राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

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ये सारा जिस्म झुककर (काव्य)  Click To download this content
   
Author:दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सज़दे में नहीं था आप को धोखा हुआ होगा

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परेशाँ हैं, वहाँ पर क्या हुआ होगा

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुनकर तो लगता है
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा

चलो अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें
कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा

- दुष्यंत कुमार

 

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