हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

तू, मत फिर मारा मारा

 (काव्य) 
Print this  
रचनाकार:

 रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

निविड़ निशा के अन्धकार में
जलता है ध्रुव तारा
अरे मूर्ख मन दिशा भूल कर
मत फिर मारा मारा--
तू, मत फिर मारा मारा।

बाधाओं से घबरा कर
तू हँसना गाना बन्द न कर
तू धीरज धर तू, साहस कर तू
तोड़ मोह की कारा--
तू, मत फिर मारा मारा।

चिर आशा रख, जीवन-बल रख
संसृति में अनुरक्ति अटल रख
सुख हो, दुख हो, तू हँसमुख रह
प्रभु का पकड़ सहारा--
तू, मत फिर मारा मारा।

-रबीन्द्रनाथ टैगोर
भावानुवाद : रघुवंशलाल गुप्त, आई सी एस, इंडियन प्रैस, प्रयाग

 

Back
 
Post Comment
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें