देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

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उतने सूर्यास्त के उतने आसमान

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 आलोक धन्वा

उतने सूर्यास्त के उतने आसमान
उनके उतने रंग
लम्बी सड़कों पर शाम
धीरे बहुत धीरे छा रही शाम
होटलों के आसपास
खिली हुई रोशनी
लोगों की भीड़
दूर तक दिखाई देते उनके चेहरे
उनके कंधे, जानी-पहचानी आवाज़ें
कभी लिखेंगे कवि इसी देश में
इन्हें भी घटनाओं की तरह।

-आलोक धन्वा

 

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