सबसे बेहतरीन माध्यम है। शुरुआत 'अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस' मनाने का निर्णय वर्ष 1991 में यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र के 'जन सूचना विभाग' ने मिलकर किया था। इससे पहले नामीबिया में विन्डंहॉक में हुए एक सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया था कि प्रेस की आज़ादी को मुख्य रूप से बहुवाद और जनसंचार की आज़ादी की जरूरत के रूप में देखा जाना चाहिए। तब से हर साल '3 मई' को 'अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वीतंत्रता दिवस' के रूप में मनाया जाता है। प्रेस की आज़ादी 'संयुक्त राष्ट्र महासभा' ने भी '3 मई' को 'अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वातंत्रता' की घोषणा की थी।
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मजबूरी और कमजोरी - नरेन्द्र कोहली

मैं रामलुभाया के घर पहुँचा तो देख कर चकित रह गया कि वह बोतल खोल कर बैठा हुआ था।

"यह क्या रामलुभाया !''  मैंने कहा, "तुम तो मदिरा के बहुत विरोधी थे।'"

"विरोधी तो अब भी हूँ; किंतु क्या करूं । इस वर्ष भी आचार्य ने मुझे पुरस्कार नहीं दिया।"

"तो तुम मदिरा पीने बैठ गए ?''

‘‘गम तो गलत करना ही था।'' वह बोला।

"मिल गया होता तो तुम अपनी विजय का समारोह कर रहे होते; और तब भी मित्रों के साथ बैठ कर पी रहे होते।'' मैंने कहा।

‘‘नहीं ऐसी बात नहीं है।'' वह बोला, ‘‘यह तो मैं पूर्णतः हताश होके कर रहा हूँ। समझ लो कि जीवन में प्रगति के सारे मार्ग बंद हो जाने के कारण विष पीने का साहस नहीं कर सकता तो मदिरा ले कर बैठ गया।''

‘‘साहित्य का पुरस्कार नहीं मिला तो प्रगति के सारे मार्ग ही बंद हो गए ?''

‘‘और क्या। पैंतालीस वर्ष हो गए लिखते और पुरस्कार फिर भी नहीं मिला।'' वह रो दिया, ‘‘ कल के बच्चे भी अपने घर में कई कई पुरस्कार सजाए बैठे हैं।''

‘‘धैर्य रखो। संभव है कि अगले वर्ष मिल जाए।'' मैंने कहा।

‘‘नहीं ! मुझे नहीं मिल सकता।'' वह बोला, ‘‘अगले वर्ष चकोरी को मिलेगा।''

‘‘क्यों चकोरी तुम से अच्छा लिखती है ?''

‘‘नहीं ! किंतु पुरस्कार देने वाले आचार्य की मजबूरी साहित्य नहीं, स्त्री है।''

‘‘ उस से क्या ?'' मैंने कहा।

‘‘और चकोरी की कमजोरी पुरस्कार है।'' रामलुभाया बोला, ‘‘वह पुरस्कार के लिए अपना सौदा कर लेगी।''

‘‘तुम एक भली स्त्री को बदनाम कर रहे हो। कोई स्त्री इस प्रकार का कुत्सित व्यापार नहीं करेगी। ऐसे व्यापार में उस की उपलब्धि क्या है, हानि ही हानि है।'' मैं ने उसे डांट दिया,
‘‘और आचार्य भी पचहत्तर को पार कर गए हैं, उन पर इस प्रकार के आक्षेप उचित नहीं हैं।''

‘‘क्या करें पचहत्तर पार वाले ही यह सब कर रहे हैं।'' वह बोला, ‘‘और चकोरी जैसियों की कोई मर्यादा नहीं है।''

‘‘तो तुम मदिरा पी-पी कर अपना स्वास्थ्य खराब करोगे, पुरस्कार तो तुम्हें तब भी नहीं मिलेगा।'' मैंने कहा।

‘‘तो क्या करूं ? विष खा लूं क्या ?''

‘‘नहीं विष क्यों खाओगे ?'' मैं ने कहा, ‘‘आचार्य की मजबूरी मदिरा नहीं है क्या ?''

‘‘नहीं ! ये तो बिल्कुल शुद्ध संतरे के रस वाले हैं, पर दूसरे संप्रदाय के हैं, जो पेग नहीं भांड के हिसाब से पीते हैं।''
...

 
अतिथि! तुम कब जाओगे  - शरद जोशी | Sharad Joshi

तुम्हारे आने के चौथे दिन, बार-बार यह प्रश्न मेरे मन में उमड़ रहा है, तुम कब जाओगे अतिथि! तुम कब घर से निकलोगे मेरे मेहमान!
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