राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी।

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प्रकृति के अंचल में


"कर्म में तेरा अधिकार है, फल में नहीं" --इसे मनुष्य गाता रहा किंतु तरु निभाता रहा।

 

*


झुके हुए आम्र ने कहा -- फल देने के लिए होता है, अपने लिए नहीं।

 

*


जो फल लिए जाते हैं, वे खट्टे होते हैं। मिठास उनमें होता है जो दिए जाते हैं।

- मुनि नथमल

 

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