वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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गुरुमाता का आशीर्वाद (कथा-कहानी) 
   
Author:स्वामी विवेकानंद

पश्चिम के लिए निकलने से पहले स्वामी विवेकानंद अपनी गुरुमाता (स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पत्नी) शारदा देवी का आशीर्वाद लेने गए।

विवेकानंद पहली बार संवामी रामकृष्ण का संदेश लेकर अमेरिका जा रहे थे।

विवेकानंद जब पहुंचे, उस समय गुरुमाता रसोई-घर में खाना बना रही थीं।

विवेकानंद ने गुरुमाता के चरण स्पर्श कर कहा, "मैं अपने गुरु का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाने के लिए अमेरिका जाना चाहता हूँ। मुझे आशीर्वाद दीजिए।" गुरु-माता ने बात अनसुनी करते हुए, पास पड़े एक चाकू की ओर संकेत कर कहा, "नरेन, वह चाकू मुझे देना।"

विवेकानंद ने उन्हें चाकू पकड़ाया तो माँ शारदा प्रसन्नता के भाव से आशीर्वाद देते हुए बोलीं, "तुम सहर्ष जाओ, मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ। जाओ परदेश में देश का नाम रोशन करो। अपने माता-पिता व गुरु को गौरवान्वित करों। जगत का कल्याण करो। "

गुरुमाता का आशीर्वाद पाकर विवेकानंद ने एक प्रश्न पूछने की आज्ञा मांगी व पूछा, "आपने मुझे इतनी देर बाद आशीर्वाद क्यों दिया? चाकू व आशीर्वाद का क्या संबंध?"

वह बोलीं, ‘मैं देखना चाहती थी कि तुम मुझे चाकू कैसे पकड़ाते हो? तुमने चाकू का धारधार सिरा स्वयं पकड़, मुझे सुरक्षित हत्था दिया जिसमें परहित छिपा है। यही एक साधु के लक्षण हैं। तुम अपने गुरु का संदेश लेकर जाने के लिए बिल्कुल उपयुक्त हो। जाओ, जगत का कल्याण करो!"

[ भारत-दर्शन संकलन]

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