जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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चलो मन गंगा-जमना-तीर

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 मीराबाई | Meerabai

गंगा-जमना निरमळ पाणी सीतल होत सरीर ।
बंसी बजावत गावत कान्हो संग लियाँ बळ बीर ।।

मोर मुगट पीतांबर सोहै कुण्डळ झळकत हीर ।
मीराके प्रभु गिरधर नागर चरणकॅवलपर सीर ।।

-मीरा

 

 

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