देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

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जन्मभूमि

 (कथा-कहानी) 
 
रचनाकार:

 देवेन्द्र सत्यार्थी

गाड़ी हरबंसपुरा के स्टेशन पर खड़ी थी। इसे यहाँ रुके पचास घंटे से ऊपर हो चुके थे। पानी का भाव पाँच रुपये गिलास से एकदम पचास रुपये गिलास तक चढ गया और पचास रुपये हिसाब से पानी खरीदते समय लोगों को बडी नरमी से बात करनी पडती थी । वे डरते थे कि पानी का भाव और न चढ जाएे । कुछ लोग अपने दिल को तसल्ली दे रहे थे कि जो इधर हिन्दुओं पर बीत रही है वही उधर मुसलमानों पर भी बीत रही होगी, उन्हें पानी इससे सस्ते भाव पर नहीं मिल रहा होगा, उन्हें भी नानी याद आ रही होगी।

प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े मिलिटरी वाले भी तंग आ चुके थे। ये लोग सवारियों को हिंफांजत से नए देश में ले जाने के लिए जिम्मेवार थे। पर उनके लिए पानी कहाँ से लाते? उनका अपना राशन भी कम था। फिर भी बचे-खुचे बिस्कुट और मूँगफली के दाने डिब्बों में बाँटकर उन्होंने हमदर्दी जताने में कोई कसर नहीं उठा रखी थी। इस पर सवारियों में छीना-झपटी देखकर उन्हें आश्चर्य होता और वे बिना कुछ कहे-सुने परे को घूम जाते।

जैसे सवारियों के मन में यमदूतों की कल्पना उभर रही हो, और जन्म-जन्म के पाप उनकी आँखों के सामने नाच रहे हों। जैसे जन्मभूमि से प्रेम करना ही उनका सबसे बड़ा दोष हो। इसीलिए तो वे जन्मभूमि को छोड़कर भाग निकले थे। कहकहे और हँसी-ठठोले जन्मभूमि ने अपने पास रखे लिए थे। गोरी स्त्रियों के चेहरों पर जैसे किसी ने काले-नीले धब्बे डाल दिये हों। अभी तक उन्हें अपने सिरों पर चमकती हुई छुरियाँ लटकती महसूस होती थीं। युवतियों के कानों में गोलियों की सनसनाहट गूँज उठती, और वे काँप-काँप जातीं। उनकी कल्पना में विवाह के गीत बलवाइयों के नारों और मारधाड़ के शोर में हमेशा के लिए दब गये थे। पायल की झंकार घायल हो गयी थी। उनके गालों की लालिमा मटमैली होती चली गयी। जीवन का संगीत मृत्यु की खाइयों में भटककर रह गया। कहकहे शोक में डूब गये और हँसी-ठठोलों पर मानो श्मशान की राख उड़ने लगी। पाँच दिन की यात्रा में सभी के चेहरों की रौनक खत्म हो गयी थी।

यह सब क्यों हुआ, कैसे हुआ? इस पर विचार करने की किसे फुरसत थी? यह सब कैसे हुआ कि लोग अपनी ही जन्मभूमि में बेगाने हो गये? हर चेहरे पर खौफ था, त्रास था। बहुतों को इतना इतमीनान जरूर था कि जान पर आ बनने के बाद वे भाग निकलने में सफल हो गये। एक ही धरती का अन्न खाने वाले लोग कैसे एक-दूसरे के खून से हाथ रँगने लगे? यह सब क्यों हुआ, कैसे हुआ?

नए देश की कल्पना उन्हें इस गाड़ी में ले आयी थी। अब यह गाड़ी आगे क्यों नहीं बढ़ती? सुनने में तो यहाँ तक आया था कि स्टेशन पर बलवाइयों ने गाड़ी की पूरी-की-पूरी सवारियों के खून से हाथ रंग लिए थे। पर अब हालत काबू में थी। यद्यपि कुछ लोग पचास रुपये गिलास के हिसाब से पानी बेचनेवालों को बदमाश बलवाइयों के शरींफ भाई मानने के लिए तैयार न थे। नए देश में ये सब मुसीबतें तो न होंगी। वहाँ सब एक-दूसरे पर भरोसा कर सकेंगे। पर जब प्यास के मारे ओठ सूखने लगते और गले में प्यास के मारे साँस अटकने लगती तो वे तड़पकर रह जाते।

इनमें ऐसे लोग भी थे, जिनके घर जला दिये गये। वे बिलकुल खामोश थे। जैसे उनके दिल बुझ गये हों, दिमाग बुझ गये हों। कुछ ऐसे भी थे, जिनकी हालत पर झट यह कहा जा सकता था कि न आषाढ़ में हरे न सावन में सूखे।

जन्मभूमि में हाथ हमेशा खाली रहे। अब नए देश में भी कौन-से उनके हाथ भर जाएँगे? वे बढ़-बढ़कर बातें करने लगते। सौ से छूटते ही उनके बोल लाखों पर आकर रुकते। पर प्यास के मारे उनका बुरा हाल था।

खचाखच भरे हुए डिब्बे पर आलुओं की बोरी का गुमान होता था। एक अधेड़ आयु की स्त्री जो बहुत दिनों से बीमार थी, एक कोने में बैठी थी। उसके तीन बच्चे थे। एक लड़की सात बरस की थी, एक पाँच बरस की, और तीसरा बच्चा अभी दूध पीता था। यह गोद का बच्चा ही उसे बुरी तरह परेशान कर रहा था। कभी-कभी तंग आकर वह उसका मुँह झटक देती। इस स्त्री का पति कई बार बच्चे को अपनी बाँहों में थामकर खड़ा हो जाता और अपनी पत्नी की आँखों में झाँककर यह कहना चाहता कि यह तीसरा बच्चा पैदा ही न हुआ होता तो बहुत अच्छा होता।

बच्चे को अपनी गोद में लेते हुए बीमार स्त्री का पति कह उठा, ''तुम घबराओ मत। तुम ठीक हो जाओगी। बस अब थोड़ा-सा फासला और रहता है।''

बीमार स्त्री खामोश बैठी रही। शायद वह कहना चाहती थी कि यदि गाड़ी और रुकी रही तो बलवाई आ पहुँचेंगे और ये गिनती के मिलिटरी वाले भला कैसे हमारी जान बचा सकेंगे। जैसे ये सब सवारियाँ लाशें हों और गिध्द इनकी बू सूँघसकतेहों।

पास से किसी ने पूछ लिया, ''बहिन जी को क्या कष्ट है?''

''उस गाँव में कोई डाक्टर न था जहाँ मैं पढ़ाता था।'' बीमार स्त्री का पति कह उठा।

''तो आप स्कूल मास्टर हैं?''

''यह कहिए कि स्कूल मास्टर था,'' बीमार स्त्री के पति ने एक लम्बी आह भरते हुए कहा, ''अब भगवान जाने नए देश में हम पर क्या बीतेगी।''

 

दो

वह अपने मन को समझाता रहा। जरा गाड़ी चले तो सही। वे बहुत जल्द अपने राज्य में पहुँचने वाले हैं। वहाँ डाक्टरों की कमी न होगी। कहीं-न-कहीं उसे स्कूल मास्टर की जगह मिल ही जाएगी। उसकी आमदनी पहले से बढ़ जाएगी। वह अपनी पत्नी से कहना चाहता था कि जो चीज जन्मभूमि में आज तक नहीं मिल सकी, अब नए देश और जनता के राज्य में उसकी कुछ कमी न होगी।

बड़ी लड़की कान्ता ने बीमार माँ के समीप सरककर पूछा, ''माँ, गाड़ी कब चलेगी?''

छोटी लड़की शान्ता खिड़की के बाहर झाँक रही थी।

कान्ता और शान्ता का भैया ललित पिता की बाँहों में बराबर रोये जा रहा था।

स्कूल मास्टर को अपने स्कूल का ध्यान आ गया, जहाँ वह पिछले दस बरस से हेडमास्टर था। टैक्सला के समीप के इस गाँव को शुरू-शुरू में यह स्वीकार न था कि वहाँ स्कूल ठहर सके। उसने बड़े प्रेम से लोगों को समझाया था कि यह गाँव टैक्सला से दूर नहींटैक्सला जिसका प्राचीन नाम तक्षशिला है और जहाँ एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय था और जहाँ दूर-दूर के देशों के विद्यार्थी शिक्षा पाने आया करते थे। यह विचार आते ही उसकी कल्पना को झटका-सा लगा क्योंकि इस युग के लोगों ने एक-दूसरे के खून से हाथ रँगने की कसमें खायीं और अत्याचार की ये घटनाएँ ढोलों और शहनाइयों के संगीत के साथ-साथ हुईं। शिक्षित लोग भी बलवाइयों के संग-संगाती बनते चले गये। शायद उन्हें भूलकर भी खयाल न आया कि अभी तो प्राचीन तक्षशिला की खुदाई के बाद हाथ आने वाले मूर्ति-कला के बहुमूल्य नमूने भी बराबर अपना सन्देश सुनाए जा रहे थे। यह कैसी जन्मभूमि थी? इस जन्मभूमि पर किसे गर्व हो सकता था, जहाँ कत्लेआम के लिए ढोल और शइनाइयाँ बजाना जरूरी समझा गया।

इतिहास पढ़ाते समय उसने अनेक बार विद्यार्थियों को बताया कि यही वह उनकी जन्मभूमि है, जहाँ कभी कनिष्क का राज्य था, जहाँ अहिंसा का मन्त्र फूँका गया था, जहाँ भिक्षुओं ने त्याग, शान्ति और निर्वाण के उपदेश दिये और अनेक बार गौतम बुद्ध के बताये हुए मार्ग की ओर उँगली उठायी। आज उसी धरती पर घर जलाये जा रहे थे, और शायद ढलती बर्फों के शीतल जल से भरपूर नदियों के साथ-साथ गरम-गरम खून की नदी बहाने का मनसूबा बाँधा जा रहा था।

डिब्बे में बैठे हुए लोगों के कन्धे झिंझोड़-झिंझोड़कर वह कहना चाहता था कि गौतम बुध्द को संसार में बार-बार आने की आवश्यकता नहीं। अब गौतम बुद्ध कभी जन्म नहीं लेगा, क्योंकि उसकी अहिंसा का सदा के लिए अन्त हो गया। अब लोग निर्वाण नहीं चाहते। उन्हें दूसरों की आबरू उतारने में आनन्द आता है।

अब तो नग्न स्त्रियों और युवतियों के जुलूस निकालने की बात किसी के टाले टल नहीं सकती। आज जन्मभूमि अपनी सन्तानों की लाशों से पटी पड़ी है। अब यह इनसान के मांस और रक्त की सड़ाँध कभी खत्म नहीं होगी।

नन्हा ललित रो-रोकर सो गया था। कान्ता और शान्ता बराबर सहमी-सहमी निगाहों से कभी माँ की तरफ और कभी खिड़की के बाहर देखने लगती थीं। एक-दो बार उनकी निगाह ललित की तरफ भी उठ गयी। वे चाहती थीं कि थोड़ी देर और उनका पिता ललित को उठाये खड़ा रहे। क्योंकि उसकी जगह उन्हें आराम से टाँगें फैलाने का अवसर मिल गया था।

शान्ता ने कान्ता के बाल नोंच डाले और कान्ता रोने लगी। पास से माँ ने शान्ता के चपत दे मारी, और इस पर शान्ता भी रोने लगी। उधर ललित भी जाग उठा और वह बेसुरे अन्दांज से रोने-चीखने लगा।स्कूल मास्टर के विचारों का क्रम टूट गया। प्राचीन तक्षशिला के विश्वविद्यालय और भिक्षुओं के उपदेश से हटकर वह यह कहने के लिए तैयार हो गया कि कौन कहता है कि इस देश में कभी गौतम बुध्द का जन्म हुआ था। वह कान्ता और शान्ता से कहना चाहता था कि रोने से कुछ लाभ नहीं। नन्हा ललित तो बेसमझ है और इसलिए बार-बार रोने लगता है, तुम तो समझदार हो। तुम्हें तो बिलकुल नहीं रोना चाहिए। क्योंकि यदि तुम इसी तरह रोती रहोगी तो बताओ तुम्हारे चेहरों पर कमल के फूल कैसे खिल सकते हैं? पास से किसी की आवांज आयी, ''यह सब फिरंगी की चाल है। जिस बस्तियों ने बड़े-बड़े हमलावरों के हमले बरदाश्त किये, अनगिनत सदियों से अपनी जगह पर कायम रहीं, आज वे भी लुट गयीं।''

''ऐसे-ऐसे कत्लेआम तो उन हमलावरों ने भी न किये होंगे। हमारे स्कूलों में झूठा और मनगढ़न्त इतिहास पढ़ाया जाता रहा है !'' एक और मुसाफिर ने ज्ञान बघारा।

स्कूल मास्टर ने चौंककर उस मुसाफिर की तरफ देखा। वह कहना चाहता था कि तुम सच कहते हो। मुझे मालूम न था। नहीं तो मैं कभी इस झूठे मनगढ़न्त इतिहास का समर्थन न करता। वह यह भी कहना चाहता था कि इसमें उसका तो कोई दोष नहीं। क्योंकि सभ्यता के चेहरे से सुन्दर खोल साँप की केंचुली की तरह अभी-अभी उतरा है, और अभी-अभी मालूम हुआ है कि मानव ने कुछ भी उन्नति नहीं की, बल्कि यह कहना होगा कि उसने पतन की तरफ ही बड़े वेग से पग बढ़ाये हैं।

''जिन्होंने बलवाइयों और हत्यारों का साथ दिया और मानवता की परंपरा का अपमान किया,'' स्कूल मास्टर ने साहस दिखाते हुए कहा, ''जिन्होंने नग्न स्त्रियों और युवतियों के जुलूस निकाले, जिन्होंने अपनी इन माताओं और बहनों की आबरू पर हाथ डाला, जिन्होंने माताओं के दूध-भरे स्तन काट डाले और जिन्होंने बच्चों की लाशों को नेंजों पर उछाल कर कहकहे लगाये, उनकी आत्माएँ सदा अपवित्र रहेंगी। और फिर यह सब कुछ यहाँ भी हुआ और वहाँ भी,जन्मभूमि में भी और नए देश में भी!''

इसके उत्तर में सामने वाला मुसांफिर चुप बैठा रहा। उसकी खामोशी ही उसका उत्तर था। शायद वह कहना चाहता था कि इन बातों से क्या लाभ। ऊपर से उसने इतना ही कहा, ''हमें यह कैसी आजादी मिली है?''

 

तीन

कान्ता और शान्ता के आँसू थम गये थे। ललित भी कुछ क्षणों के लिये खामोश हो गया। स्कूल मास्टर की निगाहें अपनी बीमार पत्नी की ओर गयीं, जो खिड़की के बाहर देख रही थी। शायद वह पूछना चाहती थी कि जन्मभूमि छोड़ने पर हम क्यों मजबूर हुए। या क्या यह गाड़ी यहाँ इसीलिए रुक गयी है कि हमें फिर से अपने गाँव लौट चलने का विचार आ जाए।

स्कूल मास्टर के होंठ बुरी तरह सूख रहे थे। उसका गला बुरी तरह खुश्क हो चुका था। उसे यह महसूस हो रहा था कि कोई उसकी आत्मा में काँटे चुभे रहा है। एक हाथ सामने वाले मुसाफिर के कन्धे पर रखते हुए वह बोला

''सरदार जी, बताओ तो सही कि कल का इनसान उस अन्न को भला कैसे अपना भोजन बनाएगा, जिसका जन्म उस धरती की कोख से होगा, जिसे अनगिनत मासूम बेगुनाहों की लाशों की खाद प्राप्त हुई?''

सरदार जी का चेहरा तमतमा उठा। जैसे वह ऐसे विचित्र प्रश्न के लिए तैयार न हों। किसी कदर सँभलकर उसने भी प्रश्न कर डाला, ''आप बताओ, इसमें धरती का क्या दोष है?''

''हाँ-हाँ इसमें धरती का क्या दोष है?'' स्कूल मास्टर कह उठा, ''धरती को तो खाद चाहिए। फिर वह कहीं से भी क्यों न मिले।''

सरदार जी प्लेटफार्म की ओर देखने लगे। बोले, ''यह गाड़ी भी अजीब ढीठ है, चलती ही नहीं। बलवाई जाने कब आ जाएँ!''

स्कूल मास्टर के मन में अनगिनत लाशों का दृश्य घूम गया, जिनके बीचोबीच बच्चे रेंग रहे हों। वह इन बच्चों के भविष्य पर विचार करने लगा। यह कैसी नई पौध है? वह पूछना चाहता था। यह नई पौध भी कैसी सिध्द होगी? उसे उन अनगिनत युवतियों का ध्यान आया, जिनकी इंज्जत पर हाथ डाला गया था। पुरुष की दहशत के सिवा इन युवतियों की कल्पना में और क्या उभर सकता है? उनके लिए निश्चत ही यह आजादी बरबादी बनकर आयी। वे निश्चय ही आंजादी के नाम पर थूकने से भी नहीं कतराएँगी। उसे उन कन्याओं का ध्यान आया, जो अब माताएँ बननेवाली थीं। ये कैसी माताएँ बनेंगी? वह पूछना चाहता था। ये घृणा के बीज भला क्या फल लाएँगे? उसने सोचा, इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास न होगा। वह डिब्बे में एक-एक व्यक्ति का कन्धा झिंझोड़कर कहना चाहता था कि मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो। नहीं तो यदि यह गाड़ी पचास-पचपन घंटों तक रुकने के पश्चात् आगे चलने के लिए तैयार भी होगी तो मैं जंजीर खींचकर गाड़ी को रोक लूँगा।

''क्या यह गाड़ी अब आगे नहीं जाएगी, हे भगवान्?'' बीमार स्त्री ने अपने चेहरे से मक्खियाँ उड़ाते हुए पूछ लिया।

''निराश होने की क्या जरूरत है? गाड़ी आखिर चलेगी ही।'' स्कूल मास्टर कह उठा।

स्कूल मास्टर खिड़की से सिर निकालकर बाहर की ओर देखने लगा। एक-दो बार उसका हाथ जेब की तरफ बढ़ा अन्दर गया और फिर बाहर आ गया। इतना महँगा पानी खरीदने का उसे साहस न हुआ। जाने क्या सोचकर उसने कहा, ''गाड़ी अभी चल पड़े तो नए देश की सीमा में घुसते उसे देर न लगेगी। फिर पानी की कुछ कमी न होगी। ये कष्ट के क्षण बहुत शीघ्र बीत जाएँगे।''

 

चार

कन्धे पर पड़ी हुई फटी-पुरानी चादर को वह बार-बार सँभालता था। इसे वह अपनी जन्मभूमि से बचाकर लाया था। बलवाइयों के अचानक गाँव में आ जाने के कारण वह कुछ भी तो नहीं निकाल सका था। बड़ कठिनाई से वह अपनी बीमार पत्नी और बच्चों के साथ भाग निकला था। अब इस चादर पर उँगलियाँ घुमाते हुए उसे गाँव का जीवन याद आने लगा। एक-एक घटना मानो एक-एक तार थी और इन्हीं तारों की सहायता से समय के जुलाहे ने जीवन की चादर बुन डाली थी। इसी चादर पर उँगलियाँ घुमाते हुए उसे मानो उस मिट्टी की सुगन्ध आने लगी, जिसे वह वर्षों से सूँघता आया था। जैसे किसी ने उसे जन्मभूमि की कोख से जबरदस्ती उखाड़कर इतनी दूर फेंक दिया। जाने अब गाड़ी कब चलेगी?

अब यह जन्मभूमि नहीं रह गयी। देश का बँटवारा हो गया। अच्छा चाहे बुरा। जो होना था सो हो गया। अब देश के बँटवारे को झुठलाना सहज नहीं। पर क्या जीवन का बँटवारा भी हो गया?

अपनी बीमार पत्नी के समीप झुककर वह उसे दिलासा देने लगा, ''इतनी चिन्ता नहीं किया करते। नए देश में पहुँचने भर की देर है। एक अच्छे से डाक्टर से तुम्हारा इलाज कराएँगे। मैं फिर किसी स्कूल में पढ़ाने लगूँगा। तुम्हारे लिए फिर से सोने की बालियाँ घड़ा दूँगा।'' कोई और समय होता तो वह अपनी पत्नी से उलझ जाता कि भागते समय इतना भी न हुआ कि चुड़ैल अपनी सोने की बालियाँ ही उठा लाती। बल्कि वह उस कजलौटी तक के लिए झगड़ा खड़ाकर देता, जिसे वह दर्पण के समीप छोड़ आयी थी । कजलौटी, जिसकी सहायता से वह इस अधेड़ आयु में भी कभी-कभी आँखों में बीते सपनों की याद जाता कर लेती थी।

कान्ता ने झुककर शान्ता की आँखों में कुछ देखने का प्रयास किया। जैसे वह पूछना चाहती हो कि बताओ पगली, हम कहाँ जा रहे हैं।

''मेरा झुनझुना?'' शान्ता ने पूछ लिया।

''मेरी गुड़िया!'' कान्ता बोली।

''यहाँ न झुनझुना है, न गुड़िया!'' स्कूल मास्टर ने अपनी आँसू-भरी आँखों से अपनी बच्चियों की ओर देखते हुए कहा, ''मेरी बेटियो! झुनझुने बहुतेरे,गुड़ियाँ बहुतेरी, नए देश में हर चीज मिलेगी।''

पर रह-रहकर उसका मन पीछे की तरफ मुड़ने लगता। यह कैसा आकर्षण है? यह जन्मभूमि पीछे रह गयी। अब नया देश समीप है। गाड़ी चलने भर की देर है। उसने झुँझलाकर इधर-उधर देखा। जैसे वह डिब्बे में बैठे हुए एक-एक व्यक्ति से पूछना चाहता हो कि बताओ गाड़ी कब चलेगी।

''जन्मभूमि हमेशा के लिए छूट रही है!'' उसने अपने कन्धों पर पड़ी हुई चादर को बायें हाथ की उँगलियों से सहलाते हुए कहना चाहा। जैसे इस चादर के भी कान हों, और वह सब सुन सकती हो। खिड़की से सिर निकालकर उसने पीछे की तरफ देखा और उसे यों लगा जैसे जन्मभूमि अपनी बाँहें फैलाकर उसे बुला रही हो। जैसे वह कह रही हो कि मुझे यों छोड़कर चले जाओगे, मेरा आशीर्वाद तो तुम्हारे लिए हमेशा था और हमेशा रहेगा!

स्कूल मास्टर की बीमार पत्नी ने नन्हे ललित से समझौता कर लिया था। इस दूध की एक-एक बूँद पर पचासों रुपये निछावर किए जा सकते थे। यह दूध पचास रुपये गिलास के हिसाब से बिकने वाले दूध से अवश्य महँगा था।

चादर पर दायें हाथ की उँगलियाँ फेरते हुए स्कूल मास्टर को जन्मभूमि की धरती का ध्यान आ गया, जो शताब्दियों से रुई की खेती के लिए विख्यात थी।

उसकी कल्पना में कपास के दूर तक फैले हुए खेत उभरे। यह इसी कपास का जादू ही तो था कि जन्मभूमि रुई के अनगिनत ढेरों पर गर्व कर सकती थी।

जन्मभूमि में रुई से कैसे-कैसे बारीक तार निकाले जाते थे। घर-घर चरखे चलते थे। सजीव चरखा कातने वालियों की रंगीली महफिलें, वे 'त्रिंजन'! वह बढ़-बढ़कर सूत कातने की होड़! वे सूत की अंटियाँ तैयार करने वाले हाथ! वे जुलाहे जो परंपरागत कथाओं में मूर्ख समझे जाते थे, पर जिनकी उँगलियों को महीन-से-महीन कपड़ा बुनने की कला आती थी। जैसे जन्म-भूमि पुकार-पुकारकर कह रही होतुम कद के लम्बे हो और शरीर के गठे हुए। तुम्हारे हाथ-पाँव मजबूत हैं। तुम्हारा सीना कितना चौड़ा है। तुम्हारे जबड़े इतने संख्त हैं कि पत्थर तक चबा जाओ। यह सब मेरे कारण ही तो है। देखो, तुम मुझे छोड़कर मत जाओ...स्कूल मास्टर ने झट खिड़की के बाहर देखना बन्द कर दिया और उसकी आँखें अपनी बीमार पत्नी के चेहरे पर जम गयीं।

 

पाँच

वह कहना चाहता था कि मुझे वे दिन अभी तक याद हैं, ललित की माँ, जब तुम्हारी आँखें काजल के बिना ही काली-काली और बड़ी-बड़ी नंजर आया करती थीं। मुझे याद हैं वे दिन, जब तुम्हारे शरीर में हिरनी की-सी मस्ती थी। उन दिनों तुम्हारे चेहरे पर चाँद की चाँदनी थी, सितारों की चमक थी। मुस्कान, हँसी,कहकहा तुम्हारे चेहरे पर खुशी के तीनों रंग थिरक उठते थे। तुम पर जन्मभूमि कितनी दयालु थी। तुम्हारे सिर पर वे काले घुँघराले केश! उन सावन के काले-काले मेघों को अपने कन्धों पर सँभाले तुम मटक-मटक कर चला करती थीं गाँव की गलियों में, और पगडंडियों पर! घुर-घुर धाँ-भाँ जैसे मटकी में गिरते समय ताजा दुहे जाने वाला दूध बोल उठे। स्कूल मास्टर को यों लगा, जैसे अभी बहुत कुछ बाकी हो।

जैसे वह वर्षों के घूमते हुए भँवर में चमकती हुई किरन के दिल की बात भाँपकर कह सकता हो कि बीते सपने कल्पना के कला-भवन में सदैव थिरकते रहेंगे। जैसे वह ताक में पड़ी सुराही से कह सकती हो , ओ सुराही, तेरी गरदन टेढ़ी है, भला मैं वे दिन कैसे भूल सकता हँ जब तुम नई-नई इस घर में आयी थी।

वह चाहता था कि गाड़ी जल्द-से-जल्द नए देश की सीमा में प्रवेश कर जाए। फिर उसके सब कष्ट मिट जाएँगे। पत्नी का इलाज भी हो सकेगा। जन्मभूमि पीछे रह जाने के विचार से कुछ उलझन-सी अवश्य महसूस हुई। पर उसने तुरन्त अपने मन को समझा लिया। वह यह प्रयास करने लगा कि नए देश में जन्मभूमि की कल्पना कायम कर सके। आखिर एक गाँव को तो जन्मभूमि नहीं कहते , जन्मभूमि तो बहुत विशाल है, बहुत महान् है। उसकी महिमा का गान तो देवता भी पूरी तरह नहीं कर सकते। जिधर से गाड़ी यहाँ तक आयी थी, और जिधर गाड़ी को जाना था, दोनों तरफ एक-जैसी भूमि दूर तक चली गयी थी। उसे विचार आया कि भूमि तो सब जगह एक-जैसी है। जन्मभूमि और नए देश की भूमि में बहुत अधिक अन्तर तो नहीं हो सकता। वह चाहता था कि जन्मभूमि की वास्तविक कल्पना कायम करे। पौ फटने से पहले का दृश्यदूर तक फैला हुआ क्षितिज किनारे-किनारे पहाड़ियों की झालर आकाश पर बगलों की पंक्ति खुली कैंची के रूप में उड़ती हुई पूरब की ओर उषा का उजाला !...

धरती ऐसी जैसी किसी युवती की गरदन के नीचे ऊँची घाटियों के बीचो-बीच ताजा श्वेत मक्खन दूर तक फैला हुआ हो। वह चिल्लाकर कहना चाहता था कि जन्मभूमि का यह दृश्य नए देश में भी जरूर नजर आएगा। अपने कन्धों पर पड़ी हुई चादर को वह दायें हाथ की उँगलियों से सहलाने लगा।

जैसे वह इस चादर के मुख से अपना समर्थन चाहता हो। लटकती डालियाँ, महकती कलियाँ, इन्द्रधनुष के रंग, आकाश-गंगा का दूधिया-सौन्दर्य, युवतियों के कहकहे, नव कुलवधुओं की लाजजन्मभूमि का रूप इन्हीं पर कायम था।

अपने खमीर पर, अपनी तासीर पर जन्मभूमि मुसकराती आयी है और मुसकराती रहेगी। वह कहना चाहता था कि नए देश में भी जन्मभूमि का रूप किसी से कम थोड़ी होगा, वहाँ भी गेहँ के खेत दूर तक फैले हुए नंजर आएँगे।

जन्मभूमि का यह दृश्य नए देश में भी उसके साथ-साथ जाएगा, उसे विश्वास था।

उसके बायें हाथ की ऍंगुलियाँ बराबर कन्धे पर पड़ी हुई फटी-पुरानी और मैली चादर से खेलती रहीं। जैसे ले-देकर आज यही चादर जन्मभूमि की प्रतीक बन गयीहो।

''फिरंगी ने देश का नक्शा बदल डाला,'' सरदारजी कह रहे थे, पास से कोई बोला, ''यह उसकी पुरानी चाल।''

एक बुढ़िया ने कहा, ''फिरंगी तो बहुत दिनों से इस देश में बस गया था। मैं न कहती थी कि हम बुरा कर रहे हैं जो फिरंगी को उनके बंगलों से निकालने की सोच रहे हैं? मैं न कहती थी कि फिरंगी का सराप लगेगा?''

दूसरी बुढ़िया बोली, ''यह सब फिरंगी का सराप ही तो है, बहिन जी!''

स्कूल मास्टर को पहली बुढ़िया पर बहुत क्रोध आया। उसकी आवांज में जन्मभूमि के सन्देह बोल उठे, उसने सोचा। दूसरी बुढ़िया उससे भी कहीं अधिक मूर्ख थी जो बिना सोचे हाँ में हाँ मिलाये जा रही थी।

परे कोने में एक कन्या चीथड़ों में लिपटी हुई बैठी थी। जैसे उसकी सहमी-सहमी निगाहें इस डिब्बे के प्रत्येक यात्री से पूछना चाहती होंक्या ये मेरे आखिरी घाव हैं? उसके बायीं तरफ उसकी माँ बैठी थी, जो शायद फिरंगी से कहना चाहती थी कि मेरी गुलामी मुझे लौटा दो, क्योंकि गुलामी में मेरी बिटिया की आबरू नहीं लुटी थी।

डिब्बे में बैठे हुए जो लोग भीड़ के कारण बेहद भिंचे हुए थे, उनकी आँखों में भय की यह दशा थी कि वे प्रतिक्षण बड़े वेग से बुङ्ढे हो रहे थे। सरदारजी बोले, ''इतनी लूट तो बाहर से आने वाले हमलावरों ने भी न की होगी।''

पास से किसी ने कहा, ''इतना सोना लूट लिया गया कि सौ-सौ पीढ़ियों तक खत्म नहीं होगा।''

''लूट का सोना ज्यादा दिन नहीं ठहरता।'' एक और यात्री बोल उठा।

सरदारजी का चेहरा तमतमा उठा। बोले, ''पुलिस के सिपाही भी तो सोना लूटने वालों के साथ रहते थे। पर लूट का सोना पुलिस के सिपाहियों के पास भी कितने दिन ठहरेगा? आज भी दुनिया सतगुरु नानक देव जी महाराज की आज्ञा पर चले तो शान्ति हो सकती है।''

 

छह

छप्पन, सत्तावन, अट्ठावन इतने घंटों से गाड़ी हरबंसपुरा के स्टेशन पर रुकी खड़ी थी। अब तो प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े मिलिटरी वालों के तने हुए शरीर भी ढीले पड़ गये थे। किसी में इतनी हिम्मत न थी कि डिब्बे से नीचे जाकर देखे कि आखिर गाड़ी रुकने का कारण क्या है। डिब्बे में हर किसी का दम घुटा जा रहा था, और हर कोई चाहता था कि और नहीं तो इस डिब्बे से निकलकर किसी दूसरे डिब्बे में कोई अच्छी-सी जगह ढूँढ़ ले। पर यह डर भी तो था कि कहीं यह न हो कि न इधर के रहें न उधर के और गाड़ी चल पड़े।

''फिरंगी का सराप खत्म होने पर ही चलेगी गाड़ी!'' बुढ़िया बोली।

''सच है, बहिन जी!'' दूसरी बुढ़िया कह उठीं।

स्कूल मास्टर ने उड़ने वाले पक्षी के समान बाँहें हवा में उछालते हुए कहा, ''फिरंगी को दोष देते रहने से तो न जन्मभूमि का भला होगा न नए देश का।''

पहली बुढ़िया ने रूखी हँसी हँसते हुए कहा, ''फिरंगी चाहे तो गाड़ी अभी चल पड़े।''

कान्ता ने खिड़की सो झाँककर दूसरे डिब्बे की खिड़की में किसी को पानी पीते देख लिया था। वह भी पानी के लिए मचलने लगी। उसकी बीमार माँ ने कराहती हुई आवाज में कहा, ''पानी का तो अकाल पड़ रहा है, बिटिया!''

अब शान्ता भी पानी की रट लगाने लगी। सरदारजी ने जेब में हाथ डाल कर कुछ नोट निकाले और पाँच-पाँच रुपये के पाँच नोट स्कूल मास्टर की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ''इससे आधा गिलास पानी ले लिया जाए।''

स्कूल मास्टर ने झिझकते हाथों से नोट स्वीकार किये। आधा गिलास पानी की कल्पना से उसकी आँखें चमक उठीं। खाली गिलास उठाकर वह पानी की तलाश में नीचे प्लेटफार्म पर उतर गया। अब 'हिन्दू पानी!' और 'मुस्लिम पानी!' का भेद नहीं रह गया था। बड़ी कठिनाई से एक व्यक्ति के पास पानी नंजर आया।

बावन रुपये गिलास के हिसाब से पच्चीस रुपये का पानी आधे गिलास से कुछ कम ही आना चाहिए था। पानी बेचने वाले ने पेशगी रुपये वसूल कर लिए और बड़ी मुश्किल से एक-तिहाई गिलास पानी दिया।

डिब्बे में आकर सरदारजी के गिलास में थोड़ा पानी उड़ेलते समय जल्दी में कोई एक घूँट पानी फर्श पर गिर गया। झट से पानी का गिलास कान्ता के मुँह पर थमाते हुए उसने कहा, ''पी ले बेटा!'' उधर से शान्ता ने हाथ बढ़ाये।

स्कूल मास्टर ने कान्ता के मुँह से गिलास हटाकर उसे शान्ता के मुँह पर थमा दिया।

फिर काँपते हाथों से यह गिलास उसने अपनी बीमार पत्नी के होंठों की तरफ बढ़ाया जिसने आँखों-ही-आँखों में अपने पति से कहा कि पहले आप भी अपने होंठ गीले कर लेते। पर पति इसके लिए तैयार न था।

कान्ता और शान्ता ने मिलकर जोर से गिलास पर हाथ मारे। बीमार माँ के कमजोर हाथों से छूटकर गिलाश फर्श पर गिर पड़ा। स्कूल मास्टर ने झट लपककर गिलास उठा लिया। बड़ी मुश्किल से इसमें एक घूँट पानी बच पाया था। यह एक घूँट पानी उसने झट अपने गले में उँड़ेल लिया।

सरदारजी कह रहे थे, ''इतना कुछ होने पर भी इनसान जिन्दा है और जिन्दा रहेगा।''

स्कूल मास्टर कह उठा, ''इनसानियत जन्मभूमि का सबसे बड़ा वरदान है। जैसे एक पौधे को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर लगाया जाता है, ऐसे ही हम नए देश से जन्मभूमि का पौधा लगाएँगे। हमें इसकी देखभाल करनी पड़ेगी और इस पौधे को नई जमीन में जड़ पकड़ते कुछ समय अवश्य लगेगा।''

यह कहना कठिन था कि बीमार औरत के गले में कितने घूँट पानी गुंजरा होगा। पर इतना तो प्रत्यक्ष था कि पानी पीने के बाद उसकी अवस्था और भी डावाँडोल हो गयी। अब उसमें इतनी शक्ति न थी कि बैठी रह सके। सरदारजी ने न जाने क्या सोचकर कहा, ''दरिया भले ही सूख जाएे, पर दिलों के दरिया तो सदा बहते रहेंगे। दिल दरिया समुन्दरों डूबें!'

 

सात

स्कूल मास्टर कह उठा, ''कभी ये दिलों के दरिया जन्मभूमि में बहते थे। अब ये दरिया नए देश में बहा करेंगे।''

बीमार स्त्री बुखार से काँपने लगी। सरदारजी बोले, ''यह अच्छा होगा कि इसे थोड़ी देर के लिए नीचे प्लेटफार्म पर लिटा दिया जाए। बाहर की खुली हवा इसके लिए अच्छी रहेगी।''

स्कूल मास्टर ने एहसान-भरी निगाहों से सरदारजी की तरफ देखा और उनकी मदद से बीमार पत्नी को डिब्बे से उतार कर प्लेटफार्म पर लिटा दिया।

सरदारजी फिर अपनी जगह पर जा बैठे और स्कूल मास्टर अपनी पत्नी के चेहरे पर रूमाल से पंखा करने लगा। वह धीरे-धीरे उसे दिलासा देने लगा, ''तुम अच्छी हो जाओगी। हम बहुत जल्द नए देश में पहुँचने वाले हैं। वहाँ मैं अच्छे-अच्छे डाक्टरों से तुम्हारा इलाज करवाऊँगा।''

बीमार औरत के चेहरे पर दबी-दबी-सी मुसकान उभरी। पर उसके मुख से एक भी शब्द न निकला, मानो उसकी खुली-खुली आँखें कह रही होंमैं जन्मभूमि को नहीं छोड़ सकती। मैं नए देश में नहीं जाना चाहती। मैं इस धरती की कोख से जन्मी और इसी में समा जाना चाहती हँ!

उसकी साँस जोर-जोर से चलने लगी। उसकी आँखें पथराने लगीं। स्कूल मास्टर घबराकर बोला, ''यह तुम्हें क्या हो रहा है? गाड़ी अब और नहीं रुकेगी। नया देश समीप ही तो है। अब जन्मभूमि का विचार छोड़ दो। हम आगे जाएँगे।''

खिड़की से कान्ता और शान्ता फटी-फटी आँखों से देख रही थीं, उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। सरदारजी ने खिड़की से सिर बाहर निकालकर पूछा, ''अब बहनजी का क्या हाल है?''

स्कूल मास्टर बोला, ''यह अब जन्मभूमि में ही रहेंगी।''

सरदार जी बोले, ''कहो तो थोड़ा पानी खरीद लें।''

बीमार औरत ने बुझते दीप की तरह साँस लिया और उसके प्राण-पखेरू निकल गये।

लाश के समीप खड़े-खड़े स्कूल मास्टर ने बड़े ध्यान से देखा और कहा, ''अब वह पानी नहीं पीएगी।''

उधर इंजन ने सीटी दी और गाड़ी धीरे-धीरे प्लेटफार्म के साथ-साथ रेंगने लगी। उसने एक बार पत्नी की लाश की तरफ देखा फिर उसकी निगाहें गाड़ी की तरफ उठ गयीं। खिड़की से कान्ता और शान्ता उसकी तरफ देख रही थीं। लाश के साथ रह जाएे या लपककर डिब्बे में जा बैठे, यह प्रश्न बिजली के कौंध की तरह उसके हृदय और मस्तिष्क को चीरता चला गया।

उसने अपने कन्धे से झट वह फटी-पुरानी मैली चादर उतारी, जिसे वह जन्मभूमि से बचाकर लाया था और जिसके धागे-धागे में अभी तक जन्मभूमि साँस ले रही थी।

इस चादर को उसने अपने सामने पड़ी हुई लाश पर फैला दिया और गाड़ी की तरफ लपका। कान्ता की आवाज एक क्षण के लिए वातावरण में लहरायीं, ''माँ!''

गाड़ी तेज हो गयी थी, कान्ता की आवाज हवा में उछलकर रह गयी थी। स्कूल मास्टर ने शान्ता को गोद में उठा लिया और पलटकर लाश की तरफ न देखा।

- देवेन्द्र सत्यार्थी
[साभार:चट्टान से पूछ लो]

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