हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं। - महात्मा गांधी।

सरोज रानियाँ

 (कथा-कहानी) 
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रचनाकार:

 डॉ. वंदना मुकेश | इंग्लैंड

क्लास में घुस ही रही थी कि मिसेज़ चैडवेल की आवाज़ से मेरे चाबी ढूँढते हाथ अनजाने ही सहम गए।

"दैट्स हाऊ वी टीच! इफ़ यू डोंट लाईक, यू मे गो टू अदर क्लास!"

एक सन्नाटा छा गया। मैं अब तक हाथ में चाबी भींचें थीं। फिर किसी के चलने की आवाज आई, मैंने चाबी जेब से बाहर निकालकर 'की-होल' में डाल दी। वह आवाज़ भी पास आ गई तो मैंने मुड़कर देखा। एक पचपन-साठ के लगभग, साधारण कद-काठीवाली औरत लंबा जैकेट पहने मेरे एकदम पास से निकल गई। उसी के पीछे-पीछे सिर झुकाए सलवार कमीज पहने एक नवयौवना चली गई।

अगले दिन क्लास शुरु होने के पहले बोर्ड पर तारीख़ ही लिख रही थी कि दरवाज़े को किसी ने धीमी-से खटखटाया। मैंने कहा, 'प्लीज़ कम इन।'

मैंने पलटकर देखा, तो वही कलवाली लड़की सिर झुकाए खड़ी थी। मैंने कहा, "बोलिये,क्या बात है?"

"मैडम, मैं इंग्लिश बोलना सीखना चाहती हूँ। मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ। क्या मैं आपकी क्लास में आ सकती हूँ?" वह सकुचाते हुए सिर झुकाए ही बोली।

मैंने कहा, "क्यों नहीं, जरूर। पर आप तो मिसेज चैडवेल की क्लास में हैं न?"

लड़की ने अब चेहरा उठाया, चेहरा क्या था किसी कलाकार की सुंदरतम कृति मेरे सामने साक्षात खड़ी थी। सहमी हुई कातर दृष्टि!  हिरणी-सी कटीली, पनीली, बोलती हुई, जानदार आँखें। गोरा खिला हुआ रंग, चेहरे पर एक अजीब किस्म का आकर्षक ठहराव। पतली-दुबली। मेरी आँखों के सम्मुख, सीता, सावित्री शकुंतला सब एक साथ घूम गई। क्या वे ऐसी दिखती होंगी? वह वास्तव में सुंदरता की मूरत थी। उसके सारे निरीक्षण में तीस सेकेंड से भी कम का समय लगा। उम्र लगभग तेईस, मेरी अपनी बेटी के बराबर।

मैंने तुरंत उसे सामने बैठने का इशारा किया। मानो, मैं उसे खोना नहीं चाहती थी। मेरे हाँ कहते ही उसके चेहरे का तनाव भी कम हो गया। फार्म भरते हुए पता लगा कि वह दो साल पहले शादी के बाद यहाँ आई है। यहाँ घर में सास-ससुर पति और एक देवर के साथ रहती है। मुझे अच्छा लगा कि उसकी सास उसे पढ़ने भेज रही हैं। उसने यह भी बताया कि उसके पति का परिवार यहाँ पैंतीस सालों से है। उसके पति और देवर यहीं की पैदाइश हैं। वे पढ़े लिखे भी यहीं हैं। वह मेरी क्लास में आने लगी। सरोज नाम था उसका। काफ़ी ज़हीन थी, उसने पहली परीक्षा पहले तीन महीनों में ही कर ली।

वह ठीक एक बजने में पाँच मिनिट पर आती और तीन बजे क्लास खत्म होते ही सबसे पहले निकल जाती। उसे लेने के लिये वही महिला आती थी, जिसके साथ मैंने पहले दिन देखा था।

सरोज सामान्यतः शांत रहती थी, गंभीर प्रकृति की थी। कभी किसी बात पर उसकी आँखें हँस पड़ती तो मुझे बहुत खुशी होती।

रोज़मर्रा की जिंदगी की विभिन्न परिस्थितियों में हमारे विद्यार्थी बोलचाल की अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग कर सकें या लिख-पढ़ सकें, कुछ इसी तरह के विषयों पर आधारित होती थी हमारी दो घंटों की क्लास। डॉक्टर के यहाँ पंजीकरण कैसे करना, बैंक, पोस्ट-ऑफिस में क्या बात करना, खरीददीरी से संबंधित शब्दावली 'सोशल सर्विसेज़' आदि विषयों पर जानकारी आपातकालीन सेवाओं के महत्वपूर्ण नंबर आदि विषयों की जानकारी से  विद्यार्थियों का इंगलैंड के जीवन से परिचित कराता था। इसी के साथ-साथ इन परिस्थितियों में अंग्रेज़ी भाषा के अभ्यास से इन विद्यार्थियों का आत्मविश्वास भी बढ़ता था।

मैंने महसूस किया कि सरोज का चेहरा कुछ निस्तेज-सा लगने लगा था। मैने सोचा, नई शादी हुई है, संभवतः गर्भवती हो। एक दिन वह कुछ जल्दी आ गई, मैं पढ़ाने की तैयारी कर रही थी।

मैंने उसे पूछा, "कैसी हो सरोज, आजकल बहुत सुस्त नज़र आ रही हो, कहीं प्रेगनेंट तो नहीं हो?"

उसकी आँखों में एक क्षण के लिये एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आई, लेकिन बोली कुछ नहीं।

मैंने फिर उकसाया, "शरमाओ नहीं, तुम्हारी उम्र की ही मेरी बेटी भी है।"

शायद इस बात से उसे कुछ तसल्ली मिली। बोली, "मुझे ऐसा कुछ नहीं होगा!"

उसके स्वर की कड़वाहट से मैं सन्न रह गई। लेकिन तभी अन्य लोगों के आने से वह एकदम सजग होकर बैग में से किताब निकालने लगी। मैं भी चुप तो हो गई लेकिन उसकी बात से मेरे मन में अनेक प्रश्न उतराने लगे। फिर सप्ताह निकल गया, कोई बात न हो सकी।

इधर दूसरी महिलाओं से मुझे पता चला कि उसे क्लास के अलावा कहीं जाने की इजाज़त नहीं है। वह औरत जो रोज़ क्लास खत्म होने से पहले ही आ जाती है, वह इसकी सास की सहेली है, जो स्कूल में सफाई का काम करती है।

फिर एक दिन वह जल्दी आ गई। उसका उतरा चेहरा देख कर मेरा दिल किया कि उसे अपने सीने से लगा कर पुचकारूँ और पूछूँ कि क्या बात है। लेकिन ऊपरी तौर पर मैंने उसके हालचाल भर पूछे। वह मेरी टेबल के पास आकर खड़ी हो गई।

मैंने पूछा, तबीयत तो ठीक है सरोज?

"जी।" वह बोली।

मैंने पूछा, खुश तो हो न यहाँ। कैसे हैं तुम्हारी ससुराल वाले, तुम्हारा ख्याल रखते हैं न?

जी, उसने सिर हिलाया।

मैंने पूछा, तुम्हारा पति कैसा है?

अचानक उसकी आँखें बहुत कुछ बोलीं, लेकिन मुँह से सिर्फ इतना निकला कि, मैडमजी, मैं सोचती थी कि अपने पति के पीछे मोटर सायकिल पर बैठूँगी, उसकी कमर में हाथ डालकर.................।

बाकी लोगों के आने से बात वहीं रह गई। मैंने बात को हल्का-फुल्का करने के इरादे से अन्य लोगों से उनके इंग्लैंड आने के अनुभव के बारे में बातचीत की। लेकिन मुझे उस लड़की के बारे में और जानने की इच्छा बढ़ने लगी। उसकी शिक्षिका होने के नाते उसकी सुरक्षा के प्रति मेरा कर्तव्य था सो मैंने उसे ट्यूटोरियल के बहाने अगली क्लास में आधा घंटा पहले आने को कहा। उसने कहा कि आप लिखकर दे दीजिये, वरना मैं नहीं आ पाऊँगी।

अगले हफ्ते वह आई ही नहीं, मेरी बेचैनी बढ़ गई। बाकी लोगों से पूछा तो शहजादी ने दबे शब्दों में बताया कि उसके घर में थोड़ी परेशानी है। मैं कुछ परेशान सी हो गई। मैंने तय कर लिया था, अगली बार आते ही उससे आवश्यक जानकारी ले लूँगी।

वह उसके अगले हफ्ते आधा घंटा पहले आ गई। उसे देखकर मुझे खुशी भी हुई और दुख भी। खुशी इसलिये कि वह तीन हफ्ते बाद क्लास में आई और दुख इसलिये कि उसकी आँखों को नीचे गहरे गढ्ढे पड़े थे, चेहरा एकदम निचुड़ा हुआ और होठ पपड़ाए। आँखें झुकी हुईं।

मैंने कहा, सरोज, मैं तुम्हें लेकर बहुत चिंतित थी, तुम मेरी बेटी की उम्र की हो, तुम्हारे मन में कोई भी बात है तो बिना डरे तुम मुझसे बात कर सकती हो।

मैडम़जी... मैं फँस.............उसका गला रूँध गया। मैंने पानी का गिलास लाकर उसे दिया और कंधे पर सांत्वना भरा हाथ रखा। मेरे हाथ रखते ही उस के मन में बँधा सैलाब आँखों से टूट निकला। क्लास शुरु होने में लगभग 20 मिनिट थे। मैं उसके सामने कुर्सी पर बैठ गई। मैं चाहती थी कि वह कुछ बोले, लेकिन उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम न ले रहे थे। मुझे उसका रोना उसके सवास्थ्य के लिये जरूरी लगा। मेरे कान दरवाज़े पर थे और मैं उसका हाथ दबाए धीरज बँधा रही थी, पर सच तो यह था कि मेरा मन उसकी कहानी जानने को बेचैन था।

".....दो साल शादी को हो गये, पति मुझे जाहिल समझता है। उसने मुझे आज तक हाथ भी नहीं लगाया। शादी का मतलब क्या होता है, मैं नहीं जान पाई हूँ।  टीचरजी, दिल करता है कि वह मुझे... कि वह मुझे......... । रात-रात भर प्ले स्टेशन खेलता है। मैंने एक दिन मना किया तो तीन-चार थप्पड़ जड़ दिये। तब से जब तब मुझ पर हाथ छोड़ देता है। सास दूसरों के सामने अलग व्यवहार करती है । अकेले में धमकाती है। कहती है कि मेरा बेटा यदि दिन को रात कहता है तो तू भी कह। मेरे पिता का देहांत हो गया तब भी जाने नहीं दिया, अगर अपनी स्थिति माँ को बता दी तो वह जीते जी मर जायेगी। तीन बहनों की शादी होनी है...। मैं क्या करूँ टीचर मैं फँस गई हूँ बुरी तरह से"..। उसने अपना मानो, हृदय खोलकर रख दिया। उसकी हालत जानकर, भीतर, मेरा हृदय ज़ार-ज़ार रो रहा था ! मैं स्तब्ध!  निःशब्द! चुपचाप!...... सिर्फ सुनती रही। 

उस दिन बाकी लोगों के आने के पहले ही वह रो कर हल्की हो चुकी थी। मुँह धोकर कॉपी खोलकर बैठ गई। मैंने उस दिन सोचा तो था कि बैंक में अकाउंट कैसे खोलते हैं यह पढ़ाऊँगी किंतु सरोज की कहानी ने मुझे भीतर तक हिला कर रख दिया था। अंतिम क्षण मैंने  अपना निर्णय बदल कर, उस दिन पारिवारिक हिंसा, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य तथा 'सोशल सर्विसेज़' के विषय में जानकारी दी। कुछ महत्त्वपूर्ण नंबर लिखवा दिये सभी को।

गर्मी की छुट्टियाँ शुरु होनेवाली थीं। दो सप्ताह और चार कक्षाएँ रह गई थीं। उस दिन के बाद सरोज मेरी कक्षा में कभी नहीं आई। मन का कोई कोना हर कक्षा में उसकी प्रतीक्षा करता। एक दो बार अन्य महिलाओं से जाने की कोशिश भी की, पर कुछ पता नहीं चला। कक्षा में सरोजरानी अकसर शहज़ादी के साथ ही बैठती थी। लेकिन शहज़ादी के जुड़वाँ बच्चे होनेवाले थे तो तीन सप्ताह से वह भी नहीं आ रही थी। कैसे पता करती।

सत्र का आखिरी दिन था। अचानक शहज़ादी अंदर आई, मेरा दिल किया कि उसे पूछूँ कि सरोज की कोई खबर है क्या। लेकिन शिष्टाचार के नाते मैंने उससे बच्चों , उसके स्वास्थ्य आदि की बात की। लेकिन फिर मेरे मन की मुराद पूरी हो गई।

 बोली, "टीचर, आपको सरोज रानी के बारे में बताना है"   

"टीचर, जब वो क्लास में नहीं आई थी न..उसके दो-तीन दिन बाद उसके घरवालों ने उसे बहुत पीटा। वह जैसे-तैसे दरवाजा खोलकर भागी और सर्जरी( दवाखाना) में पँहुच गई।  सरोज को वहाँ से शायद सोशल सर्विसेज़ वाले ले गये।" वह एक साँस में बोल गई।

"तुम्हें कैसे पता?" मैंने पूछा।

शहज़ादी ने बताया कि वह उस समय सर्जरी मैं मौज़ूद थी किंतु पुलिस वगैरह देखकर डर गई। उसने सरोज को वहाँ से जाते हुए देखा।

सरोज रानी की यह आखिरी खबर थी।

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खिड़की का काँच पोंछते हुए सीढ़ी पर मेरा संतुलन बिगड़ गया और मैं धड़ाम से गिरी। कोहनी और कलाई की हड्डियाँ टूट गईँ। फौरन घर के काम के लिये एक ऐजेंसी से संपर्क किया। नाम सुरजीत, 30 -32 साल की होगी, लाल टॉप-नीली जीन्स, मैंचिंग लाल लिप्सटिक। गोरी, साधारण नाक-नक्श, लंबी और तंदुरुस्त। घर की साफ-सफाई के लिये सुरजीत  सप्ताह में एक दिन आने लगी। वह खाना बहुत स्वादिष्ट बनाती थी और मुझे जिद कर के, बड़े प्यार से, गरमागरम रोटियाँ सेंककर खिलाती। सुरजीत वैसे शांत ही रहती थी। बात करने पर मुसकुरा कर ही जवाब देती। मैं उसके काम से खुश थी वह मुझसे।

एक दिन मैंने उसे कहा कि सुरजीत तुम क्लास में इंग्लिश सीखने आया करो। सुरजीत ने मुसकुराते हुए खिड़कियाँ साफ़ करने के लिए कपड़ा और विंडो क्लीनर की बॉटल उठा ली। क्या कहूँ मैडम, "अगर नसीब में पढ़ना-लिखना ही होता तो यहाँ शादी कर के क्यों आती, स्कूल की प्रिंसीपल न बन जाती? बस, मेरी माँ फँस गई मेरी सास के जाल में । मेरी सास मुझे देखने आई थी तो सोने के कड़े डाल गई थी शगुन में । पाँच मँहगे सलवार कमीज़ और मिठाई-चॉकलेट के तो इतने डिब्बे लाई थी कि मेरी माँ ने पूरे गाँव को ही खिलाईं।"

"तुम हिंदी तो बड़ी साफ़ बोलती हो? कहाँ की हो , पंजाब या दिल्ली?

"क्या फर्क पड़ता है मैडमजी, किस गाँव की हूँ और किस की बेटी हूँ?  क्या फर्क पड़ता है कि गाँव के सरकारी स्कूल में हिंदी पढ़ाती थी?... पिंड में बड़ी इज्ज़त थी मेरी। 2500 रु . महीना मिलता था। पर मैं खुश थी। मेरे बाप ने मेरी नौकरी लगने पर पूरे पिंड में मिठाई बाँटी थी। अब तो लोगों के टॉयलेट साफ़ करती हूँ। अच्छा हुआ बाप को यह नहीं सुनना पड़ा। उससे पहले ही भगवान उन्हें उठा लिया।.......दिल्ली एयरपोर्ट तक छोड़ने आये थे  मेरे पापाजी।" मुझे लगा, पापा बोलते हुए उसका गला रूँध गया था।

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, फिर बहुत धीरे से  कहा, "फिर क्या हुआ बताओ ना  सुरजीत"

उसने नाक सुड़की। "पापाजी बहुत खुश थे। पहली बार हवाई जहाज देखा था मैंने। मन में अजीब सा डर था, यदि कोई लेने नहीं आया तो...। पापाजी के गले लग कर खूब रोई थी मैं। पापाजी भी रो रहे थे। इंग्लैंड आने की खुशी तो शायद उतनी नहीं थी, जितना अपनो के छोड़ने का ग़म और एक अंजानी आशंका से भरा मन।

फिर अचानक सुरजीत ने अपना मन बदल लिया, अपनी कहानी को झटके से खत्म करती हुई बोली, "मैडमजी छोड़िये भी, क्यों उन हरामियों को नाम लेकर अपना दिन खराब करना, उसकी आवाज़ में क्रोध -सा झलका। वह कुछ पलों के लिये चुप हो गई। 

लेकिन उसके भीतर बहुत कुछ उबल रहा था जो बाहर आना चाहता था।.....फिर आवाज़ को संयत करते  हुए बोली, "छः साल हो गये हैं मैडमजी, शादी को। घर नहीं गई हूँ। माँ नाराज़ है। दो छोटी बहनें क्वाँरी बैठी है । माँ को पता नहीं है कि यहाँ मेरे साथ क्या हुआ। पहले फोन पर कहती थी, तू बहन नाल मुंडा ओत्थे ई क्यों नी वेख लेंदी ए। तेरा नसीब चमका,  उनके  भी चमक जाएंगे। एक-दूसरे के सुख-दुःख में काम आ जाना है एक दूसरे ने। उसे तो पता नहीं कि नसीब नहीं, मैं दूसरों के टॉयलेट-बाथरूम चमका रही हूँ।"  उसका स्वर कड़वा हो चुका था।

फिर अपनी भावनाओं पर काबू पाकर बोली, "पर मेरी चुप से उसे लगता है कि मैं बहनों की खुशी नहीं चाहती। अब क्या बताऊँ  उसे कि दो सोने के कंगन ने तेरी बेटी की जिंदगी बरबाद कर दी"।

"........अब तो यही मेरा गाँव है। बरमिंघम, और वर्किंग वीमेंस होस्टल मेरा मायका" उसने हँसने की कोशिश की।

वर्किंग वीमेंस होस्टल................. मेरे दिल की धड़कनें कुछ तेज़ सी हो गईं।

"सुनो, तुम वर्किंग वीमेंस होस्टल में रहती हो ? क्या तुम किसी सरोज को जानती हो? सरोज रानी!

"मैडमजी, मैं सबको जानती हूँ। बबली, डिंपी, हैपी, शीतल, सुक्खी, जीत, बलजिंदर..... हमारे होस्टल में रहनेवाली हर लड़की की एक ही कहानी है। हमारे साथ धोखा हुआ है। हमारी जिंदगी धोबी के कुत्ते से भी बदतर है, हम कहीं के नहीं रहे।"

फिर एकाएक वह बड़े ज़ोरों से हँसी। "सरोज रानी, हाँ मैं जानती हूँ सरोज रानी!"

"हम सब सरोज रानियाँ हैं। हा! हा! हा! हम सब सरोज रानियाँ हैं। हम सब सरोज रानियाँ हैं।" उसकी आवाज़ सारे घर में गूँजने लगी। मेरी कोहनी दर्द का दर्द अचानक बहुत बढ़ गया।

- वंदना मुकेश, यू के

[ यह कहानी विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस की अंतरराष्ट्रीय कहानी-लेखन प्रतियोगिता में यूरोप वर्ग के अंतर्गत प्रथम स्थान पर रही है।]

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