वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

Find Us On:

English Hindi
Loading

ओछी मानसिकता - मीरा जैन

 (कथा-कहानी) 
 
रचनाकार:

 भारत-दर्शन संकलन | Collections

ढेर सारे माटी के दीयों को देखते ही सावित्री पति पर बरस पड़ी, ‘दीपावली में वैसे ही मुझे घर के काम से फुर्सत नहीं है और ऊपर से ये ढेर सारे दीये उठा लाए। अपनी इस ओछी मानसिकता को त्याग दो कि ज्यादा दीपक जलाने से ज्यादा लक्ष्मी आएगी। अरे, जितना किस्मत में होगा उतना ही मिलेगा। मैं आखिर कब तक खटती फिरूं?'

इसपर पति ने शांत लहजे में उत्तर देते हुए कहा, 'अरी भाग्यवान! बेवजह क्यों चीख रही हो। तुम्हारी जितनी इच्छा हो उतने ही दीपक लगाना। मैं तो इसलिए ख़रीद लाया कि दीपक बेचने वाले के घर में आज के दिन ज्यादा नहीं तो कम से कम दो दीपक तो जलें।'

पति के मुख से निकले शब्दों को सुन सावित्री को लगा कि उसके द्वारा अभी-अभी पति के लिए प्रयुक्त ‘ओछी मानसिकता' शब्द अनायास ही ‘व्यापक मानसिकता' में तब्दील हो गया है। वह गुस्सा भूल कर उन माटी के दीयों को सहेजकर सुरक्षित स्थान पर रखने लगी।

-मीरा जैन, भारत
 साभार - 'अक्षर'

 

Back

 

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश