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होली का रंग  (बाल-साहित्य ) 
   
Author:कल्पनाथ सिंह

बहुत पुरानी बात है। उन दिनों धरती पर चारों तरफ हरे भरे जंगल ही जंगल थे। उन्हीं जंगलों के बीच-बीच में बाकी दूरी पर इक्का दुक्का गांव बसे हुए थे। तब न तो बड़े-बड़े शहर थे, न कस्बे। केवल छोटे-छोटे गाँवों में लोग रहते थे। लोगों में आपस में बहुत ही मेल मिलाप रहता था। कोई भी त्योहार आता तो गांव भर के छोटे-बड़े सब लोग मिलजुल कर अपना त्योहार घूमधाम से मनाते थे।

होली का त्योहार नजदीक आते ही जंगल का जंगल होली के रंग में रंग जाता था। लाल-लाल टेसू फूल उठते थे। आम बौरों से लदर-बदर हो उठते थे। सारी लता वल्लरियां फूलों से भर उठती थीं। इधर जंगल के सारे पेड़-पौधे होली के रंग मे रंग जाते थे तो इधर उन जंगलों के बीच में बसे गाँवों में लोग भी होली के दिन रंग -गुलाल से सराबोर हो उठते थे।

जंगल के पेड़ पौधों और उन जंगलों के बीच बसे गाँवों के लोगों का होली खेलना देखकर एक बार सारे जंगल के पशु-पक्षी भी आपस में सलाह करते कि हम लोग भी इस साल रंगों की होली खेलेंगे। सारे जंगल के पशु-पक्षी यह प्रस्ताव लेकर जंगल के राजा शेर सिंह के पास पहुंचे। शेर सिंह जंगल में होली मनाने की बात सुनकर फूले नहीं समाये। वह तो पहले से ही चाहते थे कि जंगल के पशु-पक्षी भी आदमियों की तरह धूम-धाम से होली का त्योहार मनाते तो कितना अच्छा होता। जंगल के पशु-पक्षिओं का प्रस्ताव सुनकर तो वे और भी मगन हो गये।

जंगल के राजा शेर सिंह पक्षियों को इस साल धूम-धाम से होली मनाने के लिए कहकर स्वयं भी होली मनाने की तैयारी करने लगे। सारे पशु-पक्षी जंगल के पेड़-पौधों के फूल और पत्तियों से रंग तैयार करने लगें पशुओं में इस साल होड लग गई कि किस का रंग सबसे बढ़िया होता है। उधर पक्षीगण अलग अपना-अपना रंग तैयार करने में लग गये।

धीरे-धीरे करके होली का त्योहार आ गया। भालू दादा अपनी टोली लेकर नाचते-गाते आ गये। बन्दर दादा अपनी टोली लेकर उछलते-कूदते आ गये। लोमड़ी, सियार, लक्कड़बग्गा, खरगोश आदि भी अपनी-अपनी टोली लेकर सुबह से ही बीच जंगल में जुट गये। उधर बूढ़े बरगद पर सारे पक्षी रंग-बिरंगा रंग लिये पंख फड़फड़ा कर नाचते-गाते इकट्ठा हो गये। सारे पशु-पक्षी अपनी-अपनी धुन मे नाच-गा रहे थे कि इतने में जंगल के राजा शेर सिंह भी आ गये। पशु पक्षियों की मस्ती भरी होली से सारा जंगल गूंज उठा। शेर सिंह के आते ही रंगों की होली शुरू हो गयी।

किसी ने भालू दादा पर एक भरी बाल्टी काला रंग उड़ेल दिया। बन्दर ने लंगूर के मुंह पर काला रंग लगा दिया। लंगूर ने देशी बन्दर के मुंह पर लाल रंग पोत दिया। किसी ने बाघ दादा और हिरन पर कत्थई रंग फेंक दिया।

इस तरह सुबह से शाम तक लोग रंग खेलते रहे। दिन डूबने के बाद जगल की होली खत्म हुई। दूसरे दिन भालू दादा रंग छुड़ाने लगे तो उनका रंग नहीं छूटा। लंगूर के मुंह का काला रंग नहीं छूटा। तथा देशी बन्दर के मुंह का लाल रंग नहीं छूटा। इसी तरह लाख कोशिश के बाद भी बाघ दादा तथा हिरन भझ्या का रंग पूरा नहीं छूटा और वे चितकबरा हो गये।

इतने पक्के रंग से होली खेलने की शिकायत लेकर लोग जंगल के राजा शेर सिंह के पास पहुंचे तो शेर सिंह ने सारे जंगल के पशु-पक्षियों से कहा कि अब जब तक पिछले साल की होली का लगा हुआ रंग नहीं छूट जाता तब तक जंगल में होली तो होगी लेकिन किसी पर कोई रंग नहीं डालेगा।
तभी से भालू दादा का रंग लाल, लंगूर का मुंह काला, देशी बंदर का मुंह लाल, हिरन और बाघ का रंग चितकबरा बना हुआ है और अभी उनका रंग नहीं छूट पाया। इसीलिये आज भी होली पर जंगल के जानवर किसी पर रंग नहीं डालते है और जब तक उन लोगों का रंग छूट नहीं जायेगा तब तक जंगल में होली पर रंग नहीं डाला जायेगा।

-कल्पनाथ सिंह
 श्री नगर, देवा रोड़, बाराबंकी (उ.प्र.)
 [सौ श्रेष्ठ बाल कहानियाँ, संपादक रोहितश्वर अस्थाना, गोल्ड बुक्स, गाजियाबाद]

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