जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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तुलसीदास | सोहनलाल द्विवेदी की कविता

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi

अकबर का है कहाँ आज मरकत सिंहासन?
भौम राज्य वह, उच्च भवन, चार, वंदीजन;

धूलि धूसरित ढूह खड़े हैं बनकर रजकण,
बुझा विभव वैभव प्रदीप, कैसा परिवर्तन?

महाकाल का वक्ष चीरकर, किंतु, निरंतर,
सत्य सदृश तुम अचल खड़े हो अवनीतल पर;

रामचरित मणि-रत्न-दीप गृह-गृह में भास्वर,
वितरित करता ज्योति, युगों का तम लेता हर;

आज विश्व-उर के सिंहासन में हो मंडित,
दीप्तिमान तुम अतुल तेज से, कान्ति अखंडित;

वाणी-वाणी में गंजित हो बन पावन स्वर,
आज तुम्हीं कविश्रेष्ठ अमर हो अखिल धरा पर!

- सोहनलाल द्विवेदी

 

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