हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

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दीप से दीप जले

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 माखनलाल चतुर्वेदी

सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें,
कर-कंकण बज उठे, भूमि पर प्राण फलें।

लक्ष्मी खेतों फली अटल वीराने में
लक्ष्मी बँट-बँट बढ़ती आने-जाने में,
लक्ष्मी का आगमन अँधेरी रातों में
लक्ष्मी श्रम के साथ घात-प्रतिघातों में,
लक्ष्मी सर्जन हुआ
कमल के फूलों में
लक्ष्मी-पूजन सजे नवीन दुकूलों में।

गिरि, वन, नद-सागर, भू-नर्तन तेरा नित्य विहार
सतत मानवी की अंगुलियों तेरा हो शृंगार,
मानव की गति, मानव की धृति, मानव की कृति ढाल
सदा स्वेद-कण के मोती से चमके मेरा भाल,
शकट चले जलयान चले
गतिमान गगन के गान,
तू मिहनत से झर-झर पड़ती, गढ़ती नित्य विहान।

उषा महावर तुझे लगाती, संध्या शोभा वारे
रानी रजनी पल-पल दीपक से आरती उतारे,
सिर बोकर, सिर ऊँचा कर-कर, सिर हथेलियों लेकर
गान और बलिदान किए मानव-अर्चना सँजोकर,
भवन-भवन तेरा मंदिर है
स्वर है श्रम की वाणी,
राज रही है कालरात्रि को उज्ज्वल कर कल्याणी।

वह नवांत आ गए खेत से सूख गया है पानी
खेतों की बरसन कि गगन की बरसन किए पुरानी,
सजा रहे हैं फुलझड़ियों से जादू करके खेल
आज हुआ श्रम-सीकर के घर हमसे उनसे मेल।
तू ही जगत् की जय है
तू है बुद्धिमयी वरदात्री,
तू धात्री, तू भू-नव गात्री, सूझ-बूझ निर्मात्री।

युग के दीप नए मानव, मानवी ढलें,
सुलग-सुलग री जोत, दीप से दीप जलें।

-माखनलाल चतुर्वेदी

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