हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी

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कुछ दोहे  (काव्य)  Click To download this content
   
Author:रोहित कुमार 'हैप्पी'

आँखों से रूकता नहीं बहता उनके नीर ।
अपनी-अपनी है पड़ी, कौन बँधाये धीर ।।

दुनिया सारी हो रही, पैसे की अब पीर ।
ढूँढे से मिलता नहीं, जग में कहीं फकीर ।।

तपने से डरिये नहीं, तपना गुन की खान।
'रोहित' जो जितना तपै, उतना बने महान॥

देना है तो दे हमें, ईश यही वरदान।
परहित को हम जी सकें, जब तक तन में प्रान॥

याद नहीं अब है उसे, माँ-बापू का नाम।
बीवी में दिखते उसे, देखो चारों धाम ।।

सीता तो चाहें मिले, बने आप ना राम ।
माला तो जपते रहे, किये ना अच्छे काम ।।

कलियुग में मिलते नहीं, लछमन भाई राम ।
अपनी-अपनी है पड़ी, अपने-अपने काम ।।

चखकर अब देती नहीं, शबरी मीठे बेर ।
जब से बिकने हैं लगे, ढाई सौ के सेर ।।

भूखे को देते नहीं, मांगे रोटी चार ।
'डोगी' बिस्कुट खा रहा, उससे इतना प्यार ।।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

 

फेसबुक को समर्पित दोहे

जमा यहाँ पर हो रही, 'मैं-मैं' वाली भीड़ ।
जाने कब के खो चुके तुलसी, सूर, कबीर ।।

फोटो अपनी छाप तू, बेशक कुछ भी होय ।
माँ अपनी बीमार हो, चाहे बापू रोय ।।

मैं-मै कर मिमियात हैं, दिन हो चाहे रात ।
साधो तोको क्या भया, कैसी तेरो जात ।।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

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