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चीन्हे किए अचीन्हे कितने | गीतांजलि

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

हुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर,
तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर ।
संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।

अनमाँगे जो मुझे दिया है
जोत गगन तन प्राण हिया है
चीन्हे किए अचीन्हे कितने

घर कितने ही घर को;
किया दूर को निकट, बंधु,
अपने भाई-सा पर को।

छोड़ निवास पुराना जब मैं जाता
जानें क्या हो, यही सोच घबराता,
किन्तु पुरातन तुम हो नित नूतन में
यही सत्य मैं जाता बिसर-बिसर जो ।
किया दूर को निकट, बंधु,
अपने भाई-सा पर को।

जीवन और मरण में निखिल भुवन में
जब भी, जहां कहीं भी अपना लोगे,
जनम-जनम के ऐ जाने-पहचाने,
तुम्ही मुझे सबसे परिचित कर दोगे ।

तुम्हें जान लूं तो न रहे कोई पर,
मना न कोई और नहीं कोई डर-
तुम सबके सम्मिलित रूप में जागे
मुझे तुम्हारा दरस सदा प्रभुवर हो ।
किया दूर को निकट, बंधु,
अपने भाई-सा पर को ।

-रवीन्द्रनाथ टैगोर

साभार - गीतांजलि, भारती भाषा प्रकाशन (1979 संस्करण), दिल्ली

अनुवादक - हंसकुमार तिवारी

 

Geetanjli by Rabindranath Tagore


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