जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।

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प्रभु ईसा

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt

मूर्तिमती जिनकी विभूतियाँ
जागरूक हैं त्रिभुवन में;
मेरे राम छिपे बैठे हैं
मेरे छोटे-से मन में;

धन्य-धन्य हम जिनके कारण
लिया आप हरि ने अवतार;
किन्तु त्रिवार धन्य वे जिनको
दिया एक प्रिय पुत्र उदार;

हुए कुमारी कुन्ती के ज्यों
वीर कर्ण दानी मानी;
माँ मरियम के ईश हुए त्यों
धर्मरूप वर बलिदानी;

अपना ऐसा रक्त मांस सब
और गात्र था ईसा का;
पर जो अपना परम पिता है
पिता मात्र था ईसा का।

मैथिलीशरण गुप्त
[विशाल भारत]

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