देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो। - पं. गिरधर शर्मा।

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छोटा बांस, बड़ा बांस

 (बाल-साहित्य ) 
 
रचनाकार:

 भारत-दर्शन संकलन | Collections

एक दिन बीरबल बादशाह अकबर के साथ बाग में सैर कर रहे थे। बीरबल साथ चलते-चलते लतीफा सुना रहे थे और अकबर उसका आनंद ले रहे थे। तभी बादशाह अकबर को घास पर पड़ा एक बांस का एक टुकड़ा दिखाई दिया। बस उन्हें बीरबल की परीक्षा लेने की सूझ गई। बीरबल को बांस का वह टुकड़ा दिखाते हुए बादशाह अकबर बोले, ‘‘बीरबल! क्या तुम इस बांस के टुकड़े को बिना काटे छोटा कर सकते हो ?''

बीरबल लतीफा सुनाते-सुनाते रुक गए और अकबर की आँखों में झांक कर उनकी मंशा पढ़ने का प्रयास किया।

अकबर कुटिलता से मुस्कराए। बीरबल समझ गया कि बादशाह सलामत उनकी परीक्षा लेना चाहते हैं।

बीरबल ने इधर-उधर देखा। तभी उन्हें एक माली हाथ में लंबा बांस लेकर जाता दिखा। बीरबल ने उस माली के पास जाकर वह बांस उससे लिया। फिर बादशाह के दिखाए घास पर पड़े उस बांस के टुकड़े की बगल में माली से लिया वह लंबा बांस रख दिया।

बीरबल बोले, ‘‘हुजूर, अब देखिए! बिना काटे ही आपका दिखाया बांस छोटा हो गया।''

बड़े बांस के सामने अब वह टुकड़ा सचमुच छोटा दिखाई पड़ता था।

बादशाह अकबर निरुत्तर हो गए। फिर बीरबल की चतुराई पर मुस्करा उठे।

[भारत-दर्शन]

 

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