जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।

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दोहावली - 1

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 तुलसीदास | Tulsidas

श्रीसीतारामाभ्यां नम:

ध्यान

राम बाम दिसि जानकी लखन दाहिनी ओर ।
ध्यान सकल कल्यानमय सुरतरु तुलसी तोर ॥

सीता लखन समेत प्रभु सोहत तुलसीदास ।
हरषत सुर बरषत सुमन सगुन सुमंगल बास ॥

पंचबटी बट बिटप तर सीता लखन समेत ।
सोहत तुलसीदास प्रभु सकल सुमंगल देत ॥


राम-नाम-जपकी महिमा

चित्रकूट सब दिन बसत प्रभु सिय लखन समेत ।
राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत ॥

पय अहार फल खाइ जपु राम नाम षट मास ।
सकल सुमंगल सिद्धि सब करतल तुलसीदास ॥

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।
तुलसी भीतर बाहरेहुँ जौं चाहसि उजियार ॥

हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन रसना राम सुनाम ।
मनहुँ पुरट संपुट लसत तुलसी ललित ललाम ॥

सगुन ध्यान रुचि सरस नहिं निर्गुन मन ते दूरि ।
तुलसी सुमिरहु रामको नाम सजीवन मूरि ॥

एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ ॥

नाम राम को अंक है सब साधन हैं सून ।
अंक गएँ कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून ॥

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु ।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु ॥

राम नाम जपि जीहँ जन भए सुकृत सुखसालि ।
तुलसी इहाँ जो आलसी गयो आजु की कालि ॥

नाम गरीबनिवाज को राज देत जन जानि ।
तुलसी मन परिहरत नहिं घुर बिनिआ की बानि ॥

कासीं बिधि बसि तनु तजें हठि तनु तजें प्रयाग ।
तुलसी जो फल सो सुलभ राम नाम अनुराग ॥

मीठो अरु कठवति भरो रौंताई अरु छैम ।
स्वारथ परमारथ सुलभ राम नाम के प्रेम ॥

राम नाम सुमिरत सुजस भाजन भए कुजाति ।
कुतरुक सुरपुर राजमग लहत भुवन बिख्याति ॥

स्वारथ सुख सपनेहुँ अगम परमारथ न प्रबेस ।
राम नाम सुमिरत मिटहिं तुलसी कठिन कलेस ॥

मोर मोर सब कहँ कहसि तू को कहु निज नाम ।
कै चुप साधहि सुनि समुझि कै तुलसी जपु राम ॥

हम लखि लखहि हमार लखि हम हमार के बीच ।
तुलसी अलखहि का लखहि राम नाम जप नीच ॥

राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस ।
बरषत बारिद बूँद गहि चाहत चढ़न अकास ॥

तुलसी हठि हठि कहत नित चित सुनि हित करि मानि ।
लाभ राम सुमिरन बड़ो बड़ी बिसारें हानि ॥

बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु ।
होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु ॥


प्रीति प्रतीति सुरीति सों राम राम जपु राम ।
तुलसी तेरो है भलो आदि मध्य परिनाम ॥

दंपति रस रसना दसन परिजन बदन सुगेह ।
तुलसी हर हित बरन सिसु संपति सहज सनेह ॥

बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास ।
रामनाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥

 

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