हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

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हिन्दी का स्थान

 (विविध) 
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रचनाकार:

 राहुल सांकृत्यायन | Rahul Sankrityayan

प्रान्तों में हिन्दी

सारे संघ की राष्ट्रभाषा के अतिरिक्त हिन्दी का अपना विशाल क्षेत्र है। हरियाना, राजपूताना, मेवाड़, मालवा, मध्यप्रदेश, युक्तप्रान्त, (उत्तर प्रदेश) और बिहार हिन्दी की। अपनी भूमि है। यही वह भूमि है, जिसने हिन्दी के आदिम कवियों, सरह, स्वयम्भू आदि को जन्म दिया। यही भूमि है, जहाँ अश्वघोष, कालिदास, भवभूति और वाण पैदा हुए। यही वह भूमि है, जहाँ कुरु (मेरठ-अम्बाला कमिश्नरियों) पंचाल (आगरा-रुहेलखण्ड कमिश्नरयों ) की भूमि में वशिष्ट, विश्वामित्र, भरद्वाज ने ऋग्वेद के मन्त्र रचे, और प्रवाहण, उद्दालक और याज्ञवल्क्य ने अपनी दार्शनिक उड़ाने की। इस भूमि के सारे भाग की हिन्दी मातृ-भारत नहीं है, किन्तु वह है मातृभाषा जैसी ही । इस विशाल प्रदेश के हर एक भाग में शिक्षित, अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण, सभी हिन्दी को समझते हैं ; इसलिये यहाँ हिन्दी का राजभाषा के और शिक्षा के माध्यम के तौर पर स्वीकार किया जाना बिल्कुल स्वाभाविक है ।

हिन्दी तो केवल वही स्थान लेने जा रही है, जिसे अंग्रेजी ने जबर्दस्ती दखल कर रखा था। विदेशी भाषा सीखने में जब उजुर नहीं था, तो अपने देश की भाषा सीखने में क्यों उजुर हैं ? हिन्दी भाषा 70 सालों से पदच्युत रहकर अब विशाल मध्यदेश में अपना स्थान ग्रहण करने जा रही है, इसके लिये हमें हर्ष होना चाहिए।

 

विश्व की महान भाषा

हिन्दी भारतीय संघ की राजभाषा होगी और उसके आधे से अधिक लोगों की नी भाषा होने के कारण वह अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में अब एक महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण करेगी । चीनी भाषा के बाद वहीं दूसरी भाषा है, जो इतनी बड़ी जनसंख्या की भाषा है। हिन्दी के ऊपर मुके लिए बड़ा दायित्व आ जाता है। हिन्दी को एक विशाल जन-समूह के राज-काज और बातचीत को ही चलाना नहीं है, बल्कि उसी को शिक्षा का माध्यम बनना है। फिर आजकल की f८१r सिर्फ कविता, कहानी और साहित्यिक निबन्धों तक ही सीमित नहीं है। विश्व की प्रत्येक उन्नत भाषा का अधिकतर साहित्य साइन्स के ग्रंथों पर अवलम्बित है। अभी तक तो साइन्स की पढ़ाई अंग्रेजी ने अपने सिर पर ले रखी थी, किन्तु अब अंग्रेजों के साथ अँग्रेजी का राज्य जा चुका है। सरह, स्वयम्भू से पन्त, निराला, महादेवी तक का हिन्दी-काव्य-साहित्य बहुत सुन्दर और विशाल है। कथा-साहित्य में प्रेमचन्द ने जो परम्परा छोड़ी है, वह काफी आगे बढ़ी है। किन्तु अब हमें हिन्दी में सारा ज्ञान-विज्ञान लाना होगा। कुछ लोग इसे बहुत भारी, शायद सदियों का काम समझते हैं ; परन्तु मेरी समझ में यह उनकी भूल है। आज जिस चीज की माँग हो, उसे साहित्य-जगत् में सृजन करनेवालों की कमी नहीं होती। अब तक उपन्यास, कहानी, कविता की माँग थी, और लेखकों तथा कवियों ने इस माँग को बहुत हद तक पूरा किया।

 

यूनिवर्सिटियों में हिन्दी

शिकायत की जाती है कि हिन्दी में साइन्स सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दों की बहुत कमी है। यह सवाल तो कुछ उन लोगों की ओर से उपस्थित किया जाता है, जो हमारे पिछले ५० साल के परिभाषा-निर्माण सम्बन्धी कार्य से परिचित नहीं हैं। वह परिभाषा-ग्रन्थों के पास नहीं जाना चाहते, बल्कि चाहते हैं, कि शब्द स्वयं उड़-उड़कर उनके मुंह में आएँ। वह उनके मुँह में भी उड़कर आयेंगे, यदि उन शब्दों का पुस्तकों में अधिक प्रयोग हो और पुस्तकें चारों तरफ फैलें। यदि कोई साइन्स का प्रोफेसर ऐसी निराशापूर्ण बात करता है, तो मैं कहूँगा कि अब उसे विश्राम लेने की आवश्यकता है। उसने 20 साल पहले के फिजिक्स और रसायनशास्त्र को पढ़ा होगा और आज वह अँग्रेजी में भी अपने विषय नवीनतम साहित्य के समझने और पढ़ाने की क्षमता नहीं रखता है। ऐसे व्यक्तियों से जितनी जल्दी विद्यार्थियों का पिण्ड छूटे, उतना ही अच्छा। हाँ, यदि अध्यापक अपने विज्ञान, छात्रसमूह और देश के प्रति अपने कर्तव्य को समझता है, तो उसे निराश होने की आवश्यकता नहीं।

अँग्रेजी भाषा स्कूलों में द्वितीय भाषा के तौर पर रहेगी, किन्तु वह बहुत दिनों तक एकमात्र द्वितीय भाषा नहीं रहेगी। हमें अपने विद्यार्थियों को रूसी, अँग्रेजी, फ्रेंच, जर्मनी में से किसी एक को लेने की स्वतंत्रता देनी होगी।

 

हिन्द-संघ के अधिकारियों में हिन्दी

अँग्रेजी राज्य ने सारे भारत के लिये आई० सी० एस० जैसी केन्द्रीय नौकरियों की स्थापना की थी। स्वतंत्र भारत के लिये भी ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता है, इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। हमारी सरकार ने दिल्ली में ऐसा शिक्षणालय खोला है, जिसमें केन्द्रीय अधिकारियों की शिक्षा होती है, लेकिन अभी वहाँ शिक्षा का माध्यम अँग्रेजी है। आरंभिक अवस्था में यही व्यवहार्य था; लेकिन प्रश्न है--क्या आगे भी हम वहाँ अँग्रेजी को ही शिक्षा का माध्यम रखना चाहेंगे ? मैं नहीं समझता, गुलामी की इस आखिरी कड़ी को हमारा देश बदश्ति करेगा। केन्द्रीय सेवा में आनेवाले उम्मीदवारों के लिए हिन्दी का ज्ञान आवश्यक होना चाहिए ; क्योंकि आज उन्हें शासन का कारबार अँग्रेज़ी में नहीं करना है। हो सकता है, अहिन्दी भाषा-भाषी प्राणों में जाने वाले अधिकारियों को उस प्रांत की भाषा की योग्यता अधिक होनी चाहिए, और उनके लिए हिन्दी की योग्यता कम होने से भी काम चल सकता है; लेकिन यह संक्रांति-काल में ही, आगे चलकर तो केन्द्रीय अधिकारियों और शिक्षार्थियों के लिए हिन्दी की योग्यता की वही कसौटी होनी चाहिये, जो कि अब तक अँग्रेजी के लिए मानी जाती रही।

मेरा अभिप्राय यह नहीं है, कि हमें विदेशी भाषाओं का बहिष्कार करना चाहिए। ऐसी कूप-मंडूकता नहीं चल सकती। अब हमारा देश स्वतंत्र विश्व का एक अंग है। दूसरे स्वतंत्र राष्ट्रों से हमारा राजनीतिक संबंध स्थापित होता जा रहा है। यह सम्बन्ध बहुत महत्त्वपूर्ण है, और इसमें अपने प्रथम श्रेणी के मस्तिष्क को हुमें लगाना है। अंग्रेजी से भले ही दुनिया के कितने ही मुल्कों में काम चल सके, लेकिन केवल अंग्रेजी ज्ञान के भरोसे हमारे राजप्रतिनिधि अंग्रेजी-भिन्न-भाषा-भाषी देशों में अपने कर्तव्य को ठीक तरह से पालन नहीं कर सकेंगे। अभी हमारे राजनीतिक कर्णधारों में अंग्रेजी का ही बोलबाला है और दुनिया की हरेक चीज को वह अँग्रेजी के चश्मे से देखते हैं। यह मनोभाव हमारे काम में हानिकारक होगा।

हम चालीस से ऊपर भाषाओं वाले भिन्न-भिन्न देशों में अपने राज-प्रतिनिधि भेजते हैं। शायद कोई कहे, इन चालीस भाषाओं तथा तत्संबंधी ज्ञान का दस-बारह विश्वविद्यालयों में तीन-चार करके बाँट देना चाहिए। हमारे कितने ही युनिवर्सिटी वाले इससे प्रसन्न होंगे; लेकिन यह बात ठीक नहीं होगी। यह काम सिर्फ एक जगह और एक केन्द्रीय संस्था के अधीन होना चाहिए। इस तरह की एक केन्द्रीय शिक्षा-व्यवस्था, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के विशिष्ट विद्वान् तथा गंभीर वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ता दोनों पैदा करने के लिए आवश्यक है। इस शिक्षा का भी माध्यम हमारी हिन्दी होनी चाहिये। विदेशों में हम हर जगह अँग्रेजी में बोल-बोलकर इसी बात का परिचय देंगे कि अब भी अंग्रेजों की गुलामी हमसे दूर नहीं हुई।

- राहुल सांकृत्‍यायन

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