शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है। - शिवप्रसाद सितारेहिंद।

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रैदास के पद  (काव्य) 
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रचनाकार: रैदास | Ravidas

अब कैसे छूटे राम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै 'रैदासा'॥

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Posted By Surender Pal Bhatia Nastic(SPBN)   on Friday, 02-Oct-2015-08:32
शब्दस ऑफ़ जगत गुरु रविदास जी
Posted By vikram sahu   on Friday, 11-Oct-2013-06:10
ऐसे महान भक्त भारतीय साहित्य में अनुपम हैं. .......... बारम्बार नमन हमारा .................

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