राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।

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बाल-साहित्य

बाल साहित्य के अन्तर्गत वह शिक्षाप्रद साहित्य आता है जिसका लेखन बच्चों के मानसिक स्तर को ध्यान में रखकर किया गया हो। बाल साहित्य में रोचक शिक्षाप्रद बाल-कहानियाँ, बाल गीत व कविताएँ प्रमुख हैं। हिन्दी साहित्य में बाल साहित्य की परम्परा बहुत समृद्ध है। पंचतंत्र की कथाएँ बाल साहित्य का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। हिंदी बाल-साहित्य लेखन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। पंचतंत्र, हितोपदेश, अमर-कथाएँ व अकबर बीरबल के क़िस्से बच्चों के साहित्य में सम्मिलित हैं। पंचतंत्र की कहानियों में पशु-पक्षियों को माध्यम बनाकर बच्चों को बड़ी शिक्षाप्रद प्रेरणा दी गई है। बाल साहित्य के अंतर्गत बाल कथाएँ, बाल कहानियां व बाल कविता सम्मिलित की गई हैं।

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जैसा सवाल वैसा जवाब - भारत-दर्शन संकलन

बादशाह अकबर अपने मंत्री बीरबल को बहुत पसंद करता था। बीरबल की बुद्धि के आगे बड़े-बड़ों की भी कुछ नहीं चल पाती थी। इसी कारण कुछ दरबारी बीरबल से जलते थे। वे बीरबल को मुसीबत में फँसाने के तरीके सोचते रहते थे।

अकबर के एक खास दरबारी ख्वाजा सरा को अपनी विद्या और बुद्धि पर बहुत अभिमान था। बीरबल को तो वे अपने सामने निरा बालक और मूर्ख समझते थे। लेकिन अपने ही मानने से तो कुछ होता नहीं! दरबार में बीरबल की ही तूती बोलती और ख्वाजा साहब की बात ऐसी लगती थी जैसे नक्कारखाने में तूती की आवाज़। ख्वाजा साहब की चलती तो वे बीरबल को हिंदुस्तान से निकलवा देते लेकिन निकलवाते कैसे!

एक दिन ख्वाजा ने बीरबल को मूर्ख साबित करने के लिए बहतु सोचे -विचार कर कुछ मुश्किल प्रश्न सोच लिए। उन्हें विश्वास था कि बादशाह के उन प्रश्नों को सुनकर बीरबल के छक्के छूट जाएँगे और वह लाख कोशिश करके भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाएगा। फिर बादशाह मान लेगा कि ख्वाजा सरा के आगे बीरबल कुछ नहीं है।

ख्वाजा साहब अचकन-पगड़ी पहनकर दाढ़ी सहलाते हुए अकबर के पास पहुँचे और सिर झुकाकर बोले, "बीरबल बड़ा बुद्धिमान बनता है। आप भी उसकी लंबी-चौड़ी बातों के धोखे में आ जाते हैं। मैं चाहता हूँ कि आप मेरे तीन सवालों के जवाब पूछकर उसके दिमाग की गहराई नाप लें। उस नकली अक्ल-बहादुर की कलई खुल जाएगी।

ख्वाजा के अनुरोध करने पर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उनसे कहा, "बीरबल! परम ज्ञानी ख्वाजा साहब तुमसे तीन प्रश्न पूछना चाहते हैं। क्या तुम उनके उत्तर दे सकोगे?"

बीरबल बोले, "जहाँपनाह! ज़रूर दूँगा। खुशी से पूछें।"

ख्वाजा साहब ने अपने तीनों सवाल लिखकर बादशाह को दे दिए।

अकबर ने बीरबल से ख्वाजा का पहला प्रश्न पूछा, "संसार का केंद्र
कहाँ है?"

बीरबल ने तुरंत ज़मीन पर अपनी छड़ी गाड़कर उत्तर दिया, "यही स्थान चारों ओर से दुनिया के बीचों-बीच पड़ता है। यदि ख्वाजा साहब को विश्वास न हो तो वे फ़ीते से सारी दुनिया को नापकर दिखा दें कि मेरी बात गलत है।"

अकबर ने दूसरा प्रश्न किया, "आकाश में कितने तारे हैं?"

बीरबल ने एक भेड़ मँगवाकर कहा, "इस भेड़ के शरीर में जितने बाल हैं, उतने ही तारे आसमान में हैं। ख्वाजा साहब को इसमें संदेह हो तो वे बालों को
गिनकर तारों की संख्या से तुलना कर लें।"

अब अकबर ने तीसरा सवाल किया, "संसार की आबादी कितनी है?"

बीरबल ने कहा, "जहाँपनाह! संसार की आबादी पल-पल पर घटती-बढ़ती रहती है क्योंकि हर पल लोगों का मरना-जीना लगा ही रहता है। इसलिए यदि
सभी लोगों को एक जगह इकट्ठा किया जाए तभी उनको गिनकर ठीक-ठीक संख्या बताई जा सकती है।"

बादशाह तो बीरबल के उत्तरों से संतुष्ट हो गया लेकिन ख्वाजा साहब नाक-भाैंह सिकोड़कर बोले, "ऐसे गोलमोल जवाबों से काम नहीं चलेगा जनाब!"

बीरबल बोले, "ऐसे सवालों के ऐसे ही जवाब होते हैं। पहले मेरे जवाबों को गलत साबित कीजिए, तब आगे बढ़िए।"

ख्वाजा साहब से फिर कुछ बोलते नहीं बना।

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दो घड़े  - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

एक घड़ा मिट्टी का बना था, दूसरा पीतल का। दोनों नदी के किनारे रखे थे। इसी समय नदी में बाढ़ आ गई, बहाव में दोनों घड़े बहते चले। बहुत समय मिट्टी के घड़े ने अपने को पीतलवाले से काफी फासले पर रखना चाहा।

पीतलवाले घड़े ने कहा, ''तुम डरो नहीं दोस्त, मैं तुम्हें धक्के न लगाऊँगा।''

मिट्टीवाले ने जवाब दिया, ''तुम जान-बूझकर मुझे धक्के न लगाओगे, सही है; मगर बहाव की वजह से हम दोनों जरूर टकराएंगे। अगर ऐसा हुआ तो तुम्हारे बचाने पर भी मैं तुम्हारे धक्कों से न बच सकूँगा और मेरे टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। इसलिए अच्छा है कि हम दोनों अलग-अलग रहें।''

शिक्षा - जिससे तुम्हारा नुकसान हो रहा हो, उससे अलग ही रहना अच्छा है, चाहे वह उस समय के लिए तुम्हारा दोस्त भी क्यों न हो।

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ज्ञान पहेलियां - मुकेश नादान 'निरूपमा'

1

रात को नभ मे चमका करता जैसे चाँदी की इक थाली
चोर  उच्चके  लूट  न  पावें  लौटे  हरदम  खाली

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आओ महीनो आओ घर | बाल कविता - दिविक रमेश

अपनी अपनी ले सौगातें
आओ महीनों आओ घर।
दूर दूर से मत ललचाओ
आओ महीनों आओ घर।

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खेल महीनों का | बाल कविता - दिविक रमेश

अच्छी लगती हमें जनवरी
नया वर्ष लेकर है आती।
ज़रा बताओ हमें फरवरी
कैसे इतने फूल खिलाती।

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शतरंज का जादू - गुणाकर मुले

‘शतरंज के खेल के नियमों को आप न भी जानते हों तो कम से कम इतना तो सभी जानते हैं कि शतरंज चौरस पटल पर खेला जाता है । इस पटल पर ६४ छोटे-छोटे चौकोण होते हैं।
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बीरबल की पैनी दृष्टि - अकबर बीरबल के किस्से

बीरबल बहुत नेक दिल इंसान थे। वह सैदव दान करते रहते थे और इतना ही नहीं, बादशाह से मिलने वाले इनाम को भी ज्यादातर गरीबों और दीन-दुःखियों में बांट देते थे, परन्तु इसके बावजूद भी उनके पास धन की कोई कमी न थी। दान देने के साथ-साथ बीरबल इस बात से भी चौकन्ने रहते थे कि कपटी व्यक्ति उन्हें अपनी दीनता दिखाकर ठग न लें।
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चारों मूर्ख हाजिर हैं | अकबर बीरबल के किस्से  - अकबर बीरबल के किस्से

एक दिन बादशाह अकबर ने बीरबल को आदेश दिया, "चार ऐसे मूर्ख ढूंढकर लाओ जो एक से बढ़कर एक हों। यह काम कोई कठिन नहीं है क्योंकि हमारा राज्य तो क्या, पूरी दुनिया मूर्खों से भरी पड़ी है।"
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कोयल - सुभद्रा कुमारी

देखो कोयल काली है, पर मीठी है इसकी बोली!
इसने ही तो कूक-कूक कर आमों में मिसरी घोली॥
यही आम जो अभी लगे थे, खट्टे-खट्टे, हरे-हरे।
कोयल कूकेगी तब होंगे, पीले और रस भरे-भरे॥
हमें देखकर टपक पड़ेंगे, हम खुश होकर खाएंगे।
ऊपर कोयल गायेगी, हम नीचे उसे बुलाएंगे॥

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सुखी आदमी की कमीज़  - जॉन हे

क बार एक राजा था। उसके पास सब कुछ था लेकिन वह सुखी नहीं था। वह समझ नहीं पाता था कि कैसे ख़ुश रहा जाए? उसे यह लगने लगा कि वह बीमार है जबकि वह बिलकुल स्वस्थ दिखता था।

राजा के आदेश पर राज्य के एक से एक अच्छे डॉक्टरों को बुलाया गया लेकिन कोई भी उसका इलाज नहीं कर पाया।

अंत में एक बुद्धिमान वैद्य ने राजा की मर्ज समझ ली। उसे एक युक्ति सूझी उसने कहा, "यदि महाराज एक रात्रि के लिए किसी ख़ुश व्यक्ति कि कमीज़ पहन कर सोएं तो इनकी बीमारी दूर हो सकती है।

सैनिकों को राज्य भर में किसी ख़ुश आदमी को खोजने और उसकी कमीज़ लाने का आदेश दिया गया। पूरे राज्य में खोजने पर भी कोई ख़ुश व्यक्ति खोजा नहीं जा सका।

किसी को अपनी निर्धनता का दुःख था तो कोई धनवान और धन की लालसा पाले हुआ था। किसी को दुःख था कि उसकी पत्नी का निधन हो गया था, तो किसी को शिकायत थी कि उसकी पत्नी जीवित क्यों है! किसी को संतान न होने का दुःख था तो कोई संतान से दुःखी था । वस्तुतः सब जन दुःखी थे। कहते भी हैं, ‘नानक दुखिया सब संसार'।

तभी सैनिकों को गाँव के दवार पर एक भिखारी मदमस्त लेटा हुआ दिखाई पड़ा जो अपनी मस्ती में सीटी बजा-बजा कर, हँस-हँसकर गाना गाता हुआ लोटपोट हुए जाता था। वह अत्यधिक प्रसन्नचित्त जान पड़ता था।

सैनिक उसके पास रुकते हुए उसका अभिवादन कर उससे कहा, "ईश्वर आपका भला करे। आप काफी प्रसन्न दिखाई देते हैं।

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