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कृष्णा सोबती

डार से बिछुड़ी, ज़िंदगीनामा, ए लड़की, मित्रो मरजानी, हमहशमत 

कृष्णा सोबती का जन्म 18 फरवरी, 1925, पंजाब के शहर गुजरात में (जो अब पाकिस्तान में है) हुआ। पचास के दशक से आपने लेखन आरम्भ किया और आपकी पहली कहानी, 'लामा' 1950  में प्रकाशित हुई। आप मुख्यत: उपन्यास, कहानी, संस्मरण विधाओं में लिखती हैं।

'डार से बिछुड़ी, ज़िंदगीनामा, ए लड़की, मित्रो मरजानी, हमहशमत ' आपकी मुख्यकृतियाँ हैं।

आप विभिन्न सम्मानों जिनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य शिरोमणि सम्मान, शलाका सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, साहित्य कला परिषद पुरस्कार, कथा चूड़ामणि पुरस्कार, महत्तर सदस्य, साहित्य अकादमी से सम्मानित कि जा चुकीं हैं।

 



 

 

 

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मेरी माँ कहाँ

दिन के बाद उसने चाँद-सितारे देखे हैं। अब तक वह कहाँ था? नीचे, नीचे, शायद बहुत नीचे...जहाँ की खाई इनसान के खून से भर गई थी। जहाँ उसके हाथ की सफाई बेशुमार गोलियों की बौछार कर रही थी। लेकिन, लेकिन वह नीचे न था। वह तो अपने नए वतन की आज़ादी के लिए लड़ रहा था। वतन के आगे कोई सवाल नहीं, अपना कोई खयाल नहीं! तो चार दिन से वह कहाँ था? कहाँ नहीं था वह? गुजराँवाला, वजीराबाद, लाहौर! वह और मीलों चीरती हुई ट्रक। कितना घूमा है वह?  यह सब किसके लिए? वतन के लिए, क़ौम के लिए और...? और अपने लिए! नहीं, उसे अपने से इतनी मुहब्बत नहीं! क्या लंबी सड़क पर खड़े-खड़े यूनस खाँ दूर-दूर गाँव में आग की लपटें देख रहा है?  चीख़ों की आवाज उसके लिए नई नहीं। आग लगने पर चिल्लाने में कोई नयापन नहीं। उसने आग देखी है। आग में जलते बच्चे देखे हैं, औरतें और मर्द देखे हैं। रात-रात भर जल कर सुबह ख़ाक हो गए मुहल्लों में जले लोग देखे हैं! वह देख कर घबराता थोड़े ही है? घबराए क्यों? आज़ादी बिना खून के नहीं मिलती, क्रांति बिना खून के नहीं आती, और, और, इसी क्रांति से तो उसका नन्हा-सा मुल्क पैदा हुआ है ! ठीक है। रात-दिन सब एक हो गए। उसकी आँखें उनींदी हैं, लेकिन उसे तो लाहौर पहुँचना है। बिलकुल ठीक मौके पर। एक भी काफ़िर ज़िंदा न रहने पाए। इस हलकी-हलकी सर्द रात में भी 'काफ़िर' की बात सोच कर बलोच जवान की आँखें खून मारने लगीं। अचानक जैसे टूटा हुआ क्रम फिर जुड़ गया है। ट्रक फिर चल पड़ी है। तेज रफ्तार से।

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