जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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प्यार !

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

प्यार! कौन सी वस्तु प्यार है? मुझे बता दो।
किस को करता कौन प्यार है ? यही दिखा दो।।

पृथ्वीतल पर भटक भटक समय गँवाया!
ढूँढा मैंने बहुत प्यार का पता न पाया ।।

यों खो कर के अपना हृदय, पाया मैंने बहुत दुख।
पर यह भी तो जाना नहीं, होता है क्या प्यार-सुख।।

-पं० रामचन्द्रजी शुक्ल 
 (सरस्वती)

 

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