हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।

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पुष्प की अभिलाषा | माखनलाल चतुर्वेदी की कविता

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 म‌ाखनलाल चतुर्वेदी

चाह नहीं मैं सुरबाला के,
गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं प्रेमी-माला में,
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं, सम्राटों के शव,
पर, हे हरि, डाला जाऊँ

चाह नहीं, देवों के शिर पर,
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!

मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जाएँ वीर अनेक।

 

 

इस रचना को सुनिए (You may listen, 'Pushp Ki Abhilasha' here)-

साभार - यू ट्यूब

'Pushp Ki Abhilasha' - A poem by Makhanlal Chaturvedi

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Posted By uday   on Wednesday, 01-Jul-2015-07:36
Very nice

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