वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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सीता का हरण होगा (काव्य) 
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रचनाकार: उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

कब तक यूं बहारों में पतझड़ का चलन होगा?
कलियों की चिता होगी, फूलों का हवन होगा ।

हर धर्म की रामायण युग-युग से ये कहती है,
सोने का हरिण लोगे, सीता का हरण होगा ।

जब प्यार किसी दिल का पूजा में बदल जाए,
हर पल आरती होगी, हर शब्द भजन होगा ।

जीने की कला हम ने सीखी है शहीदों से,
होठों पे ग़ज़ल होगी जब सिर पे कफन होगा ।

इस रूप की बस्ती में क्या माल खरीदोगे?
पत्थर के हृदय होंगे, फूलों का बदन होगा ।

यमुना के किनारे पर जो दीप भी जलता है,
वो और नही कुछ भी, राधा का नयन होगा ।

जीवन के अँधेरे में हिम्मत न कभी हारो,
हर रात की मुट्ठी में सूरज का रतन होगा ।

सत्ता के लिए जिन का ईमान बिकाऊ है,
उन के ही गुनाहों से भारत का पतन होगा ।

मज़दूर के माथे का कहता है पसीना भी,
महलों में प्रलय होगी, कुटिया में जशन होगा ।

इस देश की लक्ष्मी को लूटेगा कोई कैसे?
जब शत्रु की छाती पर अंगद का चरण होगा ।

विज्ञान के भक्तों को अब कौन ये समझाए,
वरदानों से अपने ही दशरथ का मरण होगा ।

कहना है सितारों का, अब दूर नहीं वो दिन,
कुछ ऊँची धरा होगी, कुछ नीचे गगन होगा ।

इन्सान की सूरत में जब भेडिये फिरते हों,
फिर 'हंस' कहो कैसे दुनिया में अमन होगा?

- उदयभानु 'हंस', राजकवि हरियाणा
  [साभार-दर्द की बांसुरी [ग़ज़ल संग्रह]

 

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