भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है। - लक्ष्मीनारायण 'सुधांशु'।

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काव्य

 
 
जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।
 
Literature Under This Category
 
अब तो हरि नाम लौ लागी | मीरा के पद  - मीराबाई | Meerabai

 
साजन! होली आई है!  - फणीश्वरनाथ रेणु | Phanishwar Nath 'Renu'
साजन! होली आई है!
सुख से हँसना
जी भर गाना
मस्ती से मन को बहलाना
पर्व हो गया आज-
साजन ! होली आई है!
हँसाने हमको आई है!

साजन! होली आई है!
इसी बहाने
क्षण भर गा लें
दुखमय जीवन को बहला लें
ले मस्ती की आग-
साजन! होली आई है!
जलाने जग को आई है!

साजन! होली आई है!
रंग उड़ाती
मधु बरसाती
कण-कण में यौवन बिखराती,
ऋतु वसंत का राज-
लेकर होली आई है!
जिलाने हमको आई है!

साजन ! होली आई है!
खूनी और बर्बर
लड़कर-मरकर-
मधकर नर-शोणित का सागर
पा न सका है आज-
सुधा वह हमने पाई है !
साजन! होली आई है!

साजन ! होली आई है !
यौवन की जय !
जीवन की लय!
गूँज रहा है मोहक मधुमय
उड़ते रंग-गुलाल
मस्ती जग में छाई है
साजन! होली आई है!

 
बापू  - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
संसार पूजता जिन्हें तिलक,
रोली, फूलों के हारों से,
मैं उन्हें पूजता आया हूँ
बापू ! अब तक अंगारों से।

अंगार, विभूषण यह उनका
विद्युत पीकर जो आते हैं,
ऊँघती शिखाओं की लौ में
चेतना नयी भर जाते हैं।

उनका किरीट, जो कुहा-भंग
करके प्रचण्ड हुंकारों से,
रोशनी छिटकती है जग में
जिनके शोणित की धारों से।

झेलते वह्नि के वारों को
जो तेजस्वी बन वह्नि प्रखर,
सहते ही नहीं, दिया करते
विष का प्रचण्ड विष से उत्तर।

अंगार हार उनका, जिनकी
सुन हाँक समय रुक जाता है,
आदेश जिधर का देते हैं,
इतिहास उधर झुक जाता है।

 
संत दादू दयाल के पद  - संत दादू दयाल | Sant Dadu Dayal

पूजे पाहन पानी

 
अर्जुन की प्रतिज्ञा  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
उस काल मारे क्रोध के तन कांपने उसका लगा,
मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा।
मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ,
प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ?

युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से,
अब रोष के मारे हुए, वे दहकते अंगार-से ।
निश्चय अरुणिमा-मित्त अनल की जल उठी वह ज्वाल सी,
तब तो दृगों का जल गया शोकाश्रु जल तत्काल ही।

साक्षी रहे संसार करता हूँ प्रतिज्ञा पार्थ मैं,
पूरा करुंगा कार्य सब कथानुसार यथार्थ मैं।
जो एक बालक को कपट से मार हँसते हैँ अभी,
वे शत्रु सत्वर शोक-सागर-मग्न दीखेंगे सभी।

अभिमन्यु-धन के निधन से कारण हुआ जो मूल है,
इससे हमारे हत हृदय को, हो रहा जो शूल है,
उस खल जयद्रथ को जगत में मृत्यु ही अब सार है,
उन्मुक्त बस उसके लिये रौ'र'व नरक का द्वार है।

उपयुक्त उस खल को न यद्यपि मृत्यु का भी दंड है,
पर मृत्यु से बढ़कर न जग में दण्ड और प्रचंड है ।
अतएव कल उस नीच को रण-मध्य जो मारूँ न मैं,
तो सत्य कहता हूँ कभी शस्त्रास्त्र फिर धारूँ न मैं।

अथवा अधिक कहना वृथा है, पार्थ का प्रण है यही,
साक्षी रहे सुन ये वचन रवि, शशि, अनल, अंबर, मही।
सूर्यास्त से पहले न जो मैं कल जयद्रथ-वध करूँ,
तो शपथ करता हूँ स्वयं मैं ही अनल में जल मरूँ।

 
गुणगान  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt

 
कलम, आज उनकी जय बोल | कविता  - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
जो अगणित लघु दीप हमारे,
तूफ़ानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन,
मांगा नहीं स्नेह मुँह खोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।

पीकर जिनकी लाल शिखाएं,
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी,
धरती रही अभी तक डोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।

अंधा चकाचौंध का मारा,
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के,
सूर्य, चन्द्र, भूगोल, खगोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।

 
वीर | कविता  - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar

 
जो तुम आ जाते एक बार | कविता  - महादेवी वर्मा | Mahadevi Verma
कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग
आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

 
अधिकार | कविता  - महादेवी वर्मा | Mahadevi Verma

वे मुस्काते फूल, नहीं 
जिनको आता है मुर्झाना,
वे तारों के दीप, नहीं 
जिनको भाता है बुझ जाना।

वे नीलम के मेघ, नहीं 
जिनको है घुल जाने की चाह,
वह अनन्त रितुराज, नहीं 
जिसने देखी जाने की राह।

 
मैं नीर भरी दुःख की बदली | कविता  - महादेवी वर्मा | Mahadevi Verma

मैं नीर भरी दुःख की बदली,
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनो में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झनी मचली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वांसों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

मैं क्षितिज भृकुटी पर घिर धूमिल,
चिंता का भर बनी अविरल,
रज कण पर जल कण हो बरसी,
नव जीवन अंकुर बन निकली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

पथ न मलिन करते आना
पद चिन्ह न दे जाते आना
सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिहरन हो अंत खिली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना
परिचय इतना इतिहास यही
उमटी कल थी मिट आज चली !
मैं नीर भरी दुःख की बदली !

 

 
जलियाँवाला बाग में बसंत  - सुभद्रा कुमारी
यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

 
आखिर पाया तो क्या पाया?  - हरिशंकर परसाई | Harishankar Parsai
जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा
औरों के स्वर में स्वर भर कर
अब तक गाया तो क्या गाया?

सब लुटा विश्व को रंक हुआ
रीता तब मेरा अंक हुआ
दाता से फिर याचक बनकर
कण-कण पाया तो क्या पाया?

जिस ओर उठी अंगुली जग की
उस ओर मुड़ी गति भी पग की
जग के अंचल से बंधा हुआ
खिंचता आया तो क्या आया?

जो वर्तमान ने उगल दिया
उसको भविष्य ने निगल लिया
है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु
जूठन खाया तो क्या खाया?

 
कबीर दोहे -2  - कबीरदास | Kabirdas
(21)
लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥

 
रहीम के दोहे  - रहीम
(1)

 
रहीम के दोहे - 2  - रहीम
(21)

 
काका हाथरसी का हास्य काव्य  - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार

 
वंदन कर भारत माता का | काका हाथरसी की हास्य कविता  - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
वंदन कर भारत माता का, गणतंत्र राज्य की बोलो जय ।
काका का दर्शन प्राप्त करो, सब पाप-ताप हो जाए क्षय ॥

 
हास्य दोहे | काका हाथरसी  - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
अँग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज,
ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अँगरेज

 
खिलौनेवाला  - सुभद्रा कुमारी
वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।
हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।
सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।
गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा \\\'टी सेट\\\' है
छोटे-छोटे हैं लोटा-थाली।
छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।
मुन्नूौ ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला कहती है
माँ se लेने को साड़ी
कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्याख साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है।
अम्मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।
तुम सोचोगी मैं ले लूँगा
तोता, बिल्लीा, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्चों के खेल।
मैं तो तलवार ख़रीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।
तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों-
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते
रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।
यही रहूँगा कौशल्याऊ मैं
तुमको यही बनाऊँगा
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।
पर माँ, बिना तुम्हाेरे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा?
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।
किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्यानर से बिठा गोद में,
मनचाही चींजे़ देगा।

 
मेरा शीश नवा दो - गीतांजलि  - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
मेरा शीश नवा दो अपनी
चरण-धूल के तल में।
देव! डुबा दो अहंकार सब
मेरे आँसू-जल में।

 
ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है | ग़ज़ल  - वसीम बरेलवी | Waseem Barelvi
ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है
समन्दरों ही के लहजे में बात करता है

ख़ुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है

शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है

ज़मीं की कैसी विक़ालत हो फिर नहीं चलती
जब आसमां  से  कोई  फ़ैसला उतरता है

तुम आ गये हो तो फिर चाँदनी सी बातें हों
ज़मीं पे चाँद  कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है

 
बढ़े चलो! बढ़े चलो!  - सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi
न हाथ एक शस्त्र हो
न हाथ एक अस्त्र हो,
न अन्न, नीर, वस्त्र हो,
हटो नहीं,
डटो वहीं,
बढ़े चलो!
बढ़े चलो!

 
माँ कह एक कहानी  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
"माँ कह एक कहानी।"
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"
"कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?
माँ कह एक कहानी।"

"तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी।"
"जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।"

वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।"
"लहराता था पानी, हाँ हाँ यही कहानी।"

"गाते थे खग कल कल स्वर से, सहसा एक हँस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खर शर से, हुई पक्षी की हानी।"
"हुई पक्षी की हानी? करुणा भरी कहानी!"

चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया,
इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।"
"लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।"

"माँगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी,
तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।"
"हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।"

हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सब ने जानी।"
"सुनी सब ने जानी! व्यापक हुई कहानी।"

राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?"
"माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।
कोई निरपराध को मारे तो क्यों न उसे उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।"
"न्याय दया का दानी! तूने गुणी कहानी।"

 
देश  - शेरजंग गर्ग
ग्राम, नगर या कुछ लोगों का काम नहीं होता है देश
संसद, सड़कों, आयोगों का नाम नहीं होता है देश
देश नहीं होता है केवल सीमाओं से घिरा मकान
देश नहीं होता है कोई सजी हुई ऊँची दूकान
देश नहीं क्लब जिसमें बैठ करते रहें सदा हम मौज
देश नहीं केवल बंदूकें, देश नहीं होता है फौज
जहाँ प्रेम के दीपक जलते वहीं हुआ करता है देश
जहाँ इरादे नहीं बदलते वहीं हुआ करता है देश
सज्जन सीना ताने चलते वहीं हुआ करता है देश
हर दिल में अरमान मचलते वहीं हुआ करता है देश
वही होता जो सचमुच आगे बढ़ता क़दम-क़दम
धर्म, जाति, भाषाएँ जिसका ऊँचा रखती हैं परचम
पहले हम खुद को पहचाने फिर पहचानें अपना देश
एक दमकता सत्य बनेगा, नहीं रहेगा सपना देश

 
वीरांगना  - केदारनाथ अग्रवाल | Kedarnath Agarwal
मैंने उसको
जब-जब देखा,
लोहा देखा।
लोहे जैसा
तपते देखा, गलते देखा, ढलते देखा
मैंने उसको
गोली जैसा चलते देखा।

 
स्वतंत्रता का नमूना  - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
बिना टिकिट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर
जहाँ ‘मूड' आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर
खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू
पकड़ें टी.टी., गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू
गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना
प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना

 
हिंदी जन की बोली है  - गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur
एक डोर में सबको जो है बाँधती
वह हिंदी है,
हर भाषा को सगी बहन जो मानती
वह हिंदी है।
भरी-पूरी हों सभी बोलियां
यही कामना हिंदी है,
गहरी हो पहचान आपसी
यही साधना हिंदी है,
सौत विदेशी रहे न रानी
यही भावना हिंदी है।

 
पन्‍द्रह अगस्‍त  - गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur
आज जीत की रात
पहरुए सावधान रहना
खुले देश के द्वार
अचल दीपक समान रहना

 
हम होंगे कामयाब  - गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur
हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब एक दिन
ओ हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास,
हम होंगे कामयाब एक दिन॥

 
हिंदी मातु हमारी - प्रो. मनोरंजन  - भारत-दर्शन संकलन | Collections
प्रो. मनोरंजन जी, एम. ए, काशी विश्वविद्यालय की यह रचना लाहौर से प्रकाशित 'खरी बात' में 1935 में प्रकाशित हुई थी।

 
वसीम बरेलवी की ग़ज़ल  - वसीम बरेलवी | Waseem Barelvi
मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा

 
राजगोपाल सिंह | दोहे  - राजगोपाल सिंह
बाबुल अब ना होएगी, बहन भाई में जंग
डोर तोड़ अनजान पथ, उड़कर चली पतंग

 
मौन ओढ़े हैं सभी | राजगोपाल सिंह का गीत  - राजगोपाल सिंह
मौन ओढ़े हैं सभी तैयारियाँ होंगी ज़रूर
राख के नीचे दबी चिंगारियाँ होंगी ज़रूर

 
हाइकु - रोहित कुमार हैप्पी  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

हाइकु

 
शास्त्रीजी - कमलाप्रसाद चौरसिया | कविता  - भारत-दर्शन संकलन | Collections
पैदा हुआ उसी दिन,
जिस दिन बापू ने था जन्म लिया
भारत-पाक युद्ध में जिसने
तोड़ दिया दुनिया का भ्रम।

एक रहा है भारत सब दिन,
सदा रहेगा एक।
युगों-युगों से रहे हैं इसमें
भाषा-भाव अनेक।

 
भूल कर भी न बुरा करना | ग़ज़ल  - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'
भूल कर भी न बुरा करना
जिस क़दर हो सके भला करना।

सीखना हो तो शमअ़ से सीखो
दूसरों के लिए जला करना।

 
जयप्रकाश  - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
झंझा सोई, तूफान रूका,
प्लावन जा रहा कगारों में;
जीवित है सबका तेज किन्तु,
अब भी तेरे हुंकारों में।

 
आपकी हँसी  - रघुवीर सहाय | Raghuvir Sahay

 
मुक्तिबोध की हस्तलिपि में कविता  - गजानन माधव मुक्तिबोध | Gajanan Madhav Muktibodh

 
राष्ट्रगीत में भला कौन वह  - रघुवीर सहाय | Raghuvir Sahay

 
तोड़ो  - रघुवीर सहाय | Raghuvir Sahay

तोड़ो तोड़ो तोड़ो
ये पत्थर ये चट्टानें
ये झूठे बंधन टूटें
तो धरती को हम जानें
सुनते हैं मिट्टी में रस है जिससे उगती दूब है
अपने मन के मैदानों पर व्यापी कैसी ऊब है
आधे आधे गाने

तोड़ो तोड़ो तोड़ो
ये ऊसर बंजर तोड़ो
ये चरती परती तोड़ो
सब खेत बनाकर छोड़ो
मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को
हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को?
गोड़ो गोड़ो गोड़ो

-  रघुवीर सहाय

[साभार - हँसो हँसो जल्दी हँसो]

 
झील, समुंदर, दरिया, झरने उसके हैं | ग़ज़ल  - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
झील, समुंदर, दरिया, झरने उसके हैं
मेरे तश्नालब पर पहरे उसके हैं

हमने दिन भी अँधियारे में काट लिये
बिजली, सूरज, चाँद-सितारे उसके हैं

चलना मेरी ज़िद में शामिल है वर्ना
उसकी मर्ज़ी, सारे रस्ते उसके हैं

जिसके आगे हम उसकी कठपुतली हैं
माया के वे सारे पर्दे उसके हैं

मुड़ कर पीछे शायद ही अब वो देखे
हम पागल ही आगे-पीछे उसके हैं

- कृष्ण सुकुमार

 
तमाम घर को .... | ग़ज़ल  - ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek

तमाम घर को बयाबाँ बना के रखता था
पता नहीं वो दीए क्यूँ बुझा के रखता था

बुरे दिनों के लिए तुमने गुल्लक्कें भर लीं,
मै दोस्तों की दुआएँ बचा के रखता था

वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारों-
इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था

न जाने कौन चला आए वक़्त का मारा,
कि मैं किवाड़ से सांकल हटा के रखता था

हमेशा बात वो करता था घर बनाने की
मगर मचान का नक़्शा छुपा के रखता था

मेरे फिसलने का कारण भी है यही शायद,
कि हर कदम मैं बहुत आज़मा के रखता था

-ज्ञानप्रकाश विवेक

 
गीत फ़रोश  - भवानी प्रसाद मिश्र | Bhawani Prasad Mishra
जी हाँ हुज़ूर
मैं गीत बेचता हूँ
मैं तरह-तरह के
गीत बेचता हूँ
मैं क़िस्म-क़िस्म के
गीत बेचता हूँ

 
हो गई है पीर पर्वत-सी | दुष्यंत कुमार  - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

 
राजगोपाल सिंह की ग़ज़लें  - राजगोपाल सिंह
राजगोपाल सिंह की ग़ज़लें भी उनके गीतों व दोहों की तरह सराही गई हैं। यहाँ उनकी कुछ ग़ज़लें संकलित की जा रही हैं।

 
इन चिराग़ों के | ग़ज़ल  - राजगोपाल सिंह
इन चिराग़ों के उजालों पे न जाना, पीपल
ये भी अब सीख गए आग लगाना, पीपल

 
महावीर प्रसाद द्विवेदी की कविताएं  - महावीर प्रसाद द्विवेदी | Mahavir Prasad Dwivedi
महावीर प्रसाद द्विवेदी की कविताएं

 
कभी कभी खुद से बात करो | कवि प्रदीप की कविता  - भारत-दर्शन संकलन | Collections
कभी कभी खुद से बात करो, कभी खुद से बोलो ।
अपनी नज़र में तुम क्या हो? ये मन की तराजू पर तोलो ।
कभी कभी खुद से बात करो ।
कभी कभी खुद से बोलो ।

 
सुख-दुख | कविता  - सुमित्रानंदन पंत | Sumitranandan Pant
मैं नहीं चाहता चिर-सुख,
मैं नहीं चाहता चिर-दुख,
सुख दुख की खेल मिचौनी
खोले जीवन अपना मुख !

सुख-दुख के मधुर मिलन से
यह जीवन हो परिपूरन;
फिर घन में ओझल हो शशि,
फिर शशि से ओझल हो घन !

जग पीड़ित है अति-दुख से
जग पीड़ित रे अति-सुख से,
मानव-जग में बँट जाएँ
दुख सुख से औ’ सुख दुख से !

अविरत दुख है उत्पीड़न,
अविरत सुख भी उत्पीड़न;
दुख-सुख की निशा-दिवा में,
सोता-जगता जग-जीवन
!

यह साँझ-उषा का आँगन,
आलिंगन विरह-मिलन का;
चिर हास-अश्रुमय आनन
रे इस मानव-जीवन का !

 
भारत-भारती  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
यहाँ मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारती को संकलित करने का प्रयास आरंभ किया है। विश्वास है पाठकों को रोचक लगेगा।

 
ठाकुर का कुआँ | कविता  - ओमप्रकाश वाल्मीकि | Om Prakash Valmiki
चूल्‍हा मिट्टी का
मिट्टी तालाब की
तालाब ठाकुर का ।

 
निकटता | कविता  - विष्णु प्रभाकर | Vishnu Prabhakar

 
प्यारा वतन  - महावीर प्रसाद द्विवेदी | Mahavir Prasad Dwivedi
( १)

 
मंगलाचरण | उपक्रमणिका | भारत-भारती  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
मंगलाचरण

 
मैं दिल्ली हूँ  - रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
'मैं दिल्ली हूँ' रामावतार त्यागी की काव्य रचना है जिसमें दिल्ली की काव्यात्मक कहानी है।

 
मैं दिल्ली हूँ | एक  - रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
मैं दिल्ली हूँ मैंने कितनी, रंगीन बहारें देखी हैं ।
अपने आँगन में सपनों की, हर ओर कितारें देखीं हैं ॥

 
स्वप्न बंधन  - सुमित्रानंदन पंत | Sumitranandan Pant
बाँध लिया तुमने प्राणों को फूलों के बंधन में
एक मधुर जीवित आभा सी लिपट गई तुम मन में!
बाँध लिया तुमने मुझको स्वप्नों के आलिंगन में!

तन की सौ शोभाएँ सन्मुख चलती फिरती लगतीं
सौ-सौ रंगों में, भावों में तुम्हें कल्पना रँगती,
मानसि, तुम सौ बार एक ही क्षण में मन में जगती!

तुम्हें स्मरण कर जी उठते यदि स्वप्न आँक उर में छवि,
तो आश्चर्य प्राण बन जावें गान, हृदय प्रणयी कवि?
तुम्हें देख कर स्निग्ध चाँदनी भी जो बरसावे रवि!

तुम सौरभ-सी सहज मधुर बरबस बस जाती मन में,
पतझर में लाती वसंत, रस-स्रोत विरस जीवन में,
तुम प्राणों में प्रणय, गीत बन जाती उर कंपन में!

तुम देही हो? दीपक लौ-सी दुबली कनक छबीली,
मौन मधुरिमा भरी, लाज ही-सी साकार लजीली,
तुम नारी हो? स्वप्न कल्पना सी सुकुमार सजीली ?

तुम्हें देखने शोभा ही ज्यों लहरी सी उठ आई,
तनिमा, अंग भंगिमा बन मृदु देही बीच समाई!
कोमलता कोमल अंगों में पहिले तन घर पाई!

 
बाँध दिए क्यों प्राण  - सुमित्रानंदन पंत | Sumitranandan Pant
सुमित्रानंदन पंत की हस्तलिपि में उनकी कविता, 'बाँध दिए क्यों प्राण'

 
राखी | कविता  - सुभद्रा कुमारी
भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैं
राखी अपनी, यह लो आज ।
कई बार जिसको भेजा है
सजा-सजाकर नूतन साज ।।

लो आओ, भुजदण्ड उठाओ
इस राखी में बँध जाओ ।
भरत - भूमि की रजभूमि को
एक बार फिर दिखलाओ ।।

 
राखी की चुनौती | सुभद्रा कुमारी चौहान  - सुभद्रा कुमारी
बहिन आज फूली समाती न मन में ।
तड़ित आज फूली समाती न घन में ।।
घटा है न झूली समाती गगन में ।
लता आज फूली समाती न बन में ।।

 
आशा का दीपक  - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है;
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।
चिंगारी बन गयी लहू की बूंद गिरी जो पग से;
चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिह्न जगमग से।
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है;
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।

अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का;
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश का।
एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा;
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही;
अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

 
प्रभु या दास?  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
बुलाता है किसे हरे हरे,
वह प्रभु है अथवा दास?
उसे आने का कष्ट न दे अरे,
जा तू ही उसके पास । 

 
मैं तो वही खिलौना लूँगा  - सियाराम शरण गुप्त | Siyaram Sharan Gupt
'मैं तो वही खिलौना लूँगा'
मचल गया दीना का लाल -
'खेल रहा था जिसको लेकर
राजकुमार उछाल-उछाल ।'

व्यथित हो उठी माँ बेचारी -
'था सुवर्ण - निर्मित वह तो !
खेल इसी से लाल, - नहीं है
राजा के घर भी यह तो ! '

राजा के घर ! नहीं नहीं माँ
तू मुझको बहकाती है ,
इस मिट्टी से खेलेगा क्यों
राजपुत्र तू ही कह तो । '

फेंक दिया मिट्टी में उसने
मिट्टी का गुड्डा तत्काल ,
'मैं तो वही खिलौना लूँगा' -
मचल गया दीना का लाल

' मैं तो वही खिलौना लूँगा '
मचल गया शिशु राजकुमार , -
वह बालक पुचकार रहा था
पथ में जिसको बारबार |

' वह तो मिट्टी का ही होगा ,
खेलो तुम तो सोने से '
दौड़ पड़े सब दास - दासियाँ
राजपुत्र के रोने से

' मिट्टी का हो या सोने का ,
इनमें वैसा एक नहीं ,
खेल रहा था उछल - उछल कर
वह तो उसी खिलौने से '

राजहठी ने फेंक दिए सब
अपने रजत - हेम - उपहार ,
' लूँगा वही , वही लूँगा मैं ! '
मचल गया वह राजकुमार

- सियारामशरण गुप्त

[ साभार - जीवन सुधा ]
 
कृष्ण की चेतावनी  - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

 
एक भी आँसू न कर बेकार  - रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
एक भी आँसू न कर बेकार -
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!
पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है,
यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है,
और जिस के पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है,
कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार
जाने देवता को कौनसा भा जाए!

 
परशुराम की प्रतीक्षा  - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
दो शब्द (प्रथम संस्करण)

 
परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 1  - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ?
शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?

 
मैं और कुछ नहीं कर सकता था  - विष्णु नागर
मैं क्या कर सकता था
किसी का बेटा मर गया था
सांत्वना के दो शब्द कह सकता था
किसी ने कहा बाबू जी मेरा घर बाढ़ में बह गया
तो उस पर यकीन करके उसे दस रुपये दे सकता था
किसी अंधे को सड़क पार करा सकता था
रिक्शावाले से भाव न करके उसे मुंहमांगा दाम दे सकता था
अपनी कामवाली को दो महीने का एडवांस दे सकता था
दफ्तर के चपरासी की ग़लती माफ़ कर सकता था
अमेरिका के खिलाफ नारे लगा सकता था
वामपंथ में अपना भरोसा फिर से ज़ाहिर कर सकता था
वक्तव्य पर दस्तख़त कर सकता था

और मैं क्या कर सकता था
किसी का बेटा तो नहीं बन सकता था
किसी का घर तो बना कर नहीं दे सकता था
किसी की आँख तो नहीं बन सकता था
रिक्शा चलाने से किसी के फेफड़ों को सड़ने से रोक तो नहीं सकता था


और मैं क्या कर सकता था-
ऐसे सवाल उठा कर खुश हो सकता था
मान सकता था कि अब तो सिद्ध है वाकई मैं एक कवि हूँ
और वक़्त आ चुका है कि मेरी कविताओं के अनुवाद की किताब अब
अंग्रेजी में लंदन से छप कर आ जाना चाहिए।

 
वन्देमातरम्  - भारत-दर्शन संकलन | Collections
'वन्‍देमातरम्' बंकिम चन्‍द्र चटर्जी द्वारा संस्‍कृत में रचा गया; यह स्‍वतंत्रता की लड़ाई में भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत था। इसका स्‍थान हमारे राष्ट्र गान, 'जन गण मन...' के बराबर है। इसे पहली बार 1896 में भारतीय राष्‍ट्रीय काँग्रेस के सत्र में गाया गया था।

 
वन्देमातरम् | राष्ट्रीय गीत  - भारत-दर्शन संकलन | Collections
वंदे मातरम्, वंदे मातरम्!
सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्,
शस्यश्यामलाम्, मातरम्!
वंदे मातरम्!
शुभ्रज्योत्सनाम् पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्,
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्,
सुखदाम् वरदाम्, मातरम्!
वंदे मातरम्, वंदे मातरम्॥

 
माँ गाँव में है  - दिविक रमेश
चाहता था
आ बसे माँ भी
यहाँ, इस शहर में।

 
सोचेगी कभी भाषा  - दिविक रमेश
जिसे रौंदा है जब चाहा तब
जिसका किया है दुरूपयोग, सबसे ज़्यादा।
जब चाहा तब
निकाल फेंका जिसे बाहर।
कितना तो जुतियाया है जिसे
प्रकोप में, प्रलोभ में
वह तुम्हीं हो न भाषा।

 
माँ  - दिविक रमेश
रोज़ सुबह, मुँह-अंधेरे
दूध बिलोने से पहले
माँ
चक्की पीसती,
और मैं
घुमेड़े में
आराम से
सोता।

 
नाग की बाँबी खुली है आइए साहब  - ऋषभदेव शर्मा
नाग की बाँबी खुली है आइए साहब
भर कटोरा दूध का भी लाइए साहब

रोटियों की फ़िक्र क्या है? कुर्सियों से लो
गोलियाँ बँटने लगी हैं खाइए साहब

टोपियों के हर महल के द्वार छोटे हैं
और झुककर और झुककर जाइए साहब

मानते हैं उम्र सारी हो गई रोते
गीत उनके ही करम के गाइए साहब

 
धुंध है घर में उजाला लाइए  - ऋषभदेव शर्मा
धुंध है घर में उजाला लाइए
रोशनी का इक दुशाला लाइए

केचुओं की भीड़ आँगन में बढ़ी
आदमी अब रीढ़ वाला लाइए

जम गया है मोम सारी देह में
गर्म फौलादी निवाला लाइए

जूझने का जुल्म से संकल्प दे
आज ऐसी पाठशाला लाइए

- डॉ.ऋषभदेव शर्मा
  (तरकश, 1996)

 
हैं चुनाव नजदीक सुनो भइ साधो  - ऋषभदेव शर्मा
हैं चुनाव नजदीक, सुनो भइ साधो
नेता माँगें भीख, सुनो भइ साधो

गंगाजल का पात्र, आज सिर धारें
कल थूकेंगे पीक, सुनो भइ साधो

 
गरमागरम थपेड़े लू के  - आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)
गरमागरम थपेड़े लू के, पारा सौ के पार हुआ है,
इतनी गरमी कभी न देखी, ऐसा पहली बार हुआ है।
नींबू - पानी, ठंडा - बंडा,
ठंडी बोतल डरी - डरी है।
चारों ओर बबंडर उठते,
आँधी चलती धूल भरी है।
नहीं भाड़ में सीरा भैया, भट्ठी-सा संसार हुआ है,
गरमागरम थपेड़े लू के, पारा सौ के पार हुआ है।
आते - जाते आतंकी से,
सब अपना मुँह ढ़ाँप रहे हैं।
बिजली आती-जाती रहती,
एसी, कूलर काँप रहे हैं।
शिमला नैनीताल चलें अब,मन में यही विचार हुआ है,
गरमागरम थपेड़े लू के, पारा सौ के पार हुआ है।
अभी सुना भू-कम्प हुआ है,
और सुनामी सागर तल पर।
दूर-दूर तक दिखे न राहत,
आफत की आहट है भू पर।
बन्द द्वार कर घर में बैठो, जीना ही दुश्वार हुआ है,
गरमागरम थपेड़े लू के, पारा सौ के पार हुआ है।
बादल फटा, बहे घर द्वारे,
नगर-नगर में पानी-पानी।
सृष्टि-सन्तुलन अस्त व्यस्त है,
ये सब कुछ अपनी नादानी।
मानव-मन पागल है कितना,समझाना बेकार हुआ है,
गरमागरम थपेड़े लू के, पारा सौ के पार हुआ है।

-आनन्द विश्वास

 
माँ | सुशांत सुप्रिय की कविता  - सुशांत सुप्रिय
इस धरती पर
अपने शहर में मैं
एक उपेक्षित उपन्यास के बीच में
एक छोटे-से शब्द-सा आया था

वह उपन्यास
एक ऊँचा पहाड़ था
मैं जिसकी तलहटी में बसा
एक छोटा-सा गाँव था

वह उपन्यास
एक लंबी नदी था
मैं जिसके बीच में स्थित
एक सिमटा हुआ द्वीप था

वह उपन्यास
पूजा के समय बजता हुआ
एक ओजस्वी शंख था
मैं जिसकी ध्वनि-तरंग का
हज़ारवाँ हिस्सा था

हालाँकि वह उपन्यास
विधाता की लेखनी से उपजी
एक सशक्त रचना थी
आलोचकों ने उसे
कभी नहीं सराहा
जीवन के इतिहास में
उसका उल्लेख तक नहीं हुआ

आख़िर क्या वजह है कि
हम और आप
जिन महान् उपन्यासों के
शब्द बनकर
इस धरती पर आए
उन उपन्यासों को
कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला ?

 
राम रतन धन पायो | मीरा के पद  - मीराबाई | Meerabai

 
कबीर के दोहे | Kabir's Couplets  - कबीरदास | Kabirdas
कबीर के दोहे सर्वाधिक प्रसिद्ध व लोकप्रिय हैं। हम कबीर के अधिक से अधिक दोहों को संकलित करने हेतु प्रयासरत हैं।

 
फागुन के दिन चार  - मीराबाई | Meerabai
फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥

 
कबीर वाणी  - कबीरदास | Kabirdas
माला फेरत जुग गया फिरा ना मन का फेर
कर का मनका छोड़ दे मन का मन का फेर
मन का मनका फेर ध्रुव ने फेरी माला
धरे चतुरभुज रूप मिला हरि मुरली वाला
कहते दास कबीर माला प्रलाद ने फेरी
धर नरसिंह का रूप बचाया अपना चेरो

 
कबीर की हिंदी ग़ज़ल  - कबीरदास | Kabirdas
क्या कबीर हिंदी के पहले ग़ज़लकार थे? यदि कबीर की निम्न रचना को देखें तो कबीर ने निसंदेह ग़ज़ल कहीं है:

 
कबीर भजन  - कबीरदास | Kabirdas
उमरिया धोखे में खोये दियो रे।
धोखे में खोये दियो रे।
पांच बरस का भोला-भाला
बीस में जवान भयो।
तीस बरस में माया के कारण,
देश विदेश गयो। उमर सब ....
चालिस बरस अन्त अब लागे, बाढ़ै मोह गयो।
धन धाम पुत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।।
बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत खाट परयो।
लड़का बहुरी बोलन लागे, बूढ़ा मर न गयो।।
बरस साठ-सत्तर के भीतर, केश सफेद भयो।
वात पित कफ घेर लियो है, नैनन निर बहो।
न हरि भक्ति न साधो की संगत,
न शुभ कर्म कियो।
कहै कबीर सुनो भाई साधो,
चोला छुट गयो।।

 
युग-चेतना | कविता  - ओमप्रकाश वाल्मीकि | Om Prakash Valmiki
मैंने दुख झेले
सहे कष्ट पीढ़ी-दर-पीढ़ी इतने
फिर भी देख नहीं पाए तुम
मेरे उत्‍पीड़न को
इसलिए युग समूचा
लगता है पाखंडी मुझको ।

 
बिहारी के होली दोहे  - बिहारी | Bihari
होली पर बिहारी के कुछ दोहे

 
बहुत वासनाओं पर मन से | गीतांजलि  - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
बहुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर,
तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर ।
संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।

 
कबीर दोहे -3  - कबीरदास | Kabirdas
(41)
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय॥

 
ताज़े-ताज़े ख़्वाब | ग़ज़ल  - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
ताज़े-ताज़े ख़्वाब सजाये रखता है
यानी इक उम्मीद जगाये रखता है

उसको छूने में अँगुलि जल जाती हैं
जाने कैसी आग दबाये रखता है

अपने दिल की सबसे कहता फिरता है
बाक़ी सबके राज़ छुपाये रखता है

अपनापन तो उसके फ़न में शामिल है
दुश्मन को भी दोस्त बनाये रखता है

उसका होना तय है, दिखना नामुम्किन
कैसी इक दीवार उठाये रखता है

काँटों के जंगल में चलकर नंगे पाँव
वो अपना ईमान बचाये रखता है

-  कृष्ण सुकुमार
153-ए/8, सोलानी कुंज,
भारतीय प्रौद्योकी संस्थान
रुड़की- 247 667 (उत्तराखण्ड)

 
किसी के दुख में .... | ग़ज़ल  - ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek
किसी के दुख में रो उट्ठूं कुछ ऐसी तर्जुमानी दे
मुझे सपने न दे बेशक, मेरी आंखों को पानी दे

मुझे तो चिलचिलाती धूप में चलने की आदत है
मेरे भगवान, मेरे शहर को शामें सुहानी दे

ये रद्दी बीनते बच्चे जो गुम कर आए हैं सपने
किसी दिन के लिए तू इनको परियों की कहानी दे

ख़ुदाया, जी रहा हूं यूं तो मैं तेरे ज़माने में
चराग़ों की तरह मिट जाऊं ऐसी ज़िन्दगानी दे

जिसे हम ओढ़ के करते थे अकसर प्यार की बातें
तू सबकुछ छीन ले मेरा वही चादर पुरानी दे

मेरे भगवान, तुझसे मांगना अच्छा नहीं लगता
अगर तू दे सके तो ख़ुश्क दरिया को रवानी दे

यहां इंसान कम, ख़रीदार आते हैं नज़र ज्यादा
ये मैंने कब कहा था मुझको ऐसी राजधानी दे। 

-ज्ञानप्रकाश विवेक

 
जाहिल मेरे बाने  - भवानी प्रसाद मिश्र | Bhawani Prasad Mishra
मैं असभ्य हूँ क्योंकि खुले नंगे पांवों चलता हूँ
मैं असभ्य हूँ क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूँ
मैं असभ्य क्योंकि चीरकर धरती धान उगाता हूँ
मैं असभ्य हूँ क्योंकि ढोल पर बहुत जोर से गाता

 
इस नदी की धार में | दुष्यंत कुमार  - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है

एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है

निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है

 
मैं रहूँ या न रहूँ | ग़ज़ल  - राजगोपाल सिंह
मैं रहूँ या न रहूँ, मेरा पता रह जाएगा
शाख़ पर यदि एक भी पत्ता हरा रह जाएगा

 
कड़वा सत्य | कविता  - विष्णु प्रभाकर | Vishnu Prabhakar

 
जै जै प्यारे भारत देश  - महावीर प्रसाद द्विवेदी | Mahavir Prasad Dwivedi
जै जै प्यारे देश हमारे
तीन लोक में सबसे न्यारे ।
हिमगिरी-मुकुट मनोहर धारे
जै जै सुभग सुवेश ।। जै जै... ।।१।।

हम बुलबुल तू गुल है प्यारा
तू सुम्बुल,  तू देश हमारा ।
हमने तन-मन तुझ पर वारा
तेज पुंज-विशेष ।। जै जै ... ।।२।।

तुझ पर हम निसार हो जावें
तेरी रज हम शीश चढ़ावें ।
जगत पिता से यही मनावें
होवे तू देशेश ।। जै जै... ।।३।।

जै जै हे देशों के स्वामी
नामवरों में भी हे नामी ।
हे प्रणम्य तुझको प्रणमामी
जीते रहो हमेश ।। जै जै... ।।४।।

आँख अगर कोई दिखलावे
उसका दर्प-दलन हो जावे ।
फल अपने कर्मों का पावे
बने नामनि शेष ।। जै जै... ।।५।।

बल दो हमें ऐक्य सिखलाओ
सँभलो देश होश में आवो ।
मातृभूमि-सौभाग्य बढ़ाओ
मेटो सकल कलेश ।। जै जै... ।।६।।

हिन्दू मुसल्मान ईसाई
यश गावें सब भाई-भाई ।
सब के सब तेरे शैदाई
फूलो-फलो स्वदेश ।। जै जै... ।।७।।

इष्टदेव आधार हमारे
तुम्हीं गले के हार हमारे ।
भुक्ति-मुक्ति के द्वार हमारे
जै जै जै जै देश ।। जै जै... ।।८।।

 
मैं दिल्ली हूँ | दो  - रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
जब चाहा मैंने तूफ़ानों के, अभिमानों को कुचल दिया ।
हँसकर मुरझाई कलियों को, मैंने उपवन में बदल दिया ।।

 
भारत वर्ष की श्रेष्ठता | भारत-भारती  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
भू-लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ ?
फैला मनोहर गिरी हिमालय और गंगाजल जहाँ ।
सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है ,
उसका कि जो ऋषिभूमि है, वह कौन ? भारत वर्ष है ।।१५।।

 
अँधेरे में  - गजानन माधव मुक्तिबोध | Gajanan Madhav Muktibodh
जिंदगी के...
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;
आवाज पैरों की देती है सुनाई
बार-बार... बार-बार,
वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता,
किंतु वह रहा घूम
तिलस्मी खोह में गिरफ्तार कोई एक,
भीत-पार आती हुई पास से,
गहन रहस्यमय अंधकार ध्वनि-सा
अस्तित्व जनाता
अनिवार कोई एक,
और मेरे हृदय की धक्-धक्
पूछती है - वह कौन
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई !
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से
फूले हुए पलस्तर,
खिरती है चूने-भरी रेत
खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह -
खुद-ब-खुद
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है,
स्वयमपि
मुख बन जाता है दिवाल पर,
नुकीली नाक और
भव्य ललाट है,
दृढ़ हनु
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति।
कौन वह दिखाई जो देता, पर
नहीं जाना जाता है !
कौन मनु ?

 
कबीर की कुंडलियां - 1  - कबीरदास | Kabirdas
गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो दिखाय
गोविन्द दियो दिखाय ज्ञान का है भण्डारा
सत मारग पर पांव अपन गुरु ही ने डारा
गोबिन्द लियो बिठाय हिये खुद गुरु के चरनन
माथा दीन्हा टेक कियो कुल जीवन अर्पन

 
परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 2  - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
(खण्ड दो)

 
हरि बिन कछू न सुहावै | मीरा के पद  - मीराबाई | Meerabai

 
नर हो न निराश करो मन को  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।

संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को ।

 
मुक्तिबोध की कविता  - गजानन माधव मुक्तिबोध | Gajanan Madhav Muktibodh
मैं बना उन्माद री सखि, तू तरल अवसाद
प्रेम - पारावार पीड़ा, तू सुनहली याद
तैल तू तो दीप मै हूँ, सजग मेरे प्राण।
रजनि में जीवन-चिता औ' प्रात मे निर्वाण
शुष्क तिनका तू बनी तो पास ही मैं धूल
आम्र में यदि कोकिला तो पास ही मैं हूल
फल-सा यदि मैं बनूं तो शूल-सी तू पास
विँधुर जीवन के शयन को तू मधुर आवास
सजल मेरे प्राण है री, सजग मेरे प्राण
तू बनी प्राण! मै तो आलि चिर-म्रियमाण।

 
मैं अपनी ज़िन्दगी से | ग़ज़ल  - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
मैं अपनी ज़िन्दगी से रूबरू यूँ पेश आता हूँ
ग़मों से गुफ़्तगू करता हूँ लेकिन मुस्कुराता हूँ

ग़ज़ल कहने की कोशिश में कभी ऐसा भी होता है
मैं ख़ुद को तोड लेता हूँ, मैं ख़ुद को फिर बनाता हूँ

कभी शिद्दत से आती है मुझे जब याद उसकी तो
किसी बुझते दिये जैसा ज़रा-सा टिमटिमाता हूँ

सज़ा देना है तेरा काम, कोताही बरतना मत
मैं नाक़र्दा गुनाहों का मुसल्सल ऋण चुकाता हूँ

मेरी मजबूरियां मेरे उसूलों से हैं टकराती
जहाँ पर सर उठाना था वहाँ पर सर झुकाता हूँ

मेरे अल्फ़ाज़ का जादू तेरे सर चढ़ के बोलेगा
दिखाई वो तुझे देगा, तुझे जो मैं दिखाता हूँ

 
ऋतु फागुन नियरानी हो  - कबीरदास | Kabirdas
ऋतु फागुन नियरानी हो,
कोई पिया से मिलावे ।

सोई सुदंर जाकों पिया को ध्यान है,  
सोई पिया की मनमानी,

खेलत फाग अगं नहिं मोड़े,

सतगुरु से लिपटानी ।

इक इक सखियाँ खेल घर पहुँची,
इक इक कुल अरुझानी ।

इक इक नाम बिना बहकानी,
हो रही ऐंचातानी ।।

 
मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ | दुष्यंत कुमार  - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ
वो गज़ल आपको सुनाता हूँ।

 
अजनबी नज़रों से | ग़ज़ल  - राजगोपाल सिंह
अजनबी नज़रों से अपने आप को देखा न कर
आइनों का दोष क्या है? आइने तोड़ा न कर

 
चीन्हे किए अचीन्हे कितने | गीतांजलि  - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
हुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर,
तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर ।
संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।

 
शब्द और शब्द | कविता  - विष्णु प्रभाकर | Vishnu Prabhakar

 
हमारा उद्भव | भारत-भारती  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt

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मैं दिल्ली हूँ | तीन  - रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
गूंजी थी मेरी गलियों में, भोले बचपन की किलकारी ।
छूटी थी मेरी गलियों में, चंचल यौवन की पिचकारी ॥

 
माँ पर दोहे | मातृ-दिवस  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
जब तक माँ सिर पै रही बेटा रहा जवान।
उठ साया जब तै गया, लगा बुढ़ापा आन॥

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परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 3  - रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
(खण्ड तीन)

 
प्राण वन्देमातरम्  - भारत-दर्शन संकलन | Collections
हम भारतीयों का सदा है, प्राण वन्देमातरम्
हम भूल सकते है नही शुभ तान वन्देमातरम् । ।

देश के ही अन्नजल से बन सका यह खून है ।
नाड़ियों में हो रहा संचार वन्देमातरम् । ।

स्वाधीनता के मंत्र का है सार वन्देमातरम् ।
हर रोम से हर बार हो उबार वन्देमातरम् ।।

घूमती तलवार हो सरपर मेरे परवा नही ।
दुश्मनो देखो मेरी ललकार वन्देमातरम् ।।

धार खूनी खच्चरों की बोथरी हो जायगी ।
जब करोड़ों की पड़े झंकार वन्देमात
रम् ।।

टांग दो सूली पै मुझको खाल मेरी खींच लो ।
दम निकलते तक सुनो हुंकार वन्देमात
रम् । ।

देश से हम को निकालो भेज दो यमलोक को ।
जीत ले संसार को गुंजार वन्देमात
रम् ।।

 
झूठी जगमग जोति | मीरा के पद  - मीराबाई | Meerabai

 
भरोसा इस क़दर मैंने | ग़ज़ल  - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar

 
मौज-मस्ती के पल भी आएंगे | ग़ज़ल  - राजगोपाल सिंह
मौज-मस्ती के पल भी आएंगे
पेड़ होंगे तो फल भी आएंगे

 
विपदाओं से मुझे बचाओ, यह न प्रार्थना | गीतांजलि  - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

 
हमारे पूर्वज | भारत-भारती  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है,
गाते नहीं उनके हमीं गुण गा रहा संसार है ।
वे धर्म पर करते निछावर तृण-समान शरीर थे,
उनसे वही गम्भीर थे, वरवीर थे, ध्रुव धीर थे ।। १९।।

 
मैं दिल्ली हूँ | चार  - रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
क्यों नाम पड़ा मेरा 'दिल्ली', यह तो कुछ याद न आता है ।
पर बचपन से ही दिल्ली, कहकर मझे पुकारा जाता है ॥

 
छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम्  - भारत-दर्शन संकलन | Collections
छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम् ।
हम गरीबों के गले का हार वन्देमातरन्  ॥१॥

सर चढ़ों के सर में चक्कर उस समय आता जरूर ।
कान मे पहुँची जहाँ झन्कार वन्देमातरम् ॥२॥

हम वही है जो कि होना चाहिए इस वक़्त पर ।
आज तो चिल्ला रहा संसार वन्देमातरम् ॥३॥

जेल मे चक्की घसीटें, भूख से ही मर रहा ।
उस समय भी बक रहा बेज़ार वन्देमातरम् ॥४॥

मौत के मुहँ पर खड़ा है, कह रहा जल्लाद से-
भोंक दे सीने में वह तलवार  वन्दे मातरम ॥५॥

डाक्टरों ने नब्ज देखी, सिर हिला कर कह दिया ।
हो गया इसको तो यह आज़ार वन्देमातरम् ॥६॥

ईद, होली, दसहरा, सुबरात से भी सौगुना ।
है हमारा लाड़ला त्योहार वन्देमातरम् ॥७॥

जालिमों का जुल्म भी काफूर सा उड़  जायेगा ।
फैसला होगा सरे दरबार- वन्देमातरम्  ॥ ८ ॥

 
कबीर दोहे -4  - कबीरदास | Kabirdas
4

 
अब तो मेरा राम | मीरा के पद  - मीराबाई | Meerabai

 
कबीर दोहे -4  - कबीरदास | Kabirdas
समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय ।
मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥ 51 ॥

 
पुराने ख़्वाब के फिर से | ग़ज़ल  - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
पुराने ख़्वाब के फिर से नये साँचे बदलती है
सियासत रोज़ अपने खेल में पाले बदलती है

हम ऐसे मोड़ पर आ कर अचानक टूट जाते हैं
जहाँ से ज़िन्दगी अपने कई रस्ते बदलती है

हमेशा एक सा चेहरा बहुत कम लोग रखते हैं
यहाँ इंसान की फ़ितरत कई चेहरे बदलती है

हवा में भीगते हैं बारिशों में सूख जाते हैं
मुहब्बत मौसमों का रूख़ सलीक़े से बदलती है

हमे ग़ुरबत से बाहर आने का मौक़ा नहीं मिलता
कोई साज़िश हमारे घर के दरवाज़े बदलती है

-  कृष्ण सुकुमार
153-ए/8, सोलानी कुंज,
भारतीय प्रौद्योकी संस्थान
रुड़की- 247 667 (उत्तराखण्ड)

 
टूट गयी खटिया  - शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi
हे वोटर महाराज,
आप नहीं आये आखिर अपनी हरकत से बाज़

नोट हमारे दाब लिये और वोट नहीं डाला
दिखा नर्मदा घाट सौंप दी हाथों में माला

डूब गये आंसू में मेरे छप्पर और छानी
ऊपर से तुम दिखलाते हो चुल्लू भर पानी

मिले ना लड्डू लोकतंत्र के दाव गया खाली
सूख गई क़िस्मत की बगिया रूठ गया माली

बाप-कमाई साफ़ हो गई हाफ़ हुई काया
लोकतंत्र के स्वप्न महल का खिसक गया पाया

चाट गई सब चना चबैना ये चुनाव चकिया
गद्दी छीनी प्रतिद्वन्दी ने चमचों ने तकिया

चाय पानी और बोतलवाले करते हैं फेरे
बीस हज़ार, बीस खातों में चढे नाम मेरे

झंडा गया भाड़ में मेरा, हाय पड़ा महंगा
बच्चो ने चड्डी सिलवा ली, बीवी ने लहंगा

टूट गई रिश्वत की डोरी, डूब गई लुटिया
बिछने से पहले ही मेरी टूट गई खटिया 

 
विकसित करो हमारा अंतर | गीतांजलि  - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
विकसित करो हमारा अंतर
           अंतरतर हे !

 
आदर्श | भारत-भारती  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
आदर्श जन संसार में इतने कहाँ पर हैं हुए ?
सत्कार्य्य-भूषण आर्य्यगण जितने यहाँ पर हैं हुए ।
हैं रह गये यद्यपि हमारे गीत आज रहे सहे ।
पर दूसरों के भी वचन साक्षी हमारे हो रहे ।। ३० ।।

 
शब्द वन्देमातरम्  - भारत-दर्शन संकलन | Collections
फ़ैला जहाँ में शोर मित्रो! शब्द वन्देमातरम् ।
हिंद हो या मुसलमान सब कहते वन्देमातरम् ॥

 
म्हारे तो गिरधर गोपाल | मीरा के पद  - मीराबाई | Meerabai
म्हारे तो गिरधर गोपाल

म्हारे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥
जाके सिर मोर मुगट मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥
छाँडि दई कुद्दकि कानि कहा करिहै कोई॥
संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई॥
चुनरीके किये टूक ओढ लीन्हीं लोई।
मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥
अंसुवन जू सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।
अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥

 
कवि फ़रोश | पैरोडी  - शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi
जी हाँ, हुज़ूर, मैं कवि बेचता हूँ
मैं तरह-तरह के कवि बेचता हूँ
मैं किसिम-किसिम के कवि बेचता हूँ।

जी, वेट देखिए, रेट बताऊं मैं
पैदा होने की डेट बताऊं मैं
जी, नाम बुरा, उपनाम बताऊं मैं
जी, चाहे तो बदनाम बताऊं मैं
जी, इसको पाया मैंने दिल्ली में
जी, उसको पकड़ा त्रिचनापल्ली में
जी, कलकत्ते में इसको घेरा है
जी, वह बंबइया अभी बछेरा है
जी, इसे फंसाया मैंने पूने में
जी, तन्हाई में, उसको सूने में
ये बिना कहे कविता सुनवाता है
जी, उसे सुनो, तो चाय पिलाता है
जो, लोग रह गए धँधे में कच्चे
जी, उन लोगों ने बेच दिए बच्चे
जी, हुए बिचारे कुछ ऐसे भयभीत
जी, बेच दिए घबरा के अपने गीत।

मैं सोच समझ कर कवि बेचता हूँ
जी हाँ, हुज़ूर, मैं कवि बेचता हूँ।

 
आर्य-स्त्रियाँ  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
केवल पुरुष ही थे न वे जिनका जगत को गर्व था,
गृह-देवियाँ भी थीं हमारी देवियाँ ही सर्वथा ।
था अत्रि-अनुसूया-सदृश गार्हस्थ्य दुर्लभ स्वर्ग में,
दाम्पत्य में वह सौख्य था जो सौख्य था अपवर्ग में ।। ३९ ।।

 
आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख | ग़ज़ल  - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख
घर अँधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख।

 
होली व फाग के दोहे  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
भर दीजे गर हो सके, जीवन अंदर रंग।
वरना तो बेकार है, होली का हुड़दंग॥

 
रंग भरी राग | मीरा के पद  - मीराबाई | Meerabai

 
मेरो दरद न जाणै कोय  - मीराबाई | Meerabai
हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय।
घायल की गति घायल जाणै जो कोई घायल होय।
जौहरि की गति जौहरी जाणै की जिन जौहर होय।
सूली ऊपर सेज हमारी सोवण किस बिध होय।
गगन मंडल पर सेज पिया की किस बिध मिलणा होय।
दरद की मारी बन-बन डोलूं बैद मिल्या नहिं कोय।
मीरा की प्रभु पीर मिटेगी जद बैद सांवरिया होय।

- मीरा बाई
 
हमारी सभ्यता  - मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
शैशव-दशा में देश प्राय: जिस समय सब व्याप्त थे,
निःशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे ।
संसार को पहले हमीं ने ज्ञान-भिक्षा दान की,
आचार की, व्यवहार की, व्यापार की, विज्ञान की ।। ४५ ।।

 
कबीर की कुंडलियां  - कबीरदास | Kabirdas
कबीर ने कुंडलियां भी कही हों इसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता लेकिन कबीर की कुंडलियां भी प्रचलित हैं। ये कुंडलियां शायद उनके प्रशंसकों या उनके शिष्यों ने कबीर की साखियों को आधार बना लिखी हों। यदि आपके पास इसकी और जानकारी हो या आपने इसपर शोध किया हो तो कृपया जानकारी साझा करें।

 
राग होरी सिन्दूरा | मीरा के पद  - मीराबाई | Meerabai

 
श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया  - मीराबाई | Meerabai
श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया ।। टेर ।।

 
मन्त्र वन्देमातरम्  - भारत-दर्शन संकलन | Collections
शुद्ध सुन्दर अति मनोहर मन्त्र वन्देमातरम् ।
मृदुल सुखकर दुःसहारी शब्द वन्देमातरम् ॥

मन्त्र यह है, तन्त्र यह है, यन्त्र वन्देमातरम् ।
सिद्धिदायक, बुद्धिदायक एक वन्देमातरम् ।।

ओजमय बल कान्तिमय, सुखशान्ति वन्देमातरम् ।
मति प्रदायक अति सहायक मन्त्र वन्देमातरम् ।।

हर घड़ी हर बार हो हर ठाम वन्द्देमातरम् ।
हर दम हमेशा बोलिये प्रिय मन्त्र वन्देमातरम् ॥

हर काम मे हर बात में दिन रात वन्देमातरम् ।
जपिये निरन्तर शुद्ध मन से नित्य वन्देमातरम ॥

सोते समय, खाते समय, कल गान वन्देमातरम् ।
आठो पहर दिल मे उठे मृदु तान वन्देमानरम् ।।

मुख में, हृदय में रात दिन हो जाप्य वन्देमातरन् ।
नाड़ियों के रक्त का संचार वन्देमातरम्।।

तेग़ से सिर भी कटे, भूलो न वन्देमातरम् ।
मौत की घड़ियां गुँजादो शुद्ध वन्देमातरम् ॥

 
होरी खेलत हैं गिरधारी  - मीराबाई | Meerabai
होरी खेलत हैं गिरधारी।
मुरली चंग बजत डफ न्यारो।
संग जुबती ब्रजनारी॥

चंदन केसर छिड़कत मोहन
                        अपने हाथ बिहारी।

भरि भरि मूठ गुलाल लाल संग
                        स्यामा प्राण पियारी।
गावत चार धमार राग तहं
                         दै दै कल करतारी॥


फाग जु खेलत रसिक सांवरो
                           बाढ्यौ रस ब्रज भारी।
मीराकूं प्रभु गिरधर मिलिया
                            मोहनलाल बिहारी॥

- मीरा बाई
 
कर्मवीर  - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh
देख कर बाधा विविध  बहु विघ्न घबराते नहीं
रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं
काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं
हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले
सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले ।

आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही
सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही
मानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कही
जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही
भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं
कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं ।

जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं
काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं
आज कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं
यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहीं
बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिए
वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए ।

व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के शिखर
वे घने जंगल जहाँ रहता है तम आठों पहर
गर्जते जल-राशि की उठती हुई ऊँची लहर
आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट
ये कंपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं
भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ।

 
एक बूँद | Ek Boond  - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh
एक बूँद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी।
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी,
आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी ?

देव मेरे भाग्य में क्या है बदा,
मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ?
या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी,
चू पडूँगी या कमल के फूल में ?

बह गयी उस काल एक ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी।
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ।

लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर ।

- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध

 
सूर के पद | Sur Ke Pad  - सूरदास | Surdas
सूरदास के पदों का संकलन - इस पृष्ठ के अंतर्गत सूर के पदों का संकलन यहाँ उपलब्ध करवाया जा रहा है। यदि आपके पास सूरदास से संबंधित सामग्री हैं तो कृपया 'भारत-दर्शन' के साथ साझा करें।

 
मन न भए दस-बीस - सूरदास के पद  - सूरदास | Surdas
मन न भए दस-बीस

 
हरि संग खेलति हैं सब फाग - सूरदास के पद  - सूरदास | Surdas
हरि संग खेलति हैं सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।।
सारी पहिरी सुरंग, कसि कंचुकी, काजर दे दे नैन।
बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी, सुनि माधो के बैन।।
डफ, बांसुरी, रुंज अरु महुआरि, बाजत ताल मृदंग।
अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।।
एक कोध गोविन्द ग्वाल सब, एक कोध ब्रज नारि।
छांडि सकुच सब देतिं परस्पर, अपनी भाई गारि।।
मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाई।
भरि अरगजा अबीर कनक घट, देतिं सीस तैं नाईं।।
छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि, भुरकतिं बंदन धूरि।
सोभित हैं तनु सांझ समै घन, आये हैं मनु पूरि।।
दसहूं दिसा भयो परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद।
सुर बिमान कौतुहल भूले, निरखत स्याम बिनोद।।

 
झाँसी की रानी  - सुभद्रा कुमारी
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,

 
सुखी आदमी  - केदारनाथ अग्रवाल | Kedarnath Agarwal
आज वह रोया
यह सोचते हुए कि रोना
कितना हास्यास्पद है
वह रोया

मौसम अच्छा था
धूप खिली हुई
सब ठीक-ठाक
सब दुरुस्त
बस खिड़की खोलते ही
सलाखों से दिख गया
ज़रा-सा आसमान
और वह रोया

फूटकर नहीं
जैसे जानवर रोता है माँद में
वह रोया।

 
मुरझाया फूल | कविता  - सुभद्रा कुमारी
यह मुरझाया हुआ फूल है,
इसका हृदय दुखाना मत ।
स्वयं बिखरने वाली इसकी,
पंखुड़ियाँ बिखराना मत ॥
जीवन की अन्तिम घड़ियों में,
देखो, इसे रुलाना मत ॥

 
तुलसी की चौपाइयां  - तुलसीदास | Tulsidas
किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनूरूप।।
जथा अनेक वेष धरि नृत्य करइ नट कोइ ।
सोइ सोइ भाव दिखावअइ आपनु होइ न सोइ ।।

 
ठुकरा दो या प्यार करो | सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता  - सुभद्रा कुमारी
देव! तुम्हारे कई उपासक
कई ढंग से आते हैं ।
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे
कई रंग की लाते हैं ॥

धूमधाम से साजबाज से
मंदिर में वे आते हैं ।
मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुएँ
लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं ॥

मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी
जो कुछ साथ नहीं लायी ।
फिर भी साहस कर मंदिर में
पूजा करने चली आयी ॥

धूप दीप नैवेद्य नहीं है
झांकी का शृंगार नहीं ।
हाय! गले में पहनाने को
फूलों का भी हार नहीं ॥

मैं कैसे स्तुति करूँ तुम्हारी ? 
है स्वर में माधुर्य नहीं ।
मन का भाव प्रकट करने को
वाणी में चातुर्य नहीं ॥

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा
ख़ाली हाथ चली आयी ॥
पूजा की विधि नहीं जानती
फिर भी नाथ! चली आयी ॥

पूजा और पुजापा प्रभुवर !
इसी पुजारिन को समझो ।
दान दक्षिणा और निछावर
इसी भिखारिन को समझो ॥

मैं उन्मत्त प्रेम की प्यासी
हृदय दिखाने आयी हूँ ।
जो कुछ है, बस यही पास है
इसे चढ़ाने आयी हूँ ॥

चरणों पर अर्पित है, इसको
चाहो तो स्वीकार करो ।
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है,
ठुकरा दो या प्यार करो ॥

 
स्वतंत्रता का दीपक  - गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali

 
कवि की बरसगाँठ  - गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali
उन्तीस वसन्त जवानी के, बचपन की आँखों में बीते
झर रहे नयन के निर्झर, पर जीवन घट रीते के रीते

 
मेरा धन है स्वाधीन कलम  - गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali
राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम
जिसने तलवार शिवा को दी
रोशनी उधार दिवा को दी
पतवार थमा दी लहरों को
ख़ंजर की धार हवा को दी
अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

रस-गंगा लहरा देती है
मस्ती-ध्वज फहरा देती है
चालीस करोड़ों की भोली
किस्मत पर पहरा देती है
संग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

कोई जनता को क्या लूटे
कोई दुखियों पर क्या टूटे
कोई भी लाख प्रचार करे
सच्चा बनकर झूठे-झूठे
अनमोल सत्य का रत्‍नहार, लाती चोरों से छीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

बस मेरे पास हृदय-भर है
यह भी जग को न्योछावर है
लिखता हूँ तो मेरे आगे
सारा ब्रह्मांड विषय-भर है
रँगती चलती संसार-पटी, यह सपनों की रंगीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

लिखता हूँ अपनी मरज़ी से
बचता हूँ क़ैंची-दर्ज़ी से
आदत न रही कुछ लिखने की
निंदा-वंदन ख़ुदग़र्ज़ी से
कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

तुझ-सा लहरों में बह लेता
तो मैं भी सत्ता गह लेता
ईमान बेचता चलता तो
मैं भी महलों में रह लेता
हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन कलम
मेरा धन है स्वाधीन कलम

 
गोपालदास नीरज के गीत | जलाओ दीये | Neeraj Ke Geet  - गोपालदास ‘नीरज’
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए ।

नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए।

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए ।

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजारा,
कटेगे तभी यह अँधेरे घिरे अब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए।

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

 
बरस-बरस पर आती होली  - गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali
बरस-बरस पर आती होली,
रंगों का त्यौहार अनूठा
चुनरी इधर, उधर पिचकारी,
गाल-भाल पर कुमकुम फूटा
लाल-लाल बन जाते काले,
गोरी सूरत पीली-नीली,
मेरा देश बड़ा गर्वीला,
रीति-रसम-ऋतु रंग-रगीली,
नीले नभ पर बादल काले,
हरियाली में सरसों पीली !

 
अब तो मजहब कोई | नीरज के गीत  - गोपालदास ‘नीरज’

अब तो मजहब कोई, ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए

आग बहती है यहाँ, गंगा में, झेलम में भी
कोई बतलाए, कहाँ जाकर नहाया जाए

 
जितना कम सामान रहेगा | नीरज का गीत  - गोपालदास ‘नीरज’
जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा

 
तुम दीवाली बनकर  - गोपालदास ‘नीरज’
तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,
मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊँगा!

 
गोपालदास नीरज के दोहे  - गोपालदास ‘नीरज’
(1)
कवियों की और चोर की गति है एक समान
दिल की चोरी कवि करे लूटे चोर मकान

 
रैदास के पद  - रैदास | Ravidas
अब कैसे छूटे राम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै 'रैदासा'॥

 
सोऽहम् | कविता  - चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri
करके हम भी बी० ए० पास
          हैं अब जिलाधीश के दास ।
पाते हैं दो बार पचास
         बढ़ने की रखते हैं आस ॥१॥

 
सुनीति | कविता  - चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri
निज गौरव को जान आत्मआदर का करना
निजता की की पहिचान, आत्मसंयम पर चलना
ये ही तीनो उच्च शक्ति, वैभव दिलवाते,
जीवन किन्तु न डाल शक्ति वैभव के खाते ।
(आ जाते ये सदा आप ही बिना बुलाए ।)
चतुराई की परख यहाँ-परिणाम न गिनकर,
जीवन को नि:शक चलाना सत्य धर्म पर,
जो जीवन का मन्त्र उसी हर निर्भय चलना,
उचित उचित है यही मान कर समुचित ही करना,
यो ही परमानंद भले लोगों ने पाए ।।

 
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ग़ज़ल  - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bhartandu Harishchandra
गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ए यार होली में।

 
रैदास के दोहे  - रैदास | Ravidas
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

 
रैदास की साखियाँ  - रैदास | Ravidas
हरि सा हीरा छाड़ि कै, करै आन की आस ।
ते नर जमपुर जाहिँगे, सत भाषै रैदास ।। १ ।।

अंतरगति रार्चैँ नहीं, बाहर कथैं  उदास ।
ते नर जम पुर जाहिँगे, सत भाषै रैदास ।। २ ।।

रैदास कहें जाके ह्रदै, रहै रैन दिन राम ।
सो भगता भगवंत सम, क्रोध न ब्यापै काम ।। ३

जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड मेँ बास ।
प्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रैदास ।। ४

 
भारतेंदु की कविता  - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bhartandu Harishchandra
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। 
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

 
मीरा के पद - Meera Ke Pad  - मीराबाई | Meerabai
दरद न जाण्यां कोय

 
मीरा के पद - Meera Ke Pad  - मीराबाई | Meerabai
अब तो हरि नाम लौ लागी

सब जग को यह माखनचोर, नाम धर्यो बैरागी।
कहं छोडी वह मोहन मुरली, कहं छोडि सब गोपी।
मूंड मुंडाई डोरी कहं बांधी, माथे मोहन टोपी।
मातु जसुमति माखन कारन, बांध्यो जाको पांव।
स्याम किशोर भये नव गोरा, चैतन्य तांको नांव।
पीताम्बर को भाव दिखावै, कटि कोपीन कसै।
दास भक्त की दासी मीरा, रसना कृष्ण रटे॥ 

 
मीरा के होली पद  - मीराबाई | Meerabai
फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥

 
मीरा के भजन  - मीराबाई | Meerabai
मीरा के भजनों का संग्रह।

 
दोहे | रसखान के दोहे  - रसखान | Raskhan
प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ।
जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोइ॥

 
रसखान की पदावलियाँ | Raskhan Padawali  - रसखान | Raskhan
मानुस हौं तो वही रसखान बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥

या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥
रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥
सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै।
जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥

 
रसखान के फाग सवैय्ये  - रसखान | Raskhan

रसखान के फाग सवैय्ये

मिली खेलत फाग बढयो अनुराग सुराग सनी सुख की रमकै।
कर कुंकुम लै करि कंजमुखि प्रिय के दृग लावन को धमकैं।।
रसखानि गुलाल की धुंधर में ब्रजबालन की दुति यौं दमकै।
मनौ सावन सांझ ललाई के मांझ चहुं दिस तें चपला चमकै।।

 
ज़िंदगी  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
लाचारी है,
बीमारी है,
...फिर भी
ज़िंदगी सभी को प्यारी है!

 
जन्म-दिन  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
यूँ तो जन्म-दिन मैं यूँ भी नहीं मनाता
पर इस बार...
जन्म-दिन बहुत रुलाएगा
जन्म-दिन पर 'माँ' बहुत याद आएगी
चूँकि...
इस बार...
'जन्म-दिन मुबारक' वाली चिरपरिचित आवाज नहीं सुन पाएगी...
पर...जन्म-दिन के आस-पास या शायद उसी रात...
वो ज़रूर सपने में आएगी...
फिर...
'जन्म-दिन मुबारिक' कह जाएगी
इस बार मैं हँसता हुआ न बोल पाऊंगा...
आँख खुल जाएगी...
'क्या हुआ?' बीवी पूछेगी और...
उत्तर में मेरी आँख भर जाएगी।
[16 जून 2013 को माँ छोड़ कर जो चल दी]

 
रिश्ते  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
कुछ खून से बने हुए
कुछ आप हैं चुने हुए
और कुछ...
हमने बचाए हुए हैं
टूटने-बिखरने को हैं..
बस यूं समझो..
दीवार पर टंगें कैलंडर की तरह,
सजाए हुए हैं।

 
रोहित कुमार 'हैप्पी' के दोहे  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
रोहित कुमार 'हैप्पी' के दोहों का संकलन।

 
एक ऐसी भी घड़ी आती है / ग़ज़ल  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
एक ऐसी भी घड़ी आती है
जिस्म से रूह बिछुड़ जाती है

 
हिन्दी–दिवस नहीं, हिन्दी डे  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
हिन्दी दिवस पर
एक नेता जी

बतिया रहे थे,

'मेरी पब्लिक से

ये रिक्वेस्ट है

कि वे हिन्दी अपनाएं

इसे नेशनवाइड पापुलर लेंगुएज बनाएं

और

हिन्दी को नेशनल लेंगुएज बनाने की

अपनी डयूटी निभाएं।'

 
मुट्ठी भर रंग अम्बर में  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
मुट्ठी भर रंग अम्बर में किसने है दे मारा
आज तिरंगा दीखता है अम्बर मोहे सारा

 
बिहारी के दोहे | Bihari's Couplets  - बिहारी | Bihari
रीति काल के कवियों में बिहारी सर्वोपरि माने जाते हैं। सतसई बिहारी की प्रमुख रचना हैं। इसमें 713 दोहे हैं। बिहारी के दोहों के संबंध में किसी ने कहा हैः

सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर।।

 
उसे यह फ़िक्र है हरदम  - भगत सिंह

 
आओ होली खेलें संग  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
कही गुब्बारे सिर पर फूटे
पिचकारी से रंग है छूटे
हवा में उड़ते रंग
कहीं पर घोट रहे सब भंग!

 
श्रमिक दिवस पर दो हाइकु  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
ये मज़दूर
कितना मजबूर
घर से दूर!

 
काका हाथरस्सी का हास्य काव्य  - काका हाथरसी | Kaka Hathrasi

अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार

बिना टिकट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर
जहाँ 'मूड' आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर
खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू
पकड़ें टी. टी. गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू
गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना
प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना

 
डा रामनिवास मानव के दोहे  - डा रामनिवास मानव | Dr Ramniwas Manav
डॉ. 'मानव' दोहा, बालकाव्य तथा लघुकथा विधाओं के सुपरिचित राष्ट्रीय हस्ताक्षर हैं तथा विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं। उनके कुछ दोहे यहां दिए जा रहे हैं:

 
डा रामनिवास मानव के हाइकु  - डा रामनिवास मानव | Dr Ramniwas Manav
डॉ. 'मानव' हाइकु, दोहा, बालकाव्य तथा लघुकथा विधाओं के सुपरिचित राष्ट्रीय हस्ताक्षर हैं तथा विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं। उनके कुछ हाइकु यहाँ दिए जा रहे हैं:

 
कृष्ण सुकुमार की ग़ज़लें  - कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
कृष्ण सुकुमार की ग़ज़लें

 
गीतांजलि  - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
यहाँ हम रवीन्द्रनाथ टैगोर (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) की सुप्रसिद्ध रचना 'गीतांजलि'' को श्रृँखला के रूप में प्रकाशित करने जा रहे हैं। 'गीतांजलि' गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर (1861-1941) की सर्वाधिक प्रशंसित रचना है। 'गीतांजलि' पर उन्हें 1910 में नोबेल पुरस्कार भी मिला था।

 
दिन अँधेरा-मेघ झरते | रवीन्द्रनाथ ठाकुर  - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
यहाँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना "मेघदूत' के आठवें पद का हिंदी भावानुवाद (अनुवादक केदारनाथ अग्रवाल) दे रहे हैं। देखने में आया है कि कुछ लोगो ने इसे केदारनाथ अग्रवाल की रचना के रूप में प्रकाशित  किया है लेकिन केदारनाथ अग्रवाल जी ने स्वयं अपनी पुस्तक 'देश-देश की कविताएँ' के पृष्ठ 215 पर नीचे इस विषय में टिप्पणी दी है।

 
चल तू अकेला! | रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता  - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो तू चल अकेला,
चल अकेला, चल अकेला, चल तू अकेला!
तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो चल तू अकेला,
जब सबके मुंह पे पाश..
ओरे ओरे ओ अभागी! सबके मुंह पे पाश,
हर कोई मुंह मोड़के बैठे, हर कोई डर जाय!
तब भी तू दिल खोलके, अरे! जोश में आकर,
मनका गाना गूंज तू अकेला!
जब हर कोई वापस जाय..
ओरे ओरे ओ अभागी! हर कोई बापस जाय..
कानन-कूचकी बेला पर सब कोने में छिप जाय...

 
नारी के उद्गार  - सुदर्शन | Sudershan
'माँ' जय मुझको कहा पुरुष ने, तु्च्छ हो गये देव सभी ।
इतना आदर, इतनी महिमा, इतनी श्रद्धा कहाँ कमी?
उमड़ा स्नेह-सिन्धु अन्तर में, डूब गयी आसक्ति अपार । 
देह, गेह, अपमान, क्लेश, छि:! विजयी मेरा शाश्वत प्यार ।।

'बहिन !' पुरुष ने मुझे पुकारा, कितनी ममता ! कितना नेह !
'मेरा भैया' पुलकित अन्तर, एक प्राण हम, हों दो देह ।
कमलनयन अंगार उगलते हैं, यदि लक्षित हो अपमान ।
दीर्ध भुजाओं में भाई की है रक्षित मेरा सम्मान ।।

'बेटी' कहकर मुझे पुरुष ने दिया स्नेह, अन्तर-सर्वस्व ।
मेरा सुख, मेरी सुविधा की चिन्ता-उसके सब सुख ह्रस्व ।।
अपने को भी विक्रय करके मुझे देख पायें निर्बाध ।
मेरे पूज्य पिताकी होती एकमात्र यह जीवन-साध ।।

'प्रिये !' पुरुष अर्धांग दे चुका, लेकर के हाथों में हाथ ।
यहीं नहीं-उस सर्वेश्वर के निकट हमारा शाश्वत साथ ।।
तन-मन-जीवन एक हो गये, मेरा घर-उसका संसार ।
दोनों ही उत्सर्ग परस्पर, दोनों पर दोनों का मार ।।

'पण्या!' आज दस्यु कहता है ! पुरुष हो गया हाय पिशाच ! 
मैं अरक्षिता, दलिता, तप्ता, नंगा पाशवता का नाच !!
धर्म और लज्जा लुटती है ! मैं अबला हूँ कातर, दीन !
पुत्र ! पिता !  भाई ! स्वामी ! सब तुम क्या इसने पौरुषहीन?

 
प्यार भरी बोली | होली हास्य कविता  - जैमिनी हरियाणवी | Jaimini Hariyanavi
होली पर हास्य-कवि जैमिनी हरियाणवी की कविता

 
पुष्प की अभिलाषा | माखनलाल चतुर्वेदी की कविता  - म‌ाखनलाल चतुर्वेदी
चाह नहीं मैं सुरबाला के,
गहनों में गूँथा जाऊँ,

 
मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?  - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

 
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है  - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं -
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

 
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो  - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए,
कितनों ने इनको छूने के कारण कारागार बसाए,
इन्हें पकड़ने में कितनों ने लाठी खाई, कोड़े ओड़े,
और इन्हें झटके देने में कितनों ने निज प्राण गँवाए!
किंतु शहीदों की आहों से शापित लोहा, कच्चा धागा।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।

 
मरण काले  - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
निराला के देहांत के पश्चात् उनके मृत शरीर का चित्र देखने पर हरिवंशराय बच्चन की लिखी कविता -

मरा
मैंने गरुड़ देखा,
गगन का अभिमान,
धराशायी,धूलि धूसर, म्लान!

मरा
मैंने सिंह देखा,
दिग्दिगंत दहाड़ जिसकी गूँजती थी,
एक झाड़ी में पड़ा चिर-मूक,
दाढ़ी-दाढ़-चिपका थूक।

मरा
मैंने सर्प देखा,
स्फूर्ति का प्रतिरूप लहरिल,
पड़ा भू पर बना सीधी और निश्चल रेख।

मरे मानव-सा कभी मैं
दीन, हीन, मलीन, अस्तंगमितमहिमा,
कहीं, कुछ भी नहीं पाया देख।

क्या नहीं है मरण
जीवन पर अवार प्रहार? -
कुछ नहीं प्रतिकार।

क्या नहीं है मरण
जीवन का महा अपमान?-
सहन में ही त्राण।

क्या नहीं है मरण ऐसा शत्रु
जिसके साथ, कितना ही सम कर,
निबल निज को मान,
सबको, सदा,
करनी पड़ी उसकी शरण अंगीकार?-

क्या इसी के लिए मैंने
नित्य गाए गीत,
अंतर में सँजोए प्रीति के अंगार,
दी दुर्नीति को डटकर चुनौती,
ग़लत जीती बाज़ियों से
मैं बराबर
हार ही करता गया स्वीकार,
एक श्रद्धा के भरोसे
न्याय, करुणा, प्रेम - सबके लिए
निर्भर एक ही अज्ञात पर मैं रहा
सहता बुद्धि व्यंग्य प्रहार?

इस तरह रह
अगर जीवन का जिया कुछ अर्थ,
मरण में मैं मत लगूँ असमर्थ!

 
साथी, घर-घर आज दिवाली!  - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
साथी, घर-घर आज दिवाली!

 
दो बजनिए | कविता  - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
"हमारी तो कभी शादी ही न हुई,

 
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ  - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ

 
नव वर्ष  - हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan

 
बाकी बच गया अंडा | कविता  - नागार्जुन | Nagarjuna
पाँच पूत भारत माता के, दुश्मन था खूंखार
गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गये चार

चार पूत भारत माता के, चारों चतुर-प्रवीन

देश-निकाला मिला एक को, बाकी रह गये तीन

तीन पूत भारत माता के, लड़ने लग गए वो

अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच बच गए दो

दो बेटे भारत माता के, छोड़ पुरानी टेक

चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी बच गया है एक

एक पूत भारत माता का, कंधे पर है झंडा

पुलिस पकड़ के जेल ले गई, बाक़ी बच गया अंडा

 
लोगे मोल? | कविता  - नागार्जुन | Nagarjuna
लोगे मोल?
लोगे मोल?
यहाँ नहीं लज्जा का योग
भीख माँगने का है रोग
पेट बेचते हैं हम लोग
लोगे मोल?
लोगे मोल?

 
तीनों बंदर बापू के | कविता  - नागार्जुन | Nagarjuna
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के
ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बंदर बापू के
लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के!

सर्वोदय के नटवर लाल
फैला दुनिया भर में जाल
अभी जिएंगे ये सौ साल
ढाई घर घोड़े की चाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवर लाल!

लंबी उमर मिली है, खुश हैं तीनों बंदर बापू के
दिल की कली खिली है, खुश हैं तीनों बंदर बापू के
बूढ़े हैं, फिर भी जवान हैं तीनों बंदर बापू के
परम चतुर हैं, अति सुजान हैं तीनों बंदर बापू के
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के!

खूब होंगे मालामाल
खूब गलेगी उनकी दाल
औरों की टपकेगी राल
इनकी मगर तनेगी पाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवर लाल!

सेठों क हित साध रहे हैं तीनों बंदर बापू के
युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बंदर बापू के
सत्य-अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के
पूँछों से छवि आँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के
दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बंदर बापू के
मुस्काते हैं आंखें मीचे तीनों बंदर बापू के!

छील रहे गीता की खाल
उपनिषदें हैं इनकी ढाल
उधर सजे मोती के थाल
इधर जमे सतजुगी दलाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवर लाल!

मड़ रहे दुनिया-जहान को तीनों बंदर बापू के
चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बंदर बापू के
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बंदर बापू के
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बंदर बापू के
गांधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बंदर बापू के
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बंदर बापू के!

दिल चटकीला, उजले बाल
नाप चुके हैं गगन विशाल
फूल गए हैं कैसे गाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवर लाल!

हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बंदर बापू के
गुरुओं के भी गुरू बने हैं तीनों बंदर बापू के
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के।

 
कालिदास! सच-सच बतलाना ! | कविता  - नागार्जुन | Nagarjuna
कालिदास! सच-सच बतलाना !
इंदुमती के मृत्यु शोक से
अज रोया या तुम रोये थे ?
कालिदास! सच-सच बतलाना ?

 
बापू महान | कविता  - नागार्जुन | Nagarjuna
बापू महान, बापू महान!
ओ परम तपस्वी परम वीर
ओ सुकृति शिरोमणि, ओ सुधीर
कुर्बान हुए तुम, सुलभ हुआ
सारी दुनिया को ज्ञान
बापू महान, बापू महान!!

 
तेरे दरबार में क्या चलता है ? | कविता  - नागार्जुन | Nagarjuna
तेरे दरबार में
क्या चलता है ?
मराठी-हिन्दी
गुजराती-कन्नड़ ?
ताता गोदरेजवाली
पारसी सेठों की बोली ?
उर्दू—गोआनीज़ ?
अरबी-फारसी....
यहूदियों वाली वो क्या तो
कहलाती है, सो, तू वो भी
भली भाँति समझ लेती
तेरे दरबार में क्या नहीं
समझा जाता है !

मोरी मइया, नादान मैं तो
क्या जानूँ हूँ !
सेठों के लहजे में कहूँ तो—‘‘भूल-चूक लेणी-देणी.....’’

तेरे खास पुजारी
गलत-सलत ही सही
संस्कृत भाषा वाली
विशुद्ध ‘देववाणी’
चलाते होंगे....
मगर मैया तू तो
अंग्रेजी-फ्रेंच-पुर्तगीज
चाइनीज और जापानी
सब कुछ समझ लेती ही है
नेल्सन मंडेला के यहाँ से
लोग-बाग आते ही रहते हैं....

अरे वाह ! देखो मनहर,
अम्बा ने सिर हिला दिया !
जै हो अम्बे !
नौ बरस की लम्बी
सजा दे दी....
चलो, ये भी ठीक रहा !!
देख मनहर भइया
मुस्करा रही है ना !
चल मनहर मइया ने
सिर हिला दिया, देख रे !
अब तो बार-बार
भागा आऊँगा मनहर !

 
घिन तो नहीं आती है ? | कविता  - नागार्जुन | Nagarjuna
पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पे दचके
सटता है बदन से बदन-
पसीने से लथपथ
छूती है निगाहों को
कत्थई दाँतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूँछों की थिरकन
सच-सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है?
जी तो नहीं कढता है?

 
भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएं  - भवानी प्रसाद मिश्र | Bhawani Prasad Mishra
यहाँ भवानी प्रसाद मिश्र के समृद्ध कृतित्व में से कुछ ऐसी कविताएं चयनित की गई हैं जो समकालीन समाज ओर विचारधारा का समग्र चित्र प्रस्तुत करने में सक्षम होंगी।

 
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें  - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें

 
एक आशीर्वाद | कविता  - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
भावना की गोद से उतर कर
जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।
चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये
रूठना मचलना सीखें।
हँसें
मुस्कुराऐं
गाऐं।
हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें
उँगली जलायें।
अपने पाँव पर खड़े हों।
जा तेरे स्वप्न बड़े हों।

 
विष्णु प्रभाकर की कविताएं  - विष्णु प्रभाकर | Vishnu Prabhakar
कहानी, कथा, उपन्यास, यात्रा-संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा, रूपक, फीचर, नाटक, एकांकी, समीक्षा, पत्राचार आदि गद्य की सभी संभव विधाओं के लिए प्रसिद्ध विष्णुजी ने कविताएं भी लिखी हैं।

 
सुशांत सुप्रिय की कविताएं  - सुशांत सुप्रिय
सुशांत सुप्रिय की कविताएं का संकलन।

 
भिक्षुक | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'  - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
वह आता -
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।

 
प्राप्ति | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'  - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

तुम्हें खोजता था मैं,
पा नहीं सका,
हवा बन बहीं तुम, जब
मैं थका, रुका ।

मुझे भर लिया तुमने गोद में,
कितने चुम्बन दिये,
मेरे मानव-मनोविनोद में
नैसर्गिकता लिये;

सूखे श्रम-सीकर वे
छबि के निर्झर झरे नयनों से,
शक्त शिरा‌एँ हु‌ईं रक्त-वाह ले,
मिलीं - तुम मिलीं, अन्तर कह उठा
जब थका, रुका ।

 
तोड़ती पत्थर | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'  - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'

 
वसन्त आया  - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
सखि, वसन्त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।

लता-मुकुल-हार-गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे,
केशर के केश कली के छुटे,
स्वर्ण-शस्य-अञ्चल
पृथ्वी का लहराया।

 
ख़ून की होली जो खेली  - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
रँग गये जैसे पलाश;
कुसुम किंशुक के, सुहाए,
कोकनद के पाए प्राण,
ख़ून की होली जो खेली ।

 
ओमप्रकाश बाल्मीकि की कविताएं  - ओमप्रकाश वाल्मीकि | Om Prakash Valmiki
ओमप्रकाश वाल्मीकि उन शीर्ष साहित्यकारों में से एक हैं जिन्होंने अपने सृजन से साहित्य में सम्मान व स्थान पाया है।  आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। आपने  कविता, कहानी, आ्त्मकथा व आलोचनात्मक लेखन भी किया है।

 
बाजार का ये हाल है | हास्य व्यंग्य संग्रह  - शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi
 बाज़ार का ये हाल है  - हास्य-व्यंग्य-संग्रह

 
फूल और काँटा | Phool Aur Kanta  - अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh
हैं जनम लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता।
रात में उन पर चमकता चांद भी,
एक ही सी चांदनी है डालता।।

मेह उन पर है बरसता एक-सा,
एक-सी उन पर हवाएं हैं बहीं।
पर सदा ही यह दिखाता है हमें,
ढंग उनके एक-से होते नहीं।।

छेद कर कांटा किसी की उंगलियां,
फाड़ देता है किसी का वर वसन।
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर,
भौंरें का है बेध देता श्याम तन।।

फूल लेकर तितलियों को गोद में,
भौंरें को अपना अनूठा रस पिला।
निज सुगंधों औ निराले रंग से,
है सदा देता कली जी की खिला।।

 
खूनी पर्चा  - वंशीधर शुक्ल
अमर भूमि से प्रकट हुआ हूं, मर-मर अमर कहाऊंगा,
जब तक तुझको मिटा न लूंगा, चैन न किंचित पाऊंगा।
तुम हो जालिम दगाबाज, मक्कार, सितमगर, अय्यारे,
डाकू, चोर, गिरहकट, रहजन, जाहिल, कौमी गद्दारे,
खूंगर तोते चश्म, हरामी, नाबकार और बदकारे,
दोजख के कुत्ते खुदगर्जी, नीच जालिमों हत्यारे,
अब तेरी फरेबबाजी से रंच न दहशत खाऊंगा,
जब तक तुझको...।

तुम्हीं हिंद में बन सौदागर आए थे टुकड़े खाने,
मेरी दौलत देख देख के, लगे दिलों में ललचाने,
लगा फूट का पेड़ हिंद में अग्नी ईर्ष्या बरसाने,
राजाओं के मंत्री फोड़े, लगे फौज को भड़काने,
तेरी काली करतूतों का भंडा फोड़ कराऊंगा,
जब तक तुझको...।

हमें फरेबो जाल सिखा कर, भाई भाई लड़वाया,
सकल वस्तु पर कब्जा करके हमको ठेंगा दिखलाया,
चर्सा भर ले भूमि, भूमि भारत का चर्सा खिंचवाया,
बिन अपराध हमारे भाई को शूली पर चढ़वाया,
एक एक बलिवेदी पर अब लाखों शीश चढ़ाऊंगा,
जब तक तुझको....।

बंग-भंग कर, नन्द कुमार को किसने फांसी चढ़वाई,
किसने मारा खुदी राम और झांसी की लक्ष्मीबाई,
नाना जी की बेटी मैना किसने जिंदा जलवाई,
किसने मारा टिकेन्द्र जीत सिंह, पद्मनी, दुर्गाबाई,
अरे अधर्मी इन पापों का बदला अभी चखाऊंगा,
जब तक तुझको....।

किसने श्री रणजीत सिंह के बच्चों को कटवाया था,
शाह जफर के बेटों के सर काट उन्हें दिखलाया था,
अजनाले के कुएं में किसने भोले भाई तुपाया था,
अच्छन खां और शम्भु शुक्ल के सर रेती रेतवाया था,
इन करतूतों के बदले लंदन पर बम बरसाऊंगा,
जब तक तुझको....।

पेड़ इलाहाबाद चौक में अभी गवाही देते हैं,
खूनी दरवाजे दिल्ली के घूंट लहू पी लेते हैं,
नवाबों के ढहे दुर्ग, जो मन मसोस रो देते हैं,
गांव जलाये ये जितने लख आफताब रो लेते हैं,
उबल पड़ा है खून आज एक दम शासन पलटाऊंगा,
जब तक तुझको...।

अवध नवाबों के घर किसने रात में डाका डाला था,
वाजिद अली शाह के घर का किसने तोड़ा ताला था,
लोने सिंह रुहिया नरेश को किसने देश निकाला था,
कुंवर सिंह बरबेनी माधव राना का घर घाला था,
गाजी मौलाना के बदले तुझ पर गाज गिराऊंगा,
जब तक तुझको...।

किसने बाजी राव पेशवा गायब कहां कराया था,
बिन अपराध किसानों पर कस के गोले बरसाया था,
किला ढहाया चहलारी का राज पाल कटवाया था,
धुंध पंत तातिया हरी सिंह नलवा गर्द कराया था,
इन नर सिंहों के बदले पर नर सिंह रूप प्रगटाऊंगा,
जब तक तुझको...।

डाक्टरों से चिरंजन को जहर दिलाने वाला कौन ?
पंजाब केसरी के सर ऊपर लट्ठ चलाने वाला कौन ?
पितु के सम्मुख पुत्र रत्न की खाल खिंचाने वाला कौन ?
थूक थूक कर जमीं के ऊपर हमें चटाने वाला कौन ?
एक बूंद के बदले तेरा घट पर खून बहाऊंगा ?
जब तक तुझको...।

किसने हर दयाल, सावरकर अमरीका में घेरवाया है,
वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र से प्रिय भारत छोड़वाया है,
रास बिहारी, मानवेन्द्र और महेन्द्र सिंह को बंधवाया है,
अंडमान टापू में बंदी देशभक्त सब भेजवाया है,
अरे क्रूर ढोंगी के बच्चे तेरा वंश मिटाऊंगा,
जब तक तुझको....।

अमृतसर जलियान बाग का घाव भभकता सीने पर,
देशभक्त बलिदानों का अनुराग धधकता सीने पर,
गली नालियों का वह जिंदा रक्त उबलता सीने पर,
आंखों देखा जुल्म नक्श है क्रोध उछलता सीने पर,
दस हजार के बदले तेरे तीन करोड़ बहाऊंगा,
जब तक तुझको....।

-वंशीधर शुक्ल (1904-1980)

 
ओ शासक नेहरु सावधान  - वंशीधर शुक्ल
ओ शासक नेहरु सावधान,
पलटो नौकरशाही विधान।
अन्यथा पलट देगा तुमको,
मजदूर, वीर योद्धा, किसान।

 
ओ शासक नेहरु सावधान  - वंशीधर शुक्ल
ओ शासक नेहरु सावधान,
पलटो नौकरशाही विधान।
अन्यथा पलट देगा तुमको,
मजदूर, वीर योद्धा, किसान।

 
उठो सोने वालों  - वंशीधर शुक्ल
उठो सोने वालों सबेरा हुआ है।
वतन के फ़क़ीरों का फेरा हुआ है॥

 
उठ जाग मुसाफिर भोर भई  - वंशीधर शुक्ल
उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है
जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है

खोल नींद से अँखियाँ जरा और अपने प्रभु से ध्यान लगा
यह प्रीति करन की रीती नहीं प्रभु जागत है तू सोवत है
उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है

जो कल करना है आज करले जो आज करना है अब करले
जब चिडियों ने खेत चुग लिया फिर पछताये क्या होवत है
उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है

नादान भुगत करनी अपनी ऐ पापी पाप में चैन कहाँ
जब पाप की गठरी शीश धरी फिर शीश पकड़ क्यों रोवत है
उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है

 
जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है | ग़ज़ल  - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'
जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है
यह सवेरा भी क्या सवेरा है

 
प्रतिपल घूंट लहू के पीना | ग़ज़ल  - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'
प्रतिपल घूँट लहू के पीना,
ऐसा जीवन भी क्या जीना ।

बहुत सरल है घाव लगाना,
बहुत कठिन घावों का सीना ।

छेड़ गया सोई यादों को,
सावन का मदमस्त महीना ।

पीठ न वीर दिखाते रण में,
छलनी भी हो जाये सीना ।

 
बात हम मस्ती में ऐसी कह गए | ग़ज़ल  - डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'
बात हम मस्ती में ऐसी कह गए,
होश वाले भी ठगे से रह गए।

 
बचकर रहना इस दुनिया के लोगों की परछाई से  - विजय कुमार सिंघल
बचकर रहना इस दुनिया के लोगों की परछाई से
इस दुनिया के लोग बना लेते हैं परबत राई से।

 
जंगल-जंगल ढूँढ रहा है | ग़ज़ल  - विजय कुमार सिंघल
जंगल-जंगल ढूँढ रहा है मृग अपनी कस्तूरी को
कितना मुश्किल है तय करना खुद से खुद की दूरी को

इसको भावशून्यता कहिये चाहे कहिये निर्बलता
नाम कोई भी दे सकते हैं आप मेरी मजदूरी को

सम्बंधों के वो सारे पुल क्या जाने कब टूट गए
जो अकसर कम कर देते थे मन से मन की दूरी को

दोष कोई सिर पर मढ़ देंगे झूठे किस्से गढ़ लेंगे
कब तक लोग पचा पाएँगे मेरी इस मशहूरी को

 
कवि प्रदीप की कविताएं  - भारत-दर्शन संकलन | Collections

कवि प्रदीप का जीवन-परिचय व कविताएं

कवि प्रदीप का जन्म 6 फरवरी 1915 को मध्यप्रदेश के छोटे से शहर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। आपका वास्तविक नाम रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी था। आपको बचपन से ही हिन्दी कविता लिखने में रूचि थी।

 
साँप!  - अज्ञेय | Agyeya
   तुम सभ्य तो हुए नहीं
    नगर में बसना
     भी तुम्हें नहीं आया।

एक बात पूछूँ- (उत्तर दोगे?)
तब कैसे सीखा डँसना-

        विष कहाँ पाया?

 
जो पुल बनाएँगें  - अज्ञेय | Agyeya

 
आओ फिर से दीया जलाएं | कविता  - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
आओ फिर से दिया जलाएं
भरी दूपहरी में अधियारा

सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़े

बुझी हुई बाती सुलगाएं

आओ कि से दीया जलाएं।

 
एक बरस बीत गया | कविता  - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
एक बरस बीत गया
झुलसाता जेठ मास
शरद चाँदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया

 
यक्ष प्रश्न - अटल बिहारी वाजपेयी की कविता  - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee

 
पंद्रह अगस्त की पुकार  - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee

 
कैदी कविराय की कुंडलिया  - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee

 
गीत नहीं गाता हूँ | कविता  - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
बेनकाब चेहरे हैं,
दाग बड़े गहरे हैं,
टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ ।
गीत नही गाता हूँ ।

 
ऊँचाई | कविता  - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,

पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,


किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।


न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।

 
दूध में दरार पड़ गई | कविता  - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
खून क्यों सफेद हो गया?

 
कदम मिलाकर चलना होगा | कविता  - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
बाधाएं आती हैं आएं
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

 
पहचान | कविता  - अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी
ऊंचा दिखाई देता है।
जड़ में खड़ा आदमी
नीचा दिखाई देता है।

 
ज़िन्दगी  - अभिषेक गुप्ता
अधूरे ख़त
अधूरा प्रेम
अधूरे रिश्ते
अधूरी कविता
अधूरे ख्वाब
अधूरा इंसान

 
डूब जाता हूँ मैं जिंदगी के  - अभिषेक गुप्ता
डूब जाता हूँ मैं ज़िंदगी के
उन तमाम अनुभावों में
जब खोलता हूँ अपने जहन की
एल्बम पन्ना दर पन्ना और
जब झांकता हूँ उन यादों में

कुछ यादें सकूं देती हैं
कुछ यादें परेशान करती हैं
कुछ प्रतिशोध की आग में जलाती हैं
तो कहीं कुछ हौसला भी पाता हूँ
जब झांकता हूँ उन यादों में

कहीं कुछ पाने की ख़ुशी है
तो कहीं कुछ खोने का भी है ग़म
कहीं भरोसे का मरहम है तो
कहीं छले जाने का मातम
कहीं दुश्मनों की कतार है
तो कहीं कुछ दोस्त भी पाता हूँ
जब झांकता हूँ उन यादों मैं

कहीं बचपन की नासमझी है
तो कहीं जवानी में समझदार होने का दिखावा
कहीं पुरानी परम्पराओं को तोड़ने की जिद है
तो कहीं दुनिया से अलग महसूस होने का छलावा
कहीं कुछ बदगुमानिया हैं
तो कहीं कुछ संस्कार भी पाता हूँ
जब झांकता हूँ उन यादों मैं

 
विप्लव-गान | बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’  - बालकृष्ण शर्मा नवीन | Balkrishan Sharma Navin
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पुथल मच जाये,
एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर से आये,
प्राणों के लाले पड़ जायें त्राहि-त्राहि स्वर नभ में छाये,
नाश और सत्यानाशों का धुआँधार जग में छा जाये,
बरसे आग, जलद जल जाये, भस्मसात् भूधर हो जाये,
पाप-पुण्य सद्-सद् भावों की धूल उड़ उठे दायें-बायें,
नभ का वक्षस्थल फट जाये, तारे टूक-टूक हो जायें,
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पुथल मच जाये!

 
आराम करो | हास्य कविता  - गोपालप्रसाद व्यास | Gopalprasad Vyas
एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छटांक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।"
हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में 'राम' छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ, है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ, सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब 'सुख की नींद' कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

- गोपालप्रसाद व्यास

 
दिवाली के दिन | हास्य कविता  - गोपालप्रसाद व्यास | Gopalprasad Vyas
 

''तुम खील-बताशे ले आओ,
हटरी, गुजरी, दीवट, दीपक।
लक्ष्मी - गणेश लेते आना,
झल्लीवाले के सर पर रख।

कुछ चटर-मटर, फुलझडी, पटाके,
लल्लू को मँगवाने हैं।
तुम उनको नहीं भूल जाना,
जो खाँड-खिलौने आने हैं।

 
हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !  - गोपालप्रसाद व्यास | Gopalprasad Vyas
हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !
शब्दकोश में प्रिये, और भी
बहुत गालियाँ मिल जाएँगी
जो चाहे सो कहो, मगर तुम
मरी उमर की डोर गहो तुम !
हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !

क्या कहती हो-दांत झड़ रहे ?
अच्छा है, वेदान्त आएगा।
दाँत बनाने वालो का भी
अरी भला कुछ हो जाएगा ।

 
खूनी हस्ताक्षर  - गोपालप्रसाद व्यास | Gopalprasad Vyas
वह खून कहो किस मतलब का,
जिसमें उबाल का नाम नहीं ?
वह खून कहो किस मतलब का,
आ सके देश के काम नहीं ?

 
नेताजी का तुलादान  - गोपालप्रसाद व्यास | Gopalprasad Vyas
देखा पूरब में आज सुबह,
एक नई रोशनी फूटी थी।
एक नई किरन, ले नया संदेशा,
अग्निबान-सी छूटी थी॥

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आज मेरे आँसुओं में, याद किस की मुसकराई? | गीत  - उपेन्द्रनाथ अश्क | Upendranath Ashk
आज मेरे आँसुओं में, याद किस की मुसकराई?

 
उसने मेरा हाथ देखा | कविता  - उपेन्द्रनाथ अश्क | Upendranath Ashk
उसने मेरा हाथ देखा और सिर हिला दिया,
"इतनी भाव प्रवीणता
दुनियां में कैसे रहोगे!
इसपर अधिकार पाओ,
वरना
लगातार दुख दोगे
निरंतर दुख सहोगे!"

यह उधड़े मांस सा दमकता अहसास,
मै जानता हूँ, मेरी कमज़ोरी है
हल्की सी चोट इसे सिहरा देती है
एक टीस है, जो अन्तरतम तक दौड़ती चली जाती है
दिन का चैन और रातों की नींद उड़ा देती है!
पर यही अहसास मुझे ज़िन्दा रखे है,
यही तो मेरी शहज़ोरी है!
वरना मांस जब मर जाता है,
जब खाल मोटी होकर ढाल बन जाती है,
हल्का सा कचोका तो दूर, आदमी गहरे वार
बेशर्मी से हँसकर सह जाता है,
जब उसका हर आदर्श दुनिया के साथ
चलने की शर्त में ढल जाता है
जब सुख सुविधा और संपदा उसके पांव चूमते हैं
वह मज़े से खाता-पीता और सोता है
तब यही होता है:  सिर्फ
कि वह मर जाता है!

वह जानता नहीं, लेकिन
अपने कंधों पर अपना शव
आप ढोता है।
                         

 
मुक्तिबोध की कविताएं  - गजानन माधव मुक्तिबोध | Gajanan Madhav Muktibodh
यहाँ मुक्तिबोध के कुछ कवितांश प्रकाशित किए गए हैं। हमें विश्वास है पाठकों को रूचिकर व पठनीय लगेंगे।

 
सजनवा के गाँव चले  - आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)
सूरज उगे या शाम ढले,
मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।

सपनों की रंगीन दुनियाँ लिये,
प्यासे उर में वसन्ती तमन्ना लिये।
मेरे हँसते अधर, मेरे बढ़ते कदम,
अश्रुओं की सजीली सी लड़ियाँ लिये।

कोई हँसे या कोई जले,
मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।

आज पहला मिलन है अनोंखा मिलन,
धीर धूलि हुआ, जाने कैसी लगन।
रात होने लगी, साँस खोने लगी,
चाँद तारे चमकते बहकते नयन।

कोई मिले या कोई छले,
मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।

दो हृदय का मिलन बन गया अब रुदन,
हैं बिलखते हृदय तो बरसते नयन।
आत्मा तो मिली जा प्रखर तेज से,
है यहाँ पर बिरह तो, वहाँ पर मिलन।

श्रेय मिले या प्रेय मिले,
मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।

दुलहन आत्मा चल पड़ी देह से,
दो नयन मिल गये जा परम गेह से।
माँ की ममता लिये देह रोती रही,
मग भिगोती रही प्यार के मेह से।

ममता हँसे या आँसू झरे,
मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।

-आनन्द विश्वास

 
मैंने जाने गीत बिरह के  - आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)
मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है,
कदम-कदम पर मिली विवशता, साँसों में विश्वास नहीं है।
छल से छला गया है जीवन,
आजीवन का था समझौता।
लहरों ने पतवार छीन ली,
नैया जाती खाती गोता।
किस सागर जा करूँ याचना, अब अधरों पर प्यास नहीं है,
मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है।

मेरे सीमित वातायन में,
अनजाने किया बसेरा।
प्रेम-भाव का दिया जलाया,
आज बुझा, कर दिया अंधेरा।
कितने सागर बह-बह निकलें, आँखों को एहसास नहीं है,
मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है।

मरुथल में बहतीं दो नदियाँ,
कब तक प्यासा उर सींचेंगीं।
सागर से मिलने को आतुर,
दर-दर पर कब तक भटकेंगीं।
तूफानों से लड़-लड़ जी लूँ, इतनी तो अब साँस नहीं है,
मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है।

विश्वासों की लाश लिये मैं,
कब तक सपनों के संग खेलूँ।
सोई-सोई सी प्रतिमा को,
सत्य समझ कब तक मैं बहलूँ।
मिथ्या जग में सच हों सपने, मुझको यह एहसास नहीं है,
मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है।

- आनन्द विश्वास

 
नानी वाली कथा-कहानी  - आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)
नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुई पुरानी।
बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी।
बेटी-युग में बेटा-बेटी,
सभी पढ़ेंगे, सभी बढ़ेंगे।
फौलादी ले नेक इरादे,
खुद अपना इतिहास गढ़ेंगे।
देश पढ़ेगा, देश बढ़ेगा, दौड़ेगी अब, तरुण जवानी।
नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुईं पुरानी।
बेटा शिक्षित, आधी शिक्षा,
दोनों शिक्षित पूरी शिक्षा।
हमने सोचा,मनन करो तुम,
सोचो समझो करो समीक्षा।
सारा जग शिक्षामय करना,हमने सोचा मन में ठानी।
नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुईं पुरानी।
अब कोई ना अनपढ़ होगा,
सबके हाथों पुस्तक होगी।
ज्ञान-गंग की पावन धारा,
सबके आँगन तक पहुँचेगी।
पुस्तक और कलम की शक्ति,जग जाहिर जानी पहचानी।
नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुईं पुरानी।
बेटी-युग सम्मान-पर्व है,
पुर्ण्य-पर्व है, ज्ञान-पर्व है।
सब सबका सम्मान करे तो,
जन-जन का उत्थान-पर्व है।
सोने की चिड़िया तब बोले,बेटी-युग की हवा सुहानी।
नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुई पुरानी।
बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी।

- आनन्द विश्वास

 
होली की रात | Jaishankar Prasad Holi Night Poetry  - जयशंकर प्रसाद | Jaishankar Prasad

बरसते हो तारों के फूल
छिपे तुम नील पटी में कौन?
उड़ रही है सौरभ की धूल
कोकिला कैसे रहती मीन।

चाँदनी धुली हुई हैं आज
बिछलते है तितली के पंख।
सम्हलकर, मिलकर बजते साज
मधुर उठती हैं तान असंख।

 
महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति  - केदारनाथ अग्रवाल | Kedarnath Agarwal
महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति

कवि! वह कविता जिसे छोड़ कर
चले गए तुम, अब वह सरिता
काट रही है प्रान्त-प्रान्त की
दुर्दम कुण्ठा--जड़ मति-कारा
मुक्त देश के नवोन्मेष के
जनमानस की होकर धारा।

काल जहाँ तक प्रवहमान है
और जहाँ तक दिक-प्रमान है
गए जहाँ तक वाल्मीकि हैं
गए जहाँ तक कालिदास हैं
वहाँ-दूर तक प्रवहमान है
आँसू-आह-गीत की धारा
तुमने जिसको आयुदान दी
और जिसका रूप सँवारा।
आज तुम्हारा जन्म-दिवस है
कवि, यह भारत चिरकृतज्ञ है।

 
क्योंकि सपना है अभी भी  - धर्मवीर भारती | Dhramvir Bharti
...क्योंकि सपना है अभी भी
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी

 
आज भी खड़ी वो...  - सपना सिंह ( सोनश्री )

निराला की कविता, 'तोड़ती पत्थर' को सपना सिंह (सोनश्री) आज के परिवेश में कुछ इस तरह से देखती हैं:

 

आज भी खड़ी वो...

तोडती पत्थर,

 
छवि नहीं बनती  - सपना सिंह ( सोनश्री )

निराला पर सपना सिंह (सोनश्री) की कविता

 

निराला जी, निराले थे

 
लोग क्या से क्या न जाने हो गए | ग़ज़ल  - डॉ शम्भुनाथ तिवारी
लोग क्या से क्या न जाने हो गए
आजकल अपने बेगाने हो गए

बेसबब ही रहगुज़र में छोड़ना
दोस्ती के आज माने हो गए

आदमी टुकडों में इतने बँट चुका
सोचिए कितने घराने हो गए

वक्त ने की किसकदर तब्दीलियाँ
जो हकीकत थे फसाने हो गए

 
बिला वजह आँखों के कोर भिगोना क्या | ग़ज़ल  - डॉ शम्भुनाथ तिवारी
बिला वजह आँखों के कोर भिगोना क्या
अपनी नाकामी का रोना रोना क्या

बेहतर है कि समझें नब्ज़ ज़माने की
वक़्त गया फिर पछताने से होना क्या

भाईचारा -प्यार मुहब्बत नहीं अगर
तब रिश्ते नातों को लेकर ढोना क्या

जिसने जान लिया की दुनिया फ़ानी है
उसे फूल या काटों भरा बिछौना क्या

क़ातिल को भी क़ातिल लोग नहीं कहते
ऐसे लोगों का भी होना होना क्या

मज़हब ही जिसकी दरवेश- फक़ीरी है
उसकी नज़रों में क्या मिट्टी सोना क्या

जहाँ न कोई भी अपना हमदर्द मिले
उस नगरी में रोकर आँखें खोना क्या

मुफ़लिस जिसे बनाकर छोड़ा गर्दिश ने
उस बेचारे का जगना भी सोना क्या

फिक्र जिसे लग जाती उसकी मत पूछो
उसको जंतर-मंतर जादू- टोना क्या

 
नहीं कुछ भी बताना चाहता है | ग़ज़ल  - डॉ शम्भुनाथ तिवारी
नहीं कुछ भी बताना चाहता है
भला वह क्या छुपाना चाहता है

तिज़ारत की है जिसने आँसुओं की
वही ख़ुद मुस्कुराना चाहता है

 
परिंदे की बेज़ुबानी  - डॉ शम्भुनाथ तिवारी
बड़ी ग़मनाक दिल छूती परिंदे की कहानी है!

 
नहीं है आदमी की अब | हज़ल  - डॉ शम्भुनाथ तिवारी
नहीं है आदमी की अब कोई पहचान दिल्ली में
मिली है धूल में कितनों की ऊँची शान दिल्ली में

 
हौसले मिटते नहीं  - डॉ शम्भुनाथ तिवारी
हौसले मिटते नहीं अरमाँ बिखर जाने के बाद
मंजिलें मिलती है कब तूफां से डर जाने के बाद

 
कौन यहाँ खुशहाल बिरादर  - डॉ शम्भुनाथ तिवारी
कौन यहाँ खुशहाल बिरादर
बद-से-बदतर हाल बिरादर

 
उलझे धागों को सुलझाना  - डॉ शम्भुनाथ तिवारी
उलझे धागों को सुलझाना मुश्किल है
नफरतवाली आग बुझाना मुश्किल है

 
कलम गहो हाथों में साथी  - हरिहर झा | Harihar Jha
कलम गहो हाथों में साथी
शस्त्र हजारों छोड़

 
लिखना बाकी है  - हरिहर झा | Harihar Jha

 
मण्डी बनाया विश्व को  - हरिहर झा | Harihar Jha
लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।

 
मदिरा ढलने पर | कविता  - हरिहर झा | Harihar Jha
 

 
दीवाली का सामान  - भारत-दर्शन संकलन | Collections
हर इक मकां में जला फिर दिया दिवाली का

 
ज्ञानप्रकाश विवेक की ग़ज़लें  - ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek
प्रस्तुत हैं ज्ञानप्रकाश विवेक की ग़ज़लें !

 
हम भी काट रहे बनवास  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
हम भी काट रहे बनवास
जावेंगे अयोध्या नहीं आस

 
बाबा | हास्य कविता  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
दूर बस्ती से बाहर

 
उसे कुछ मिला, नहीं !  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
कूड़े के ढेर से

 
संवाद | कविता  - रोहित कुमार 'हैप्पी'
"अब तो भाजपा की सरकार आ गई ।"
मैंने उस गुमसुम रिक्शा वाले से संवाद स्थापित किया ।

 
बहुत वासनाओं पर मन से - गीतांजलि  - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
बहुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर,
तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर ।
संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।

 

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