वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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यथार्थ

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 रीता कौशल

आँखें बरबस भर आती हैं,
जब मन भूत के गलियारों में विचरता है ।
सोच उलझ जाती है रिश्तों के ताने-बाने में,
एक नासूर सा इस दिल में उतरता है ।

भीड़ में अकेलेपन का अहसास दिल को खलता है,
जीवन की भुल-भुलैया में अस्तित्व खोया सा लगता है ।
अपनों के बेगाने होने का दर्द हरदम टीसता है,
शून्य में खो जाने का हर क्षण अंदेशा रहता है ।

मगर नादान मन त् क्यों नहीं समझता,
जीबन में सबको कामधेन्,कल्पतरु
पारसमणि और अमृत नहीं मिलता ।

- रीता कौशल, ऑस्ट्रेलिया
PO Box: 48 Mosman Park
WA-6912 Australia
Ph: +61-402653495
E-mail: rita210711@gmail.com

 

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