जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।
नाच रहा जंगल में मोर | बाल कविता (बाल-साहित्य )  Click to print this content  
Author:पुरुषोत्तम तिवारी

हरा सुनहरा नीला काला रंग बिरंगे बूटे वाला
चमक रहा है कितना चमचम इसका सुन्दर पंख निराला
लंबी पूंछ मुकुट धर सिर पर भीमाकार देह अति सुन्दर
कितनी प्यारी छवि वाले ये इन पर मोहित सब नारी नर

वर्षा ऋतु की जलद गर्जना सुनकर होकर भाव विभोर
नाच रहा जंगल में मोर बच्चों तुम मत करना शोर

सुनकर यह आवाज तुम्हारी तुम्हें देखकर डर जाएगा
अपने प्राणों की रक्षा में कहीं दूर यह भग जाएगा
फिर कैसे तुम देख सकोगे मनमोहक यह नृत्य मोर का
देखो कैसे देख रहा है दृश्य घूमकर सभी ओर का

नृत्य कर रहा कितना सुन्दर अपने पंखों को झकझोर
नाच रहा जंगल में मोर बच्चों तुम मत करना शोर

निर्जन शांत दूर जंगल में ये विचरण करते रहते हैं
मोर झुण्ड में एक साथ सब जंगल में उड़ते रहते हैं
पाकर मौसम मधुर सुहाना कोलाहल करने लगते हैं
अति उल्लास भरे उपवन में सुखद नृत्य करने लगते हैं

कोई भी हो समय दोपहर या हो फिर संध्या या भोर
नाच रहा जंगल में मोर बच्चों तुम मत करना शोर

मोरपंख की सुंदरता पर आकर्षित इतना मनभाया
बालकृष्ण ने इसको लेकर अपने सिर का मुकुट सजाया
इन्हें देखने से लगता है इनको लेकर पास दुलारें
कितना अच्छा हो आ जाएँ जब भी हम सब इन्हें पुकारें

ये भारत के पक्षी हमको बाँध लिए हैं प्रेम की डोर
नाच रहा जंगल में मोर बच्चों तुम मत करना शोर

- पुरुषोत्तम तिवारी "साहित्यार्थी"
भोपाल - मध्य प्रदेश भारत
ई-मेल: ptsahityarthi@rediffmail.com

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