राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

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ऐसे रोकें, शादी की फिजूलखर्ची

 (विविध) 
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रचनाकार:

 डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Dr Ved Pratap Vaidik

भारतीय समाज में तीन बड़े खर्चे माने जाते हैं। जनम, मरण और परण! कोई कितना ही गरीब हो, उसके दिल में हसरत रहती है कि यदि उसके यहां किसी बच्चे ने जन्म लिया हो या किसी की शादी हो या किसी बुज़ुर्ग की मृत्यु हुई हो तो वह अपने सगे-संबंधियों और मित्रों को इकट्ठा करे और उन्हें कम से कम भोजन तो करवाए। इस इच्छा को गलत कैसे कहा जाए? यह तो स्वाभाविक मानवीय इच्छा है। लेकिन यह इच्छा अक्सर बेकाबू हो जाती है। लोग अपनी चादर के बाहर पाँव पसारने लगते हैं।

नवजात शिशु के स्वागत में लोग इतना बड़ा समारोह आयोजित कर देते हैं कि वह बच्चा जन्मजात क़र्जदार बन जाता है। शादीयों में लोग इतना खर्च कर देते हैं कि आगे जाकर उनका गृहस्थ जीवन चौपट हो जाता है। मृत्यु-भोज का कर्ज़ चुकाने में ज़िंदा लोगों को तिल-तिलकर मरना होता है। यह बीमारी आजकल पहले से कई गुना बढ़ गई है। आजकल निमंत्रण-पत्रों के साथ प्रेषित तोहफ़ों पर ही लाखों रू. खर्च कर दिए जाते हैं। यह शेख़ी का जमाना है। हर आदमी अपनी तुलना अपने से ज्यादा मालदार लोगों से करने लगता है। दूसरों की देखा-देखी लोग अंधाधुंध खर्च करते हैं। इस खर्च को पूरा करने के लिए सीधे-सादे लोग या तो कर्ज़ कर लेते हैं या अपनी ज़मीन-जायदाद बेच देते हैं और तिकड़मी लोग घनघोर भ्रष्टाचार में डूब जाते हैं। येन-केन-प्रकरेण पैसा कमाने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। अगर ये सब दाव-पेच भी फेल हो जाएं तो वे लड़की वालों पर सवारी गाँठते हैं। अपनी हसरतों का बोझ वे दहेज़ के रूप में वधू-पक्ष पर थोप देते हैं।

इसी प्रकृति को क़ाबू करने के लिए सरकार का दहेज़-विरोधी प्रकोष्ठ कुछ ऐसे कानून-क़ायदे लाने की सोच रहा है, जिससे शादियों की फिजूलखर्ची पर रोक लग सके। एक सुझाव यह भी है कि लोगों की आमदनी और शादी के खर्चे का अनुपात तय कर दें। यह सुझाव बिल्कुल बेकार सिद्ध होगा, जैसा कि चुनाव-खर्च का होता है। हॉं, अतिथियों की संख्या जरूर सीमित की जा सकती है और परोसे जानेवाले व्यंजनों की भी। इस प्रावधान का कुछ असर जरूर होगा लेकिन सबसे ज्यादा असर इस कदम का होगा कि जहां भी क़ानून के विरूद्ध लाखों-करोड़ों का खर्च दिखे, सरकार वहीं शादी के मौके पर छापा मार दे। वर-वधू के रिश्तेदारों को गिरफ्तार कर ले और उनसे हिसाब माँगें कि वे यह पैसा कहां से लाए। देश में अगर ऐसे दर्जन भर छापे भी पड़ जाएं तो शेष फ़िजूलख़र्च लोगों के पसीने छूट जाएँगे।


[email protected]
फरवरी 2012
ए-19, प्रेस एनक्लेव, नई दिल्ली-17,
फोन (निवास) 2651-7295, मो. 98-9171-1947

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समाज को कुरीतियों का कोढ़ लगा है और हम हाथ पर हाथ धरे मूक दर्शक बने बैठे हैं? डा वैदिक ने इस ज्वलंत समस्या पर अपने विचार और सुझाव रखे हैं।

क्या आप डॉ. वेदप्रताप वैदिक के विचारों व उनके सुझावों से सहमत हैं? क्या आप इस बारे में कुछ कहना चाहते हैं?

क्या आप के पास इस समस्या का कोई समाधान है? क्या अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में फंसे और पंगु होते समाज को आप कोई समाधान सुझा पाएंगे?

क्या आप आज के इस परिवेश, सामाजिक ढांचे और जीवन में परिवर्तन चाहते हैं? क्या किया जाए?

अपने विचार केवल तभी दें यदि आप का कर्म उनसे मेल खाता हो - हाथी दांत वाले लोग कृपया क्षमा करें!


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