राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।

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कविताएं

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नववर्ष - सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi

स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, नूतन-निर्माण लिये,
इस महा जागरण के युग में
जाग्रत जीवन अभिमान लिये;

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कभी कभी खुद से बात करो | कवि प्रदीप की कविता - भारत-दर्शन संकलन | Collections

कभी कभी खुद से बात करो, कभी खुद से बोलो ।
अपनी नज़र में तुम क्या हो? ये मन की तराजू पर तोलो ।
कभी कभी खुद से बात करो ।
कभी कभी खुद से बोलो ।

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साथी, नया वर्ष आया है! - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan

साथी, नया वर्ष आया है!
वर्ष पुराना, ले, अब जाता,
कुछ प्रसन्न सा, कुछ पछताता,
दे जी-भर आशीष, बहुत ही इससे तूने दुख पाया है!
साथी, नया वर्ष आया है!
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नया वर्ष  - शास्त्री नित्यगोपाल कटारे

नया वर्ष कुछ ऐसा हो पिछले बरस न जैसा हो
घी में उँगली मुँह में शक्कर पास पर्स में पैसा हो ।

भूल जाएँ सब कड़वी बातें पाएँ नई नई सौगातें
नहीं काटना पड़ें वर्ष में बिन बिजली गर्मी की रातें ।
कोई घपला और घुटाला काण्ड न ऐसा-वैसा हो ।।
नया वर्ष कुछ ऐसा हो...

बच्चे खुश हों खेलें खायें रोज सभी विद्यालय जायें
पढ़ें लिखें शुभ आदत सीखें करें शरारत मौज मनायें
नहीं किसी के भी गड्ढ़े में गिरने का अंदेशा हो ।।
नया वर्ष कुछ ऐसा हो...

युवा न भटकें गलियाँ-गलियाँ मिल जाएँ सबको नौकरियाँ
राहू केतु शुभ हो जाएँ मिल जाएँ सबकी कुण्डलियाँ
लड़की ऐश्वर्या-सी लड़का अभिषेक बच्चन जैसा हो ।।
नया वर्ष कुछ ऐसा हो...

स्वस्थ रहें सब वृद्ध सयाने बच्चे उनका कहना मानें
सेवा में तत्पर हो जाएँ आफिस कोर्ट कचहरी थाने
डेंगू और चिकनगुनियाँ का अब प्रतिबन्ध हमेशा हो
नया वर्ष कुछ ऐसा हो...

नए वर्ष में नूतन नारे बना सकें नेता बेचारे
गाली बकलें कोई किसी को पर जूते चप्पल न मारे
नहीं विश्व में अन्त किसी का बेनजीर के जैसा हो ।
नया वर्ष कुछ ऐसा हो...

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एक भी आँसू न कर बेकार - रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi

एक भी आँसू न कर बेकार -
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!
पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है,
यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है,
और जिस के पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है,
कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार
जाने देवता को कौनसा भा जाए!
...

 
कब लोगे अवतार हमारी धरती पर - रोहित कुमार 'हैप्पी'

फैला है अंधकार हमारी धरती पर
हर जन है लाचार हमारी धरती पर
हे देव! धरा है पूछ रही...
कब लोगे अवतार हमारी धरती पर !

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नये बरस में  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

नये बरस में कोई बात नयी चल कर लें
तुम ने प्रेम की लिखी है कथायें तो बहुत
किसी बेबस के दिल की 'आह' जाके चल सुन लें
तू अगर साथ चले जाके उसका ग़म हर लें
नये बरस में कोई बात नयी चल कर लें.....

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कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती - सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

नन्ही चींटीं जब दाना ले कर चढ़ती है
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगॊं मे साहस भरता है
चढ़ कर गिरना, गिर कर चढ़ना न अखरता है
मेहनत उसकी बेकार नहीं हर बार होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

डुबकियाँ सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा-जा कर खाली हाथ लौट कर आता है
मिलते न सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दूना विश्वास इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो नींद-चैन को त्यागो तुम
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किए बिना ही जय-जयकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

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हिन्दी के सुमनों के प्रति पत्र  - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

मैं जीर्ण-साज बहु छिद्र आज,
तुम सुदल सुरंग सुवास सुमन,
मैं हूँ केवल पतदल-आसन,
तुम सहज बिराजे महाराज।
...

 
नव वर्ष  - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan

नव वर्ष
हर्ष नव
जीवन उत्कर्ष नव।
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माँ | सुशांत सुप्रिय की कविता - सुशांत सुप्रिय

इस धरती पर
अपने शहर में मैं
एक उपेक्षित उपन्यास के बीच में
एक छोटे-से शब्द-सा आया था

वह उपन्यास
एक ऊँचा पहाड़ था
मैं जिसकी तलहटी में बसा
एक छोटा-सा गाँव था

वह उपन्यास
एक लंबी नदी था
मैं जिसके बीच में स्थित
एक सिमटा हुआ द्वीप था

वह उपन्यास
पूजा के समय बजता हुआ
एक ओजस्वी शंख था
मैं जिसकी ध्वनि-तरंग का
हज़ारवाँ हिस्सा था

हालाँकि वह उपन्यास
विधाता की लेखनी से उपजी
एक सशक्त रचना थी
आलोचकों ने उसे
कभी नहीं सराहा
जीवन के इतिहास में
उसका उल्लेख तक नहीं हुआ

आख़िर क्या वजह है कि
हम और आप
जिन महान् उपन्यासों के
शब्द बनकर
इस धरती पर आए
उन उपन्यासों को
कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला ?
...

 
लौटना | सुशांत सुप्रिय की कविता - सुशांत सुप्रिय

बरसों बाद लौटा हूँ
अपने बचपन के स्कूल में
जहाँ बरसों पुराने किसी क्लास-रूम में से
झाँक रहा है
स्कूल-बैग उठाए
एक जाना-पहचाना बच्चा
...

 
उर्मिला - राजेश्वर वशिष्ठ

टिमटिमाते दियों से
जगमगा रही है अयोध्या
सरयू में हो रहा है दीप-दान
संगीत और नृत्य के सम्मोहन में हैं
सारे नगरवासी
हर तरफ जयघोष है ----
अयोध्या में लौट आए हैं राम!
अंधेरे में डूबा है उर्मिला का कक्ष
अंधेरा जो पिछले चौदह वर्षों से
रच बस गया है उसकी आत्मा में
जैसे मंदिर के गर्भ-गृह में
जमता चला जाता है सुरमई धुँआ
और धीमा होता जाता है प्रकाश!
वह किसी मनस्विनी-सी उदास
ताक रही हैं शून्य में
सोचते हुए --- राम और सीता के साथ
अवश्य ही लौट आए होंगे लक्ष्मण
पर उनके लिए उर्मिला से अधिक महत्वपूर्ण है
अपने भ्रातृधर्म का अनुशीलन
उन्हें अब भी तो लगता होगा ----
हमारे समाज में स्त्रियाँ ही तो बनती हैं
धर्मध्वज की यात्रा में अवांछित रुकावट ---
सोच कर सिसक उठती है उर्मिला
चुपके से काजल के साथ बह जाती है नींद
जो अब तक उसके साथ रह रही थी सहचरी-सी!
अतीत घूमता है किसी चलचित्र-सा
गाल से होकर टपकते आँसुओं में
बहने लगते हैं कितने ही बिम्ब!

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जो दीप बुझ गए हैं - दुष्यंत कुमार

जो दीप बुझ गए हैं
उनका दु:ख सहना क्या,
जो दीप, जलाओगे तुम
उनका कहना क्या,

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नया साल आए - दुष्यंत कुमार

नया साल आए, नया दर्द आए ।
मैं डरता नहीं हूँ, हवा सर्द आए,

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वर्ष नया - अजित कुमार

कुछ देर अजब पानी बरसा ।
बिजली तड़पी, कौंधा लपका ।
फिर घुटा-घुटा सा,
घिरा-घिरा
हो गया गगन का उत्तर-पूरब तरफ़ सिरा ।

...

 
शुभकामनाएँ - कुमार विकल

मैं भेजना चाहता हूँ
नए वर्ष की शुभकामनाएँ
दिसंबर की उजली धूप की
बची-खुची सद्भावनाएँ
किंतु कौन स्वीकार करेगा
मेरे उदास मन की भावनाएँ
क्योंकि मेरे प्रियजन जानते हैं
आजकल
मैं निराश मन हूँ
हताश तन हूँ।

...

 
भारतेन्दु की मुकरियां - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra

सब गुरुजन को बुरो बतावै ।
अपनी खिचड़ी अलग पकावै ।।
भीतर तत्व न झूठी तेजी ।
क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेजी ।।

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शुभेच्छा - लक्ष्मीनारायण मिश्र

न इच्छा स्वर्ग जाने की नहीं रुपये कमाने की ।
नहीं है मौज करने की नहीं है नाम पाने की ।।

नहीं महलों में रहने की नहीं मोटर पै चलने की ।
नहीं है कर मिलाने की नहीं मिस्टर कहाने की ।।

न डिंग्री हाथ करने की, नहीं दासत्व पाने की ।
नहीं जंगल में जाकर ईश धूनी ही रमाने की ।।

फ़क़त इच्छा है ऐ माता! तेरी शुभ भक्ति करने की ।
तेरा ही नाम धरने की तेरा ही ध्यान करने की ।।

तेरे ही पैर पड़ने की तेरी आरत भगाने की ।
करोड़ों कष्ट भी सह कर शरण तव मातु आने की ।।

नहीं निज बंधुओ को अन्य टापू में पठाने की ।
नहीं निज पूर्वजों की कीर्ति को दाग़ी कराने की ।।

चाहे जिस भांति हो माता सुखद निज-राज्य पाने की ।
मरण उपरान्त भी माता! पुन: तव गोद आने की ।।
...

 
नारी के उद्गार - सुदर्शन | Sudershan

'माँ' जय मुझको कहा पुरुष ने, तु्च्छ हो गये देव सभी ।
इतना आदर, इतनी महिमा, इतनी श्रद्धा कहाँ कमी?
उमड़ा स्नेह-सिन्धु अन्तर में, डूब गयी आसक्ति अपार । 
देह, गेह, अपमान, क्लेश, छि:! विजयी मेरा शाश्वत प्यार ।।

'बहिन !' पुरुष ने मुझे पुकारा, कितनी ममता ! कितना नेह !
'मेरा भैया' पुलकित अन्तर, एक प्राण हम, हों दो देह ।
कमलनयन अंगार उगलते हैं, यदि लक्षित हो अपमान ।
दीर्ध भुजाओं में भाई की है रक्षित मेरा सम्मान ।।

'बेटी' कहकर मुझे पुरुष ने दिया स्नेह, अन्तर-सर्वस्व ।
मेरा सुख, मेरी सुविधा की चिन्ता-उसके सब सुख ह्रस्व ।।
अपने को भी विक्रय करके मुझे देख पायें निर्बाध ।
मेरे पूज्य पिताकी होती एकमात्र यह जीवन-साध ।।

'प्रिये !' पुरुष अर्धांग दे चुका, लेकर के हाथों में हाथ ।
यहीं नहीं-उस सर्वेश्वर के निकट हमारा शाश्वत साथ ।।
तन-मन-जीवन एक हो गये, मेरा घर-उसका संसार ।
दोनों ही उत्सर्ग परस्पर, दोनों पर दोनों का मार ।।

'पण्या!' आज दस्यु कहता है ! पुरुष हो गया हाय पिशाच ! 
मैं अरक्षिता, दलिता, तप्ता, नंगा पाशवता का नाच !!
धर्म और लज्जा लुटती है ! मैं अबला हूँ कातर, दीन !
पुत्र ! पिता !  भाई ! स्वामी ! सब तुम क्या इसने पौरुषहीन?
...

 
जयरामजी की  - प्रदीप मिश्र

जयरामजी की


सुना जयरामजी की
और कान में जमा हुआ बर्फ़
हृदय की सूखती हुई नदी में
पिघलकर बहने लगा

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भिक्षुक | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

वह आता -
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।

...

 
तोड़ती पत्थर | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'


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यह कवि अपराजेय निराला  - राम विलास शर्मा

यह कवि अपराजेय निराला,
जिसको मिला गरल का प्याला;
ढहा और तन टूट चुका है,
पर जिसका माथा न झुका है;
शिथिल त्वचा ढल-ढल है छाती,
लेकिन अभी संभाले थाती,
और उठाए विजय पताका-
यह कवि है अपनी जनता का!

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एक बरस बीत गया | कविता - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee

एक बरस बीत गया
झुलसाता जेठ मास
शरद चाँदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
...

 
परिंदे की बेज़ुबानी - डॉ शम्भुनाथ तिवारी

बड़ी ग़मनाक दिल छूती परिंदे की कहानी है!
...

 

 

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