भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

Find Us On:

English Hindi
Loading

यूँ तो मिलना-जुलना

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 प्रगीत कुँअर | ऑस्ट्रेलिया

यूँ तो मिलना-जुलना चलता रहता है
मिलकर उनका जाना खलता रहता है

उसकी आँखों की चौखट पर एक दिया
बरसों से दिन-रात ही जलता रहता है

कितने कपड़े रखता है अलमारी में
जाने कितने रंग बदलता रहता है

सूरज को देखा है पानी में गिरते
गिरकर फिर भी रोज निकलता रहता है

यादों में रह जाते हैं फिर भी ज़िंदा
जिन लमहों को वक़्त निगलता रहता है

औरों ने रक्खा था मेरे पास कभी
मेरे भीतर दर्द जो पलता रहता है

- प्रगीत कुँअर
  सिडनी, ऑस्ट्रेलिया

Back

 

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.