यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।

पुरखों की पुण्य धरोहर

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi

जो फूल चमन पर संकट देख रहा सोता
मिट्टी उस को जीवन-भर क्षमा नहीं करती ।

थोड़ा-सा अंधियारा भी उसको काफी है
जो दीप विभाजित मन से शस्त्र उठाता है
जिनके घर मतभेदों पर सुमन नहीं चढ़ते
अंधड उनके आगे आते घबराता है ।
तूफान देख जिसने दरवाजे बंद किए
आधी उसके घर आते हुए नहीं डरती ।

करना चाहे इंसान मगर वह हो न सके
इतना मुश्किल कोई भी काम नहीं होता,
जब तक पतझर अपने घर लौट नहीं जाते
चौकस रहना तब तक विश्राम नहीं होता ।
जो दुष्ट बवंडर को ललकार नहीं सकता
उसकी नौका धारा के पार नहीं तरती ।

दुनिया में कोई अधिक देश से बड़ा नहीं,
धरती पुरखों की पुण्य धरोहर होती है
रहता हो चाहे कहीं नहीं अंतर आता
हर व्यक्ति उसी माला का सच्चा मोती है ।
जो काम देश के आया नहीं मुसीबत में
कहते भी पुत्र उसे शरमाती है धरती ।

- रामावतार त्यागी

 

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