हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

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चीरहरण

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 जैनन प्रसाद | फीजी

हँस रहे हैं आज
कई दुशासन।
द्रोपदी को निर्वस्त्र देख।
और झुके हुए हैं
गर्दन वीरों के।
सोच रहें है--
इस आधुनिक जुग में
कैसे वार करें
तीरों के।
चीखती हुई उस
अबला की पुकार
सभी को खल रहा है।
आज कृष्ण की जगह
लोगों में
दुर्योधन पल रहा है ।

-जैनन प्रसाद, फीजी

 

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