वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

Find Us On:

English Hindi
Loading
पहचान (काव्य) 
   
Author:रोहित कुमार 'हैप्पी'

अपनी गली
मोहल्ला अपना,
अपनी बाणी
खाना अपना,
थी अपनी भी इक पहचान।

महानगर में बसे हुए हैं
बड़े-बड़े हैं सभी मकान,
फ़ीकी हँसी लबों पर रखते
सुंदर डाले हैं परिधान,
भीड़भाड़ में ढूँढ रहे हैं
खोई हुई अपनी पहचान।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

Previous Page  |   Next Page

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.