राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी।

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गांधी को श्रद्धांजलि

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 भारत-दर्शन संकलन | Collections

30 जनवरी 1948 के सूर्यास्त के साथ पंडित नेहरु को लगा कि हमारे जीवन से प्रकाश चला गया है। चारों ओर अंधकार व्याप्त है। लेकिन दूसरे ही क्षण सत्य प्रकट हुआ और नेहरु ने कहा "मेरा कहना गलत है, हजारों वर्षों के अंत होने तक यह प्रकाश दिखता ही रहेगा और अनगिनत लोगों को सांत्वना देता रहेगा।"

सरदार पटेल ने कहा "आज का दिन हमारे लिए शर्म, ग्लानि और दु:ख से भरा है। जिस पागल युवक ने यह सोचकर बापू की हत्या की होगी कि उसके इस कार्य से गांधीजी के उदात्त कार्य रुक जाएँगे, तो उसकी यह मान्यता पूरी तरह से गलत साबित होगी। गांधीजी हमारे हृदय में जीवित हैं और उनके अमर वचन हमें सदैव राह दिखाते रहेंगे।"

विश्व के कोने-कोने से श्रद्धांजलि आने लगी।

ब्रिटिश सम्राट, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली, पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल, फ्रांस के प्रधानमंत्री दविदोल, स्टेफर्ड क्रिप्स, जनरल स्मट्स और प्रसिद्ध उपन्यासकार पर्ल बक ने श्रद्धांजलि दी। अनेक देशों के कई अज्ञात व्यक्तियों ने एक दिन का उपवास रखकर श्रद्धांजलि देना तय किया।

फ्रांस के समाजवादी नेता लियो ब्लूम ने सामान्य विश्व नागरिक की भावनाओं को अपने शब्दों में प्रस्तुत किया "मैंने गांधी को देखा नहीं था, मुझे उनकी भाषा नहीं आती, मैंने उनके देश में कदम भी नहीं रखा है, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मानो कोई अत्यंत करीबी रिश्तेदार को खोया है।"

संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने शोक संदेश में कहा "गांधीजी गरीब से गरीब, निराश्रित और सर्वहारा वर्गों के सहारा थे।"

ब्रिटिश नाटककार जार्ज बर्नाड शॉ ने अपनी बात व्यंग्यात्मक रूप से कही "संसार में ‘अच्छा' आदमी बनना कितना खतरनाक है!"

पाकिस्तान से मोहम्मद अली जिन्ना ने इस समय भी अपनी चिर-परिचित शैली में कहा "गांधीजी हिंदू जाति के महान लोगों में से एक थे।"

महात्मा गांधी की मृतदेह के समीप गायी जाने वाली सर्वधर्म प्रार्थना के दो अंश उनके जीवन और मृत्यु के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर रहे थे।

अलीगढ़ के ख्वाजा अब्दुल मजीद ने कुरान-ए-शरीफ की आयतें पढ़ीं- "हे ईमानदारों, सब्र और खामोशी के साथ खुदा की मदद माँगो, खुदा की इबादत करते हुए मरने वाले को मरा हुआ न समझो। वे जिंदा हैं, जिसे आप नहीं समझ सकते। वक्त से पहले और खुदा की मर्जी के बगैर कोई नहीं मर सकता।"
हिंदू धर्म ग्रंथ गीता में भी यही बात कही गई है कि हर प्राणी जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। अत: इसका दु:ख नहीं मनाना चाहिए।

गांधीजी ने कहा था "हमारी प्रजा सदियों से गुलामी में सड़ रही है, इस सड़ाँध से उपजने वाली गंदगी आज हमारे सामने बिखरी पड़ी है, जिसे हमें साफ करना है। इसके लिए पूरा जीवन भी कम है। हमारी शिक्षा यदि अलग तरीके से हुई होती, तो हम यूँ हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे होते। जब तक हम अपने काम से निराश हुए बिना उसमें पूरी तरह से लिप्त रहेंगे, तभी हमारा संघर्ष हमें नए युग के भारत में ले जाएगा।"

मेरा जीवन, मेरी वाणी बाकी सभी तो केवल है पानी।
जिसमें सत्य की जय-जयकार, मेरा जीवन वही निशानी।।

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