देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

Find Us On:

English Hindi
Loading

हम दीवानों की क्या हस्ती

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 भगवतीचरण वर्मा

हम दीवानों की क्या हस्ती,
आज यहाँ कल वहाँ चले,
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उड़ाते जहाँ चले ।

आए बनकर उल्लास अभी,
आँसू बनकर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए, अरे,
अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले ?

किस ओर चले? मत ये पूछो,
बस चलना है, इसलिए चले,
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले,

दो बात कहीं, दो बात सुनी;
कुछ हँसे और फिर कुछ रोए ।
छक कर सुख दुःख के घूँटों को,
हम एक भाव से पिए चले ।

हम भिखमंगों की दुनिया में,
स्वछन्द लुटाकर प्यार चले
हम एक निशानी उर पर,
ले असफलता का भार चले ।

हम मान रहित, अपमान रहित,
जी भर कर खुलकर खेल चुके,
हम हँसते हँसते आज यहाँ,
प्राणों की बाज़ी हार चले ।

अब अपना और पराया क्या ?
आबाद रहें रुकने वाले !
हम स्वयं बंधे थे और स्वयं,
हम अपने बन्धन तोड़ चले ।

-भगवतीचरण वर्मा

 

Back

 

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश